ये आईएएस हाईस्कूल के बाद छोड़ रहा था पढ़ाई, निरक्षर मां ने दिखाया किताबों का रास्ता

नई दिल्ली। दिल्ली के ओट्रम लेन की किंग्सवे कैंप की झुग्गी झोपड़ियां एक ऐसा ठिकाना जहां दशकों पहले मजदूरी करने दिल्ली पहुंचे देशभर के मजदूरों ने अपने आशियाने बना रखे हैं। यहां जिन्दगी फिल्मों में दिखाई जाने वाली उस मलिन बस्ती जैसी है, जहां सुबह शौच से लेकर पीने और नहाने के पानी के लिए लोगों को लाइनों में लगकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। इसी बस्ती की झुग्गी नंबर 208 में रहने वाले हरीशचन्द्र आज आईएएस अधिकारी हैं। उन्होने 22 साल की उम्र में 2009 की सिविल परीक्षा में 309वीं रैंक हासिल कर देश के युवाओं के सामने एक मिसाल पेश की है।




पेशे से दिहाड़ी मजदूर पिता और कोठियों में बर्तन धोने और झाडू पोछा करने वाली बाई के बेटे हरीशचन्द्र का शुरूआती जीवन किंग्सवे कैंप के बच्चों जैसा ही था। सुबह उठकर शौच के लिए लाइन में लगना, फिर पानी की लाइन को पार कर राशन की लाइन में धक्के खाना ये हरीशचन्द्र जिन्दगी का हिस्सा था। मां— बाप की हाड़ तोड़ मेहनत के बाद भी परिवार को दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता था। हरीशचन्द पढ़ाई में अच्छे थे लेकिन हाईस्कूल में आने के साथ ही परिस्थितियां ऐसी हुईं कि उसे एक पंसारी की दुकान पर नौकरी करनी पड़ी। जिसका असर परीक्षा परिणामों में भी दिखा। वह फेल होते होते बचे। जिसके बाद उन्होंने फैसला कर लिया कि वह पढ़ाई छोड़कर चार पैसे कमा कर अपने मां—बाप की मदद करेंगे।




हरीशचन्द्र बताते हैं कि पढ़ाई छोड़ने के फैसले के बारे में जब उन्होंने अपनी मां को बताया तो मां ने इस फैसले का विरोध किया और पढ़ाई पर ध्यान लगाने की बात कही। जिसके बाद हरीशचन्द्र ने पढ़ाई जारी रखते हुए दिल्ली के हिन्दू कालेज से बीए की डिग्री पूरी की। इसी दौरान उन्होंने 2007 में आईएएस बने गोविन्द जायसवाल की कहानी पढ़ी। एक रिक्शा चालक पिता की संतान होते हुए आईएएस बने गोविंद में हरीशचन्द्र को एक ऐसा रोल मॉडल मिल गया था, जिससे उनके भीतर भी आईएएस बनने का उत्साह जाग दिया। जिसके बाद हरीशचन्द्र ने रात दिन एक कर दिया और इसका परिणाम सामने आया 2009 के सिविल परीक्षा नतीाजों के रूप में। जब उन्हें यह खबर मिली कि उनका सिलेक्शन देश की सबसे प्रतिष्ठित मानी जाने वाली आईएएस की नौकरी के लिए चयनित कर लिया गया है।

आईएएस हरीशचन्द्र की कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा का श्रोत हो सकती है, जिन्हें लगता है कि उनके पास संसाधनों की कमी है। जिन्हें लगता है कि उनके मां—बाप उन्हें पर्याप्त सुविधाएं नहीं दे पा रहे। हरीशचन्द्र भी एक सामान्य छात्र थे, जिसके मां—बाप के पास सुविधा जुटाने से पहले पेट भरने की समस्या थी। इसके बावजूद वह अपनी सफलता की कहानी लिखने में कामयाब रहे।




हमारे देश में ऐसे कई रोल मॉडल्स है जिन्होंने अपनी जिन्दगी को अपनी मेहनत के दम पर बदला है। ऐसे सैकड़ों नाम हैं जिनके संघर्ष की कहानी के आगे करोड़ों जिन्दगियां आसान नजर आती हैं। शायद हमें ऐसे लोगों से बहुत कुछ सीखने की जरूरत हैं।

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