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महाभारत के युद्ध में ये एक मात्र कौरव जीवित बचा था, धृतराष्ट्र के अवैधसंबंध से जन्म था पुत्र

विवाह होने के इतने समय बाद भी अपनी संतान न होने के दुःख और सिंहासन के हाथ से निकलने के भय से धृतराष्ट्र व्याकुल होकर अपनी एक दासी के साथ ही अवैध संबंध बन बैठे और उस दासी ने एक पुत्र को जन्म दिया

By आराधना शर्मा 
Updated Date

This Was The Only Kaurava Surviving In The War Of Mahabharata Son Was Born From Dhritarashtras Illicit Relationship

नई दिल्ली: महाभारत काल में कौरव-पांडव युद्ध के पहले से ही धृतराष्ट्र और पांडू के बीच सिहांसन के लिए शीतयुद्ध चलता रहता था।  दोनों भाइयों की यही ख्वाहिश थी कि उनका पुत्र ही हस्तिनापुर का उतराधिकारी बने लेकिन सिहांसन पर बैठने की यह शर्त इस बात पर निर्भर करती थी कि दोनों राजाओं में से जिसका भी पुत्र पहले होगा वही हस्तिनापुर का  उतराधिकारी बनेगा?

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दोनों भाईयों में धृतराष्ट्र बड़े थे और गांधारी से उनका विवाह भी पहले हुआ था, लेकिन विवाह के कई समय बाद तक भी  धृतराष्ट्र और गांधारी की कोई संतान नहीं हुई थी। वही पांडू का विवाह कुंती से होने वाला था जिससे यह बात भी तय थी कि विवाह के बाद उनकी संतान भी होंगी और यदि उनकी संतान धृतराष्ट्र और गांधारी की संतान से पहले हो गयी तो नियमानुसार वही हस्तिनापुर की राजगद्दी में बैठेगी।

एक दिन विवाह होने के इतने समय बाद भी अपनी संतान न होने के दुःख और सिंहासन के हाथ से निकलने के भय से धृतराष्ट्र व्याकुल होकर अपनी एक दासी के साथ ही अवैध संबंध बन बैठे और उस दासी ने एक पुत्र को जन्म दिया। धृतराष्ट्र की वह दासी अवैध संबंध से उत्पन्न होने वाली संतान को जब जन्म देने वाली थी, उसी वक़्त गांधारी भी गर्भवती थी और संतान के रूप में उसने मांस का टुकड़े को जन्म दिया।

संतान के रूप में मांस का टुकड़ा देख कर धृतराष्ट्र के सामने पूरा सच आ गया और धृतराष्ट्र ने भी गांधारी से दासी के साथ बनाये अपने अवैध संबंध की सचाई भी बता दी। कलश में रखे मांस के टुकड़े से सबसे पहले दुर्योधन का जन्म हुआ था। दुर्योधन के बाद दुशासन के जन्म के समय ही धृतराष्ट्र की दासी ने धृतराष्ट्र के एक और पुत्र को जन्म दिया था।

विकर्ण कौरवों  में बचे थे जीवित जीवित

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अवैध संबंध के चलते धृतराष्ट्र की दासी से जो पुत्र हुआ, वही बाद भी विकर्ण कहलाया लेकिन एक दासी पुत्र होने के बाद भी विकर्ण को बाकि कौरवों की तरह एक राजकुमार के सभी अधिकार मिले थे पर विकर्ण ही एक मात्र कौरव था, जिसने महाभारत के युद्ध में पांडवों की ओर से युद्ध में हिस्सा लिया था और सभी कौरवो में से विकर्ण ही एक ऐसा कौरव था, जो जीवित बच पाया था।

महाभारत काल में हुए कौरव-पांडव के बीच युद्ध वजह की मुख्य वजह “द्रौपदी चीरहरण” के समय भी विकर्ण ही एक ऐसा कौरव था, जिसने दुर्योधन और दुशासन के कृत्य की निंदा की थी और इस पूरी घटना का विरोध किया था। अपने सभी भाईयों के साथ अधर्म के रास्ते में न चल कर विकर्ण ने धर्म के रास्तें में चलना तय किया और पांडवों का इस पुरे युद्ध में साथ देना तय किया था।

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