हाल-ए-उप्र कारागार

लखनऊ: सिमी के 8 आतंकियों के मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की सेंट्रल जेल से फरार होने के बाद उत्तर प्रदेश के सभी जेलों में हाई अलर्ट कर दिया गया है। जेलों की सुरक्षा को लेकर सवाल भी खड़े हुए हैं। कई जेलों में आतंकवादी और नक्सली कैद हैं। फिर भी राम भरोसे ही चल रही है प्रदेश के जेलों की सुरक्षा व्यवस्था। लखनऊ के जिला कारागार में 27 आतंकियों सहित कई शातिर अपराधी व माफिया बंद हैं, लेकिन सुरक्षा के बंदोबस्त बेहद लचर हैं। जेल के निर्माण को लेकर पहले ही सवाल खड़े हो चुके हैं। जिला जेल में अब तक जैमर नहीं लगा है। यहां 52 सीसीटीवी कैमरे तो लगे हैं, जो आए दिन खराब रहते हैं। जिला जज, डीएम व एसएसपी सहित अन्य अधिकारी पिछले एक साल में कई बार जेल का औचक निरीक्षण कर चुके हैं, तब वहां सीसीटीवी कैमरे खराब पाए गए थे। वहीं डीएम ने कमेटी बनाकर जेल के निर्माण की जांच का आदेश दिया था। इस बाबत गोसाईंगंज थाने में जेल अधिकारियों की ओर से उप्र राजकीय निर्माण निगम के अधिकारियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। तहरीर में जुलाई 2015 की तकनीकी जांच समिति रिपोर्ट का हवाला दिया गया था।




जिला कारागार में 3640 बंदियों को रखने की क्षमता है। वर्तमान में यहां 3031 बंदी निरुद्ध हैं। इनमें 27 आतंकी भी हैं, जिन्हें हाई सिक्योरिटी बैरक में रखा गया है। इसके अलावा करीब डेढ़ सौ बंदी ऐसे हैं, जिन्हें संवेदनशीलता के लिहाज उच्च सुरक्षा वाली बैरकों में रखा गया है। जेल कारागार में मुख्य गेट से लेकर भीतर तक 52 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। सूत्रों के मुताबिक कई कैमरे खराब हैं। कुछ रसूखदार बंदियों की सुविधा के लिए भीतर के लोग भी कई बार कुछ कैमरों से छेड़छाड़ कर देते हैं। जिला कारागार में बंद शातिर अपराधियों व बंदियों के धड़ल्ले से मोबाइल फोन इस्तेमाल करने को लेकर भी बड़े सवाल उठते रहते हैं।1 बढ़ाई गई सुरक्षा-व्यवस्था : जेल अधिकारियों का कहना है कि हाई अलर्ट के बाद कारागार की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। मुख्य गेट पर डेढ़ सेक्शन अतिरिक्त पीएसी भी तैनात की गई है। जेल अधीक्षक शशिकांत मिश्र का कहना है कि जैमर लगाए जाने का काम अंतिम चरण में है। इस माह के अंत तक जैमर काम करना शुरू कर देगा। जेल में पर्याप्त सुरक्षाकर्मी मौजूद हैं।

केंद्रीय कारागार, नैनी में 1860 कैदियों की क्षमता है लेकिन मौजूदा समय में सजायाफ्ता व विचाराधीन मिलाकर 4085 कैदी हैं। गोरखपुर मंडलीय जेल में कई बार बवाल होने के बावजूद सुरक्षा के मानक पूरे नहीं किए जा सके हैं। छह माह पूर्व यहां जैमर लगाने की स्वीकृति शासन से मिली थी, लेकिन अभी इसकी कवायद तक शुरू नहीं हो पाई है। यहां पर 800 कैदियों की क्षमता है पर इस समय 1600 कैदी हैं। बस्ती जेल में क्षमता 480 कैदियों की है पर 1080 बंदी हैं। यहां पर भी न तो जैमर है और न ही सीसीटीवी कैमरे लगे हैं। यही हाल महराजगंज और सिद्धार्थनगर की है। 1बैरकों की तलाशी : बुंदेलखंड समेत मध्य यूपी के लगभग सभी जिला कारागारों में सुरक्षा व्यवस्था और चौकस कर दी गई है। बांदा मंडल कारागार में मंगलवार सुबह अचानक जेल अधिकारियों ने बैरकों की तलाशी ली लेकिन कोई गैरकानूनी सामान नही मिला। फरुखाबाद, फतेहपुर, हरदोई,इटावा, महोबा, हमीरपुर, उन्नाव तथा उरई जिला जेल का भी अधिकारियों ने निरीक्षण किया।



जेलों में कैदियों की सत्ता

उत्तर प्रदेश की जेलों में जहां संख्या से लगभग दोगुना कैदी बंद हैं, वहीं इन जेलों को संभालने के लिए जेलरों की संख्या उतनी भी नहीं है जितनी होनी चाहिए। लोग तो यह भी कहते हैं कि जेलों में ‘कैदियों की सत्ता’ है। कर्मचारियों की कमी ने प्रदेश की जेलों में कैदियों व जेल के कर्मचारियों की संख्या के अनुपात को बिगाड़ दिया है, जिसके चलते अब जेलों में अब कैदी ज्यादा और उन पर नजर रखने वाले कम हो गए हैं। सूत्रों का कहना है कि कैदी इसका बड़ा फायदा उठा रहे हैं। जेलों में कैदियों की संख्या निर्धारित संख्या से दोगुना है। यही वजह है कि जेलों में अब अराजकता और निरंकुशता बढ़ गई है। दबी जबान पर लोग यह कहने से गुरेज नहीं कर रहे कि जेल में ‘कैदियों की सत्ता’ है।

यूपी की जेल, जेल नहीं यातना शिविर हैं

वैसे तो आम धारणा है कि जेल जाने के बाद अपराधी सुधर जाते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश कि किसी भी जेल में ऐसा नहीं होता| क्योंकि यहाँ की जेल,जेल नहीं यातना शिविर हैं| यूपी में जेल जाने के बाद अपराधी सुधरते नहीं बल्कि वहां की अमानवी यंत्रणा झेल कर जब बाहर है, तब बन जाते हैं खूंखार अपराधी|

प्रदेश की सभी जेलों को मिलकर 47 हजार कैदियों को रखने का स्थान है लेकिन इनमें लगभग 84 हजार कैदी बंद हैं। आपको जानकार हैरत होगी कि 51379 कैदी ऐसे हैं जिनका अभी अंडरट्रायल चल रहा है। देश भर में हर वर्ष ऐसे कैदी निकलने हैं जिन्होंने किसी न किसी पेशे को कैद के दौरान दिल लगा कर सिखा है। वहीँ उत्तर प्रदेश के जेल से निकले किसी भी कैदी को यदि जीवन यापन के लिए कहा जाये तो वो कुछ भी नहीं कर सकता| यहाँ के अधिकतर कैदी अपनी सजा समाप्त करने के बाद जल्द ही वापस जेल आते हैं किसी और गुनाह की सजा काटने|

ऐसा क्यों होता है वो हम आपको बताते हैं, उत्तर प्रदेश की जेलों में चल रही है जेलरों और उसके प्यादों की सल्तनत| आज आप को पता चलेगा कि इन में एक बार गया एक छोटा अपराधी कैसे जल्द ही अपराध की दुनिया का बड़ा नाम बन जाता है |यही नहीं कैसे इन ऊँची दीवारों के पीछे डॉ. सचान जैसे राह के काँटों को बड़ी सफाई से निकाल फेंका जाता है|

सूबे की कोई भी जेल हो जब वहां अपने गुनाह में सजा पाए अपराधी प्रवेश करते हैं उस समय सभी को पहले एक बड़े कमरे में रखा जाता है| इस कमरे में खूंखार,शातिर अपराध के दोषियों के साथ छोटे मोटे अपराधी भी रखे जाते हैं| यहाँ सबसे पहले इनका सामना होता है पट्टेदार से, इसी पट्टेदार से उसे सोने की जगह मिलती है, और यहीं से आरंभ होता है पैसे का न खत्म होने वाला खेल, ये पट्टेदार उसे सोने की 5 फुट जमीन के लिए पैसे वसूलता है| सोने की जगह का रेट अलग अलग होता है जो जगह की और कैदी की हैसियत देख कर कम ज्यादा होता है |

इस प्रक्रिया को पट्टे लेना कहा जाता है| इन कैदियों से इनकी माली हैसियत देख कर जेल के अन्दर सुविधाओ का मोलभाव होता है| मसलन बीडी,सिगरेट चाय, दारू. मोबाईल और खाना जब कुछ यहाँ मनमाफिक मिलता है लेकिन इनके रेट तय है उनका भुगतान करने के बाद कैदी होता तो जेल में लेकिन मजे सारे उठाता है| पीली वर्दी वाले लम्बरदार तो पैसे मिलने पर जेल के बाहर से भी कुछ भी लाकर दे सकते हैं| यदि लम्बरदार को जेल के हर ताले की चाभी कहा जाये तो ज्यादा सही होगा|

ये तो हुई रेट की बात अब बताते हैं कि वसूली कैसे होती है|जिन अपराधियों का यहाँ अक्सर आना जाना होता है वो अपनी ज़रूरत के हिसाब से पैसे देकर पहले से ही बता देते हैं कि उनको क्या और कब चाहिए| वही दूसरी और जो छोटे मोटे अपराध में इन जेलों में आते हैं उनको पट्टेदार और लम्बरदार मिल कर बता देते हैं कि उनको कितने पैसे कब कब और कहाँ पर देने है| जेलों में बंद कैदियों को इनके साथ दबंग अपराधियों को भी पैसे देने होते हैं |

नए और छोटे अपराध में जेल आये कैदियों से उनके कामकाज के बारे में जानकारी ली जाती है| इसके बाद उनपर पैसे देने का दबाव डाला जाता है जो घर से माँगा कर पैसे दे देते है उनसे अच्छे से पेश आया जाता है वहीँ जो पैसे नहीं दे पाते उनको दूसरों के कच्छे बनियान और जेल के शौचालय धोने को मजबूर होना पड़ता है कोई प्रतिकार करता है तब उसकी पिटाई कर दिमाग सही किया जाता है| वसूली का सारा पैसा पट्टेदार से होते हुए जेलर तक जाते हैं |जेलर ही जेल कि सल्तनत का सुल्तान होता है उसके सामने ही ये सब होता है और वो देख कर भी कुछ नहीं देखता |




वहीँ जब कोई सफेदपोश दबंग,बाहुबली या प्रभावशाली अपराधी जेल में आता है तब पूरा जेल प्रशासन उसके पीछे कुत्ते की तरह दम हिलाता नज़र आता है |यही जेलकर्मी इनको ये बताते हैं कि कैसे वो कानून का सहारा ले कर फ्रिज कूलर का मजा ले सकता है इस पूरे घटनाक्रम में सबसे रोचक बात ये है कि इस काम में जेलर से लेकर जेल डॉ तक मददगार होते हैं |

ऐसा नहीं कि शासन प्रशासन में ऊचे पदों पर बैठे अधिकारीयों को ये सब पता नहीं सभी को पता है लेकिन कोई कुछ करता नहीं सभी चुप्पी मारे बैठे हैं |समझ में नहीं आता की आखिर क्यों इनके मुंह सिले हुए हैं| अब हम आप को जो बताने जा रहे हैं वो है उत्तर प्रदेश की जेलों का सबसे काला पहलु यहाँ किसी भी जेल में डॉ.सचान जैसा अघोर कांड करवाना सबसे आसान काम है चंद चाँदी के सिक्को के खनखनाहट में पूरा का पूरा स्टाफ बिक जाता है वो सफाई से अपना काम अंजाम देता है सबूत मिटाता है और बाहर बैठे अपने आका को सफलता का सन्देश देता है| इसके बाद सीबीआई जाँच करे या फिर जेम्स बांड कोई कुछ नहीं कर सकता|

तो आप ने देखा यहाँ वो सब कुछ होता है जो नहीं होना चाहिए लेकिन कैदियों को प्रेरित करने के लिए कुछ भी नहीं होता| किसी कैदी को कभी रोजगार से जुड़ा प्रशिक्षण नहीं दिया जाता| वर्त्तमान सपा सरकार के गठन के बाद निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह ”राजा भैया” जब कारागार मंत्री बने तो उन्होंने कैदियों से जुड़े कई वादे तो किये लेकिन उनको रोजगार आरंभ करने का कोई प्रशिक्षण मिलेगा या मिलता है इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा| फिलहाल हम यही कहेंगे की प्रदेश में पहले कुछ नयी जेलों का निर्माण हो और यहाँ सजा काट रहे कैदियों को ऐसा प्रशिक्षण दिया जाये की वो जब सजा काट कर बाहर निकलें तो सम्मान से दो वक्त की रोटी जुटा सकें|

Loading...