पत्रकारिता का सच: अखबार दफ्तर के बाहर धरने पर बैठे पत्रकार की मौत

नई दिल्ली।  समाज का आईना, मजबूर और शोषितों की आवाज़, लोकतन्त्र के चौथे स्तंभ ऐसे तमाम नामों से मीडिया व मीडियाकर्मियों को नवाजा जाता है। पत्रकारिता के झंडावरदार कहलाने वाले ब्रांडेड पत्रकार चाहें तो किसी एक बयान के​ लिए प्रधानमंत्री को इस हद तक घेर लेते हैं कि कई दिनों तक सरकार को सफाई देनी पड़ती है। हाल ही में हुए पत्रकार गौरी लंकेश हत्याकांड मामले में जो देखने को मिला वह भी ब्रांडेड पत्रकारिता की पोल खोलता है। जहां पत्रकारों ने बेंगलुरु में हुई हत्या की एक घटना को राष्ट्रीय रुदन का विषय बना डाला। लेकिन ऐसे पत्रकारों की नजर दिल्ली में 13 सालों से अपनी कंपनी के दफ्तर के बाहर 400 कर्मचारियों के हक की लड़ाई के लिए धरना दे रहे पत्रकार पर नहीं पड़ी, जो अपने परिवार से दूर इंसाफ की लड़ाई के लिए डटा था और उसके इरादे इतने मजबूत थे कि मौत के बाद भी उसका शरीर वहीं मिला जहां वह 13 सालों से धरना दे रहा था।

हो सकता है देश के बड़े पत्रकारों को खुद का ब्रांडेड कहलाना किसी अपशब्द की तरह लगता हो लेकिन सच इतना भर है कि देश में उदारीकरण के साथ आई ब्रांड मार्केटिंग का सबसे ज्यादा असर इन्हीं लोगों पर दिखता है। ये लोग धरना एक्सपर्ट अरविन्द केजरीवाल जैसे कथित समाजसेवी को तीन सालों के भीतर देश की राजधानी दिल्ली का दो बार मुख्यमंत्री बनाकर अपनी ताकत का एहसास तो करा सकते हैं, लेकिन एक अखबार के दफ्तर से रातों रात निकाले गए लोगों के परिवार के लिए 13 सालों से इंसाफ की लड़ाई लड़ने वाले पत्रकार के कंधे से कंधा मिलाने का आत्मबल नहीं जुटा पाते।

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दरअसल, हम यहां बात कर रहे हैं हिंदुस्‍तान टाइम्‍स अखबार के दिल्ली स्थित कार्यालय के सामने 13 सालों से धरने पर बैठे पत्रकार रविंद्र ठाकुर की, जिसका शव शुक्रवार की सुबह अखबार के दफ्तर के बाहर मिला। बताया जाता है कि रविन्द्र ठाकुर ने कंपनी द्वारा बिना किसी नोटिस के बाहर किए गए 400 लोगों के परिवार को इंसाफ दिलाने के लिए धरना शुरू किया था। कुछ साथियों की आत्महत्या के बाद उन्होंने इस लड़ाई को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। शुरूआत में उनके जैसे कुछ लोग धरने पर बैठे रहे, लेकिन पारिवारिक समस्या के आगे सब टूट गए। अकेले बचे रविन्द्र ठाकुर ने हार नहीं मानी।

संभव है कि रविन्द्र ठाकुर को इस बात का मलाल रहा हो कि वे जिस पेशे में आए थे वो दिखावटी होता जा रहा है, जहां कभी विचारों की लड़ाई थी वहां प्रायोजकों जुटाने की जंग छिड़ी है। मुद्दे जनता के बीच से आने चाहिए थे वहां मुद्दे सोशल साइट्स पर ट्रेंड बनाकर पैदा किए जा रहे हैं। यहां पेशेवर वही है जो टीआरपी पकड़ना जानता हो, क्योंकि यही टीआरपी प्रायोजक लाती है। यहां इंसाफ की लड़ाई के भी प्रायोजक है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्लाबोल के भी। मानो बिना प्रायोजन सब शून्य है और वास्तविक पत्रकारिता उसी शून्य में समाहित हो चुकी है। इस शून्य के बाहर जो कुछ बचा है वह ब्रांड है, फलाने टीवी और ढ़िमाके टीवी।

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