बिहार: बाढ़ में बचे लोगों की ज़िंदगी कुछ इस तरह बयां कर रही अपनी कहानी

bihar flood survivor
बिहार बाढ़ में बचे लोगों की ज़िंदगी कुछ इस तरह बयां कर रही अपनी कहानी

बिहार। कहते हैं अगर किसी घर में कोई एक इंसान मर जाता है तो मुसीबत उसपर नहीं बल्कि उसके पूरे परिवार पर आती है। क्योंकि वो इंसान उनके जीने का सहारा हो सकता है। परिवार पर गुज़र रही मुसीबतों को कोई और नहीं समझ पाता है क्योंकि ये मुसीबत उनपर नहीं गुज़र रही होती है। लोग सिर्फ अफसोस जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर उन्हें तसल्ली देते रहते हैं। तो सोचिए क्या बीत रही होगी बिहार बाढ़ में बचे उस परिवार पर जिसने बाढ़ की चपेट कितने अपनों के साथ अपना घर-बार सब कुछ खो दिया हो। ऐसे में बिहार सरकार सभी बाढ़ प्रभावितों को तसल्ली के नाम पर सिर्फ छह हज़ार रुपये देकर उन्हें दोबारा ज़िंदगी गुजारने के लिए कह रही है।

The Story Of The Survivors Of Bihar Floods Is Telling Their Story :

जब बुधवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सभी बाढ़ प्रभावितों को 24 घंटे के अंदर मुआवज़े के तौर पर छह-छह हजार रुपए देने की बात कही तो बाढ़ प्रभावित चुनर देवी कहती हैं, “घर ही डूब गया, तो बचा क्या? सबकुछ खत्म हो गया है हम यहां ठीक से खा पी नहीं पा रहें हैं और यह छह हजार भी कब मिलेगा, कोई पता नहीं और अगर मिल भी गया तो हम क्या कर लेंगे, क्या हम इतने में फिर से अपना घर बना कर रह सकते हैं।”

बाढ़ में सब कुछ गंवा चुकी चुनर देवी की तरह ऐसे कितने परिवार हैं जो ऐसी मुसीबतों से लड़ रहें हैं। झारपुर के कन्हौली और बिदेसरस्थान में पिछले शनिवार को चार जगहों पर तटबंध टूटेने से तबाही मच गई। इस तबाही में मिनटों में कई घर पानी में डूब गए, कितने लोग बह गए जिसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता है। जो बच गए हैं वो अब हाइवे पर शरण लिए हुए हैं।

इन शरणार्थियों को सबसे बड़ी समस्या भोजन और पीने के पानी की है। सभी राहत शरणार्थियों एनडीआरएफ़ की नावों से पानी और खाना पहुंचाया तो जा रहा है, मगर खुद एनडीआरएफ़ के अधिकारी मानते हैं कि इतना काफी नहीं है। हाइवे पर पन्नी का तंबू लगाकर रह रहें इन शरणार्थियों को तो फिर भी पानी नसीब हो रहा है मगर जो लोग अब तक गांव के अंदर फंसे हुए हैं उनके लिए पीने के पानी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। क्योंकि गांव के सारे जल स्त्रोत बाढ़ के पानी में डूबे हुए हैं।

तंबू में अपने बच्चों के साथ बैठीं खाने का इंतजार कर रही लीला देवी कहती हैं कि, “अब देह ढीला पड़ रहा है। रात में भी करीब डेढ़ बजे खाना मिला था। पानी सुबह 10 बजे के बाद आया है। अब तो लगने लगा है कि खाना-पानी के बिना मर जाएंगे। जब तक यहां (रसोई) चल रहा है तब तक खाना मिल भी जा रहा है। जब अपने घरों में जाएंगे तो कुछ नहीं रहेगा।” वो आगे कहती है कि ‘मैं अपना घर देखने गई थी। वहां अब कुछ नहीं बचा है।’

बिहार। कहते हैं अगर किसी घर में कोई एक इंसान मर जाता है तो मुसीबत उसपर नहीं बल्कि उसके पूरे परिवार पर आती है। क्योंकि वो इंसान उनके जीने का सहारा हो सकता है। परिवार पर गुज़र रही मुसीबतों को कोई और नहीं समझ पाता है क्योंकि ये मुसीबत उनपर नहीं गुज़र रही होती है। लोग सिर्फ अफसोस जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर उन्हें तसल्ली देते रहते हैं। तो सोचिए क्या बीत रही होगी बिहार बाढ़ में बचे उस परिवार पर जिसने बाढ़ की चपेट कितने अपनों के साथ अपना घर-बार सब कुछ खो दिया हो। ऐसे में बिहार सरकार सभी बाढ़ प्रभावितों को तसल्ली के नाम पर सिर्फ छह हज़ार रुपये देकर उन्हें दोबारा ज़िंदगी गुजारने के लिए कह रही है। जब बुधवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सभी बाढ़ प्रभावितों को 24 घंटे के अंदर मुआवज़े के तौर पर छह-छह हजार रुपए देने की बात कही तो बाढ़ प्रभावित चुनर देवी कहती हैं, "घर ही डूब गया, तो बचा क्या? सबकुछ खत्म हो गया है हम यहां ठीक से खा पी नहीं पा रहें हैं और यह छह हजार भी कब मिलेगा, कोई पता नहीं और अगर मिल भी गया तो हम क्या कर लेंगे, क्या हम इतने में फिर से अपना घर बना कर रह सकते हैं।" बाढ़ में सब कुछ गंवा चुकी चुनर देवी की तरह ऐसे कितने परिवार हैं जो ऐसी मुसीबतों से लड़ रहें हैं। झारपुर के कन्हौली और बिदेसरस्थान में पिछले शनिवार को चार जगहों पर तटबंध टूटेने से तबाही मच गई। इस तबाही में मिनटों में कई घर पानी में डूब गए, कितने लोग बह गए जिसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता है। जो बच गए हैं वो अब हाइवे पर शरण लिए हुए हैं। इन शरणार्थियों को सबसे बड़ी समस्या भोजन और पीने के पानी की है। सभी राहत शरणार्थियों एनडीआरएफ़ की नावों से पानी और खाना पहुंचाया तो जा रहा है, मगर खुद एनडीआरएफ़ के अधिकारी मानते हैं कि इतना काफी नहीं है। हाइवे पर पन्नी का तंबू लगाकर रह रहें इन शरणार्थियों को तो फिर भी पानी नसीब हो रहा है मगर जो लोग अब तक गांव के अंदर फंसे हुए हैं उनके लिए पीने के पानी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। क्योंकि गांव के सारे जल स्त्रोत बाढ़ के पानी में डूबे हुए हैं। तंबू में अपने बच्चों के साथ बैठीं खाने का इंतजार कर रही लीला देवी कहती हैं कि, "अब देह ढीला पड़ रहा है। रात में भी करीब डेढ़ बजे खाना मिला था। पानी सुबह 10 बजे के बाद आया है। अब तो लगने लगा है कि खाना-पानी के बिना मर जाएंगे। जब तक यहां (रसोई) चल रहा है तब तक खाना मिल भी जा रहा है। जब अपने घरों में जाएंगे तो कुछ नहीं रहेगा।" वो आगे कहती है कि 'मैं अपना घर देखने गई थी। वहां अब कुछ नहीं बचा है।'