ये यूपी है साहब, सरकारी स्कूल में किताब से पहले पकड़ाई जाती है झाडू

ये यूपी है साहब, सरकारी स्कूल में किताब से पहले पकड़ाई जाती है झाडू

अमेठी। आपको यह सुनकर कैसा लगेगा कि अपने जिस बच्चे को सुबह सुबह तैयार करके आप पढ़ाई करने के लिए स्कूल छोड़ने जाते है उसे वहां पहुंचकर सबसे पहले झाडू लगानी पड़ती है फिर कूड़ा इकट्ठा करके फेंकने जाना पड़ता है। शायद आप ऐसी परिस्थिति में स्कूल प्रशासन के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करवाने पर उतारू हो जाएंगे। लेकिन सरकारी स्कूलों में यह सब आम बात है क्योंकि यहां पढ़ने वाले बच्चे समाज के जिस तबके से आते है, वहां के लोग इतने जागरुक नहीं हैं। उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धी अपने बच्चे को स्कूल भेजना भर है, फिर वह स्कूल में कुछ सीख रहा है या झाडू लगा रहा है इसकी जिम्मेदारी मास्टर जी की है। वही मास्टर जी जो आदतन आधे से एक घंटा देरी से स्कूल पहुंचते हैं और फिर अपनी मोटरसाइकिल को ​स्कूल परिसर के एक कोने में खड़ा कर अपने मंहगे स्मार्टफोन में व्यस्त हो जाते हैं।

आज हम आपका सामना अमेठी जिले के अंतर्गत आने वाले शाहगढ़ ब्लॉक की सरकारी जूनियर हाईस्कूल पाठशाला की हकीकत से करवाने वाले हैं। जहां ग्रामीण और गरीब बच्चों का भविष्य सुधारने के लिए मोटी सरकारी पगार पाने वाले टीचर व अन्य कर्मचारी बच्चों के भविष्य के साथ न केवल खिलवाड़ कर रहे हैं बल्कि उनके साथ चपरासियों जैसा व्यवहार भी कर रहे हैं।

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जैसा कि ऊपर दिख रही तस्वीर में नजर आ रहा है कि एक बच्ची पाठशाला से इकट्ठा किया कचरा फेंक रही है और कुछ बच्चे इस काम में उसका साथ दे रहे हैं। यह तस्वीर इस स्कूल के बच्चों की स्कूली दिनचर्या के पहले काम का आखिरी हिस्सा है, क्योंकि इससे पहले ये बच्चे स्कूल में झाडू लगा रहे थे।

क्या है मामला-

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यह कोई विशेष मामला नहीं है यह उत्तर प्रदेश की सरकारी प्राइमरी और जूनियर हाईस्कूल पाठशालाओं की वो तस्वीर है जो हर दूसरे स्कूल में सुबह सुबह देखने को मिल जाती है। बच्चे स्कूल पहुंचते ही मास्टर जी के हुकुम के गुलाम हो जाते हैं, मास्टर जी ने कहा तो हैंडपंप से पानी लाने से लेकर मास्टर जी की बाइक तक चमकाने का काम बच्चे बखूबी करते हैं। प्राइमरी स्कूलों में इस काम की कीमत दोपहर के खाने से चुकाई जाती है तो जूनियर हाईस्कूल में बजीफे की रकम से क्योंकि इस फायदे के लिए मास्टर जी की कृपा की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है। रही बात मास्टर जी की तो वे बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर अपने परिवार का पेट बड़ी मौज से पाल रहे हैं।

समझनी होगी अपनी जिम्मेदारी-

ग्रामीण इलाकों से लेकर कस्बों में आने वाले सरकारी प्राइमरी और जूनियर हाईस्कूल जैसी पाठशालाओं के जो हालात हैं वे ना तो अधिकारियों से छुपे हैं और ना ही किसी राजनेता से। लेकिन मजबूरी ये है साहब कि इस तंत्र को सुधारने की ताकत रखने वाली छड़ी इन्हीं अधिकारियों और राजनेताओं के हाथों में है और इनके बच्चे इन स्कूलों को जाने वाले रास्ते तक पर नहीं जाते। इसलिए इन स्कूलों के हालात दिन ब दिन बद्तर होते जा रहे हैं। जब तक जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे तब तक शिक्षा के नाम पर जरूरतमंद बच्चों का शोषण होता रहेगा।

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रिपोर्ट-राम मिश्रा

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