बलात्कार को लेकर आम मानसिकता पर चोट करती एक समाज सेविका की अनोखी पहल

मूजियम

हम रोज बलात्कार की नई घटनाओं के बारे में पढ़ते और सुनते हैं। शायद इसी वजह से ऐसे 100 मामलों में से केवल एक या दो पर ही हमें हैरानी होती है, ऐसा भी इस लिए होता है क्योंकि उन घटनाओं में दरिंदगी हद से ज्यादा होती है। इन सबके बीच जो सबसे आम प्रतिक्रियाएं आतीं है उनमें पीड़िता को ही अपराध बोध करवाया जाता है। उसे अप्रत्यक्ष रूप से उकसावे का दोषी माना जाता है। देश की आधी आबादी को समझाया जाता है कि कौन से कपड़े पहने और कैसे पहने, क्योंकि महिलाओं का पहनावा ही वह कारण माना जाता है जिस वजह से एक दूध मुंही बच्ची, एक किशोरी, नाबालिग युवती, युवती और महिला को अपराध का​ शिकार बनना पड़ता है।

समाज की इसी सोच पर चोट करने की नियत से एक समाज सेविका ने नई मुहीम शुरू की है। इस मुहीम के तहत यह समाजसेविका बलात्कार पीड़िताओं के वे कपड़े इकट्ठे कर रही है जो उन्होंने घटना के समय पहने हुए थे। इन्हीं कपड़ों के माध्यम से इस समाजसेविका ने रेप पीड़िताओं की कहानी को कहने की कोशिश की है। जो एक बात कहती है कि बलात्कार का कारण कपड़े नहीं दरिंदगी की मानसिकता है, जो हमारा समाज पैदा करता है और उसका भुगतान उस मानसिकता का शिकार होने वाली महिलाओं को चुकानी पड़ती है।

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बेंगलुरु की रहने वाली जसमीन पाथेजा पेशे से एक कलाकार और सोशल वर्कर है। जो यौन शोषण की शिकार महिलाओं की मदद करती है। पाथेजा यौन शोषण की शिकार महिलाओं के कपङे अपने पास अपने घर के एक कमरे में संभालकर रखती है। पाथेजा का ये कमरा किसी म्यूजियम से कम नही है जिसमे अब तक हुए कई रेप पीडिताओं के कपङे रखे है। दिखने में यहां रखे कपङे किसी आम कपङे जैसे है लेकिन इन से जुङी कहानियां उतनी ही दर्दनाक और भयानक है। पिछले साल न्यू ईयर पर बैंगलुरु में एक महिला के साथ हुआ गैंगरेप तो आपको याद ही होगा। उस रेप पीडिता का जम्पसूट भी पाथेजा के इस कमरे में मौजूद है।
पाथेजा के अनुसार रेप कभी कपङे या उम्र देखकर नही होता उनके इस कमरे में स्कूल की बच्ची की स्कूल ड्रेस से लेकर , स्विम सूट, सूट और भी कई तरह के कपङे है जो ये बताते हैं कि हमारे समाज में कपङे और उम्र सिर्फ एक बहाना है। सेफ कोई नही है न ही एक साल की बच्ची और न ही 60 साल की महिला। पाथेजा के अनुसार जिन महिलाओं ने उन्हें ये कपङे दिए। उन महिलाओं के अनुसार उन्हें ये कपङे देखकर हर पल उनकी कमजोरी का अहसास होता है और वो भयानक मंजर उनके सामने आता है। पाथेजा के इस अभियान का नाम “आई नेवर आस्क फाॅर इट ” है। जिस के तहत ये रेप पीडिताओं के कपङे जमा करती है।

बहुत अजीब बात है एक ही समाज में किस किस तरह के लोग हैं एक वो जो महिला की पवित्रता को उसके शरीर की शुद्धता से देखते है। जब तक उसे किसी ने छूआ नही वो पवित्र है और कुछ पाथेजा जैसे जो पवित्रता को शरीर  में नही मन में देखते हैं।

पाथेजा के कलेक्शन को देखकर एक बात तो साबित होती है कि बलात्कारी की मानसिकता न तो अपने शिकार की उम्र देखती है और न ही पहनावा। जो पहनावे को बलात्कार की घटनाओं का कारण मानते हैं वे लोग भी एक हद तक उस मानसिकता का शिकार हैं, और अपनी मानसिकता को सही ठहराने से कतराते नहीं हैं। उनका नजरिया पीड़िता को एकाएक अपराधी बना देता है, जिसे किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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हम रोज बलात्कार की नई घटनाओं के बारे में पढ़ते और सुनते हैं। शायद इसी वजह से ऐसे 100 मामलों में से केवल एक या दो पर ही हमें हैरानी होती है, ऐसा भी इस लिए होता है क्योंकि उन घटनाओं में दरिंदगी हद से ज्यादा होती है। इन सबके बीच जो सबसे आम प्रतिक्रियाएं आतीं है उनमें पीड़िता को ही अपराध बोध करवाया जाता है। उसे अप्रत्यक्ष रूप से उकसावे का दोषी माना जाता है। देश की आधी आबादी…
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