स्वतंत्र भारत के वे 5 आंदोलन, जिन्होंने देश को दी नई दिशा

भारत से अंग्रेजों को भगाने और देश को आजाद कराने के लिए स्वतंत्रता सेनानियों ने कई तरह के आंदोलन चलाए. आवाज उठाने और अपनी मांगों को मनवाने के लिए आंदोलन की प्रथा अब भी जारी है. प्रतिदिन देश में ब्लॉक स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर सैकड़ों आंदोलन होते हैं. आजादी के 70वें साल में ऐसे ही कुछ आंदोलनों की चर्चा करना लाजिमी है. आजादी के बाद ये ऐसे आंदोलन हैं, जब लोग अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे. अपार जनसमर्थन से सरकार को हिलाकर रख दिया और नया इतिहास रच दिया.

सेव साइलेंट वैली आंदोलन
आजाद भारत का पहल बड़ा आंदोलन कहा जा सकता है. यह आंदोलन केरल के वन वर्षा साइलेंट वैली को बचाने के लिए चलाया गया था. केरल के प्रभावी नेता के करुणाकरण और सांसद वीएस विजयराघव वहां एक पनबिजली परियोजना के तहत संयंत्र लगाने के पक्ष में थे.  इसी जंगल को बचाने के लिए जन आंदोलन चलाया गया, जिसे ‘सेव साइलेंट वैली आंदोलन’ कहा गया. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस परियोजना को स्वीकृति नहीं दी थी.

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चिपको आंदोलन  
70 के दशक में पूरे भारत में जंगलों की कटाई के विरोध में एक आंदोलन शुरू हुआ जिसे चिपको आंदोलन के नाम से जाना जाता है.  इस आंदोलन का नाम चिपको आंदोलन इसलिए पड़ा क्योंकि लोग पेड़ों को बचाने के लिए उनसे चिपक या लिपट जाते थे और ठेकेदारों को उन्हें नही काटने देते थे. 1974 में शुरु हुये विश्व विख्यात ‘चिपको आंदोलन’  की प्रणेता गौरा देवी थी. गौरा देवी ‘चिपको वूमन’ के नाम से मशहूर हैं.  1973 के अप्रैल महीने में ऊपरी अलकनंदा घाटी के मंडल गांव में इसकी शुरूआत हुई और धीरे-धीरे पूरे उत्तरप्रदेश के हिमालय वाले जिलों में फैल गया. बाद में चंडी प्रसाद भट्ट, गोबिंद सिंह रावत, वासवानंद नौटियाल और हयात सिंह जैसे जागरूक लोग भी शामिल हो गए.

जेपी आंदोलन
जेपी आंदोलन वह आंदोलन रहा, जिसने पूरे भारत की राजनीति की दिशा बदल दी. ‘जेपी आन्दोलन’ 1974 में बिहार के विद्यार्थियों द्वारा बिहार सरकार के अन्दर मौजूद भ्रष्टाचार के विरूद्ध शुरू किया गया था. बाद में इस आंदोलन का रुख केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार की तरफ मुड़ गया. इस आंदोलन की अगुवाई प्रसिद्ध गांधीवादी और सामाजिक कार्यकर्त्ता जयप्रकाश नारायण ने की थी जिन्हें जेपी भी कहा जाता था. इस आंदोलन को ‘संपूर्ण क्रांति आंदोलन’ भी कहा जाता था. आंदोलनकारी बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर को हटाने की मांग कर रहे थे, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ऐसा करने से मना कर दिया. तब यह आंदोलन सत्याग्रह में बदल गया. जेपी ने पूरे देश में घूम-घूमकर कांग्रेस के विरुद्ध प्रचार किया. सभी विपक्षी दलों को एकजुट किया. इस आंदोलन के बूते ही केंद्र में जनता दल की सरकार बनी जो आजाद भारत की पहली गैर कांग्रेसी सरकार थी. जेपी आंदोलन के कारण इंदिरा गांधी भी चुनाव हार गई थीं.

जंगल बचाओ आंदोलन
जंगल बचाओ आंदोलन की शुरुआत 1980 में बिहार से हुई थी. बाद में यह आंदोलन झारखंड और उड़ीसा तक फैल गया.  1980 में सरकार ने बिहार के जंगलों को मूल्यवान सागौन के पेड़ों के जंगल में बदलने की योजना पेश की, और इसी योजना के विरुद्ध बिहार के सभी आदिवासी कबीले एकजुट हुए और उन्होंने अपने जंगलो को बचाने के लिए एक
आन्दोलन चलाया. इसे ‘जंगल बचाओ आंदोलन’ का नाम दिया.

नर्मदा बचाओ आंदोलन
नर्मदा नदी पर बन रहे अनेक बांधो के विरुद्ध साल 1985 से शुरू ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ शुरू किया गया था. इस आंदोलन में आदिवासियों, किसानों, पर्यावरणविदों ने बांधों के निर्माण के फैसले के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया. बाद में इस आंदोलन में कई हस्तियां जुड़ती गईं और अपना विरोध जताने के लिए भूख हड़ताल का प्रयोग भी किया. बाद में कोर्ट ने दखल देते हुए सरकार को आदेश दिया कि पहले प्रभावित लोगों का पुनर्वास किया जाए तभी काम आगे बढ़ाया जाए.

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