यूपी की राजनीति में क्या कुछ बदल देगा ये गठबंधन

लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की खबरों को सच माने तो अब इस गठबंधन में सिर्फ औपचारिक घोषणा की कमी बाकी कही जा सकती है। यूपी की चुनावी सियासत में इस गठबंधन ने कई पुराने समीकरणों के तोड़ने के साथ नए समीकरणों के बनने के संकेत दे दिए हैं। दोनों दलों के भीतर गठबंधन पर चल रहे मंथन ने जिस तरह से एक दूसरे पर हमलावर रहने वाले नेताओं की जुबान में जो मिठास घोली है वह यूपी विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान भी नजर आ चुकी है। जिससे विरोधियों की चिंता बढ़नी लाजमी है। इस गठबंधन के बनने के बाद भाजपा की मुश्किलें सबसे ज्यादा बढ़ती नजर आ रहीं हैं।




सियासी पंडितों की माने तो सपा और कांग्रेस के बीच बनता गठबंधन एक हद तक बीजेपी के खिलाफ एक ऐसे मोर्चे के रूप में खड़ा होगा, जिसे धर्मनिर्पेक्ष मोर्चे के रूप में देखा जाएगा। जिसे सीधे तौर पर हिन्दुत्ववादी राजनीति करने वाली ​भाजपा से खिलाफ पहली पसंद माना जाएगा। वहीं मुस्लिम मतदाताओं की पहली पसन्द के रूप में तेजी से उभरती बहुजन समाज पार्टी की कोशिशों को यह गठबंधन तगड़ा झटका दे सकता है।




इस गठबंधन की संभावनाओं को अपने बयानों से हवा देने वाले सीएम अखिलेश यादव को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पहले ही आड़े हाथों ले चुके हैं। अमित शाह ने कहा था कि अखिलेश कहते है यदि कांग्रेस उनके साथ आ जाए तो यूपी में शायद फिर से उनकी सरकार आ जाए। उन्हें चाहिए कि वह अपनी बुआ यानी बसपा सुप्रीमो मायावती को भी अपने साथ कर लें। सब इकट्ठे हो जाएं, लेकिन उत्तर प्रदेश में सरकार भाजपा की ही बनेगी। अमित शाह के इस बयान से तो ऐसा लगता है कि उन्होंने इस गठबंधन के खिलाफ कोई रणनीति पहले से ही तैयार कर रखी है या फिर वह इस गठबंधन की संभावना को ही नकार दिया हो। लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि यह गठबंधन यूपी के चुनावी मैदान में सबसे आगे आंकी जा रही भाजपा को पीछे धकेलने की पूरी ताकत रखता है।

क्या यूपी में फिर दिखेगी मोदी लहर

उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव ऐसे समय में होने जा रहा है जब 2014 में यूपी से मिले अद्वितीय जनादेश की दम पर बनी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार अपने कार्यकाल का आधा समय पूरा करने जा रही है। ऐसे में यूपी की जनता भी मोदी के वादों एवं उनकी सरकार द्वारा किए गए कामों के मूल्यांकन के बाद ही जनता दोबारा उनके चहरे पर भाजपा को वोट करेगी। सियासी पंडित भी मानते हैं कि आज परिस्थितियां लोकसभा चुनावों जैसी नहीं हैं। आज नरेन्द्र मोदी देश की सत्ता की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठे हैं और उनकी कार्यप्रणाली जनता देख चुकी है। ​यूपी में तैयार हो रही राजनीतिक परिस्थितियों में होने वाले चुनावों के नतीजे तय करेंगे कि देश में मोदी की लहर का असर बाकी है या नहीं।




नोटबंदी का दिखेगा असर—

प्रधानमंत्री द्वारा लिया गया नोटबंदी का फैसला असल में जनता को स्वीकार है या नहीं इसका वास्तविक आंकलन यूपी के विधानसभा चुनावों के नतीजे देखने के बाद ही किया जा सकेगा। देश की सबसे बड़ी सियासी जमीन पर नोटबंदी अहम चुनावी मुद्दा बनेगी।

मुस्लिम वोट बैंक पर होगी नए गठबंधन की नजर-

यूपी के चुनावों का इतिहास रहा है कि मुस्लिम वोटबैंक ने जिस पार्टी में अपना विश्वास जताया है वही पार्टी यूपी की सत्ता में रही है। वहीं दूसरा मत यह भी है कि जिस चुनाव मे मुस्लिम वोटर बंटे हैं उसी चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश ने जीत दर्ज करवाई है। इस बार भी मुस्लिम वोटरों के बसपा, सपा और कांग्रेस के बीच बंटने की उम्मीद की जा रही थी। कांग्रेस और सपा के साथ आने के बाद ऐसा कहा जा सकता है कि मुस्लिम वोटरों के लिए यह गठबंधन पहली पसंद बनकर उभर सकता है।




सपा को भी देने होंगे जवाब—

यूपी की सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ ​काबिज समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी सरकार में हुए विकास कार्यों को गिनवाते नहीं थक रहे हैं। एक ओर उन्हें पूरा भरोसा है कि उनके विकास कार्य उन्हें दोबारा सत्ता में लाने का काम करेंगे, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के साथ उनकी पार्टी का गठबंधन उनके ही दावों पर सवाल जरूर उठाएगा। कहीं न कहीं कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर उनकी आतुरता यह इशारा करती है कि वह स्वयं विधानसभा चुनावों में अपने दम पर या अपनी पार्टी के दम पर खुद को और अपनी पार्टी को सत्ता से दूर होता देख रहे हैं।

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