एक बाल विवाह ऐसा भी, पति ने पढ़ाकू पत्नी को बनाया डॉक्टर

जयपुर। राजस्थान की राजधानी जयपुर के एक छोटे से गाँव की बेटी रूपा विषम परिस्थितियों में मेडिकल छात्रा बनकर देशभर के लिए मिसाल बन गयी है। 8 साल की उम्र में बाल विवाह और 15 साल की उम्र में गौना होकर ससुराल पहुंचने के बाद उसने जो कुछ कर दिखाया वह सामान्य नहीं कहा जा सकता। उसकी इस उपलब्धी में उसके पति और जीजा ( जोकि उसके पति का बड़ा भाई भी है।) का भी बड़ा योगदान है, लेकिन हर कोई आज इस लड़की के जज्बे को सलाम कर रहा है।

मामला जयपुर के करेरी गांव का है। यहां की रहने वाली रूपा के मां बाप ने महज 8 साल की उम्र में उसका बाल विवाह उसकी बड़ी बहन के देवर शंकराल के साथ कर दिया था। उस समय रूपा तीसरी कक्षा में थी और उसका पति सातवीं। पढ़ाई को लेकर बचपन सी ही गंभीर रूपा जब 10वीं में पहुंची तो उनका गौना कर दिया गया। उसने अपनी दसवीं की परीक्षा ससुराल में रहकर दी। दसवीं के नतीजों में जब उसे 84 प्रतिशत अंकों के साथ सफलता मिली तो उसके पति और जीजा ने उसे आगे पढ़ाने की ठान ली। आस पड़ोस के लोगों ने ताने भी मारे लेकिन शंकराल ने अपनी पत्नी को आगे बढ़ाने का फैसला नहीं बदला।

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रूपा का दाखिला एक निजी स्कूल में करा दिया गया। अपनी मेहनत और लगन के दम पर रूपा ने इंटरमीडिएट की परीक्षा भी 84 फीसदी अंको से पास की और मेडिकल शिक्षा में दाखिले के लिए कोटा जाकर तैयारी करने की ईच्छा जाहिर की। रूपा के हौसले को देखते हुए शंकराल और उसके बड़े भाई ने भी हामी तो भर दी लेकिन अपनी आमदनी को देखते हुए दोनों ने जैसे तैसे कोचिंग की फीस का जुगाड़ कर रूपा को कोटा भेज दिया।

इस बार रूपा की किस्मत ने साथ नहीं दिया। वह अपने पहले प्रयास में मेडिकल प्रवेश परीक्षा को पास नहीं कर सकी और लौटकर गांव आकर अपने परिवार के साथ घर और खेत के कामों हाथ बंटाने लगी। इस बार रूपा के पति शंकराल ने हिम्मत भरी और उसे दोबारा कोटा भेजकर तैयारी करवाने का मन बना लिया। कोचिंग वालों से बात हुई तो फीस में छूट मिल गई लेकिन हॉस्टल और रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च पहाड़ सा नजर आ रहा था। शंकराल ने अपने भाई के साथ बातकर रूपा को कोटा भेज दिया। महीने का खर्चा देने के लिए भैंसे खरीदकर दूध बेंचने का काम शुरू किया लेकिन कुछ समय बाद भैंस मरने से धंधा चौपट हो गया। पैसों की किल्लत के बीच शंकराल और उसके बड़े भाई ने दिन रात टैम्पो चलाकर रूपा की जरूरत को पूरा किया।

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आखिरकार शंकराल की हिम्मत और रूपा की लगन के आगे किस्मत को झुकना ही पड़ा। पति पत्नी के प्रयास रंग लाए, दूसरे प्रयास में मेडिकल प्रवेश परीक्षा में 603 अंक हासिल कर नीट में 2283 रैंक हासिल की। अब रूपा डॉक्टर बनने जा रही है। उसके साथ—साथ उसके पति और जीजा दोनों का सपना भी पूरा होता नजर आ रहा है।

रूपा की कहानी बदलते दौर के साथ धीरे—धीरे बदलती सोच को दर्शाती है। एक दौर वह भी था जब महिलाओं को पुरूषों से पीछे चलना पड़ता था। लेकिन शंकराल ने जो उदाहरण पेश किया वह अपने आप में अद्वितीय है। उसने पीछे रहकर अपनी पत्नी को आगे बढ़ाया, वह भी उस समाज में रहकर जो महिलाओं को घर का कामकाज करने वाली नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं समझता।

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