यूपी में बीजेपी की 32 साल में सबसे बड़ी जीत, 300 सीट जीतने वाली कांग्रेस की सबसे ज्यादा दुर्गति

लखनऊ: 11 मार्च को पांच राज्यों के चुनाव नतीजे सामने आए। सबसे ज्यादा चौंकाने वाले आंकड़े उत्तर प्रदेश के रहे। यहां तीन चौथाई बहुमत के साथ बीजेपी ने 15 साल बाद सत्ता में वापसी की। उसे 312 सीटें मिलीं। 37 साल बाद ऐसा हुआ जब इस राज्य में किसी पार्टी को 300+ सीटें मिलीं।

उधर, उत्तराखंड में कांग्रेस नेता और सीएम हरीश रावत चुनाव हार गए। यहां भी बीजेपी बहुमत में आ गई। वहीं, पंजाब में बादलों की हैट्रिक नहीं बनी। कांग्रेस ने सत्ता में 10 साल बाद वापसी की। आखिरी चुनाव लड़ रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस को जिता दिया। गोवा और मणिपुर में हंग असेंबली बनती दिखी। बीजेपी और कांग्रेस, दोनों में से किसी को भी इस राज्य में बहुमत नहीं मिला।

यूपी में बीजेपी की 32 साल में सबसे बड़ी जीत-

– बीजेपी यूपी में 1985 से चुनाव लड़ रही है। पहले चुनाव में उसने यूपी में 16 सीटें जीती थीं। 2017 के चुनाव में बीजेपी ने 1991 का रिकॉर्ड तोड़ दिया। उसे 312 सीटें मिलीं।
– 2017 का आंकड़ा राम मंदिर मुद्दे पर बीजेपी को 1991 में मिलीं 221 सीटों से भी कहीं ज्यादा है। वहीं, 2014 के लोकसभा चुनाव में वह 328 विधानसभा सीटों पर आगे थी। इस लहर को बीजेपी ने कायम रखा।
2) 37 साल बाद किसी पार्टी को 300+ सीटें
– पिछली बार 1980 में यूपी में कांग्रेस को 309 सीटें मिली थीं। अब 37 साल बाद ऐसा हुआ है कि किसी पार्टी को 300+ सीटें मिलीं हैं।
– यूपी में सबसे ज्यादा सीटें जीतने का रिकॉर्ड भी कांग्रेस के ही नाम है। उसने 1951 के पहले चुनाव में यूपी की 430 में से 388 सीटें जीती थीं।
3) किससे कितनी आगे बीजेपी?
– बीजेपी और अलायंस ने मिलकर 325 सीटें जीत लीं। इस लिहाज से वह सपा-कांग्रेस गठबंधन (54 सीटें) से 6 गुना ज्यादा और बीएसपी (19 सीटें) से 16 गुना ज्यादा सीटें ले आई।

388 सीटें जीतने वाली कांग्रेस की सबसे ज्यादा दुर्गति

388 सीटें जीतने वाली कांग्रेस की इस चुनाव में सबसे ज्यादा दुर्गति हुई है। कांग्रेस को महज़ सात सीटें मिली हैं और वोट प्रतिशत है सिर्फ छह फीसदी। कहना गलत न होगा कि सपा-कांग्रेस गठजोड़ का सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ है। ऐसा तब हुआ जबकि प्रदेश में सबसे ज्यादा वोट प्रतिशत पाने का रिकार्ड पांच बार उसकी झोली में रहा है।स्वतंत्रता के बाद से पचास व साठ के दशक में कांग्रेस के सामने विपक्ष का कोई वजूद नहीं दिखता था लेकिन देश के बंटवारे से लेकर रियासतों की राजनीति के कारण इस पार्टी के खिलाफ बेहद कमजोर लेकिन धीरे-धीरे हवा बननी शुरू हो गई थी। नतीजा साठ के दशक के अंत आते-आते मसलन 1967 में भारतीय जनसंघ ने पहली बार कांग्रेस को कमजोर करना शुरू कर दिया।

नतीजा कांग्रेस की विजयी सीटें कम होने लगीं। तमाम नीतियों के विरोध के कारण पार्टी के खिलाफ मजबूत विपक्ष खड़ा होना शुरू हो गया और 1977 में जनता पार्टी ने प्रदेश में 47.76 प्रतिशत मत प्राप्त कर एक रिकार्ड तक बना डाला जिसे आज तक कोई पार्टी नहीं तोड़ सकी है। हालत यह हो गई कि 1984 में इन्दिरा हत्याकाण्ड के बाद पार्टी के पक्ष में सहानुभूति की प्रचंड लहर थी और कांग्रेस को 39 फीसदी से ज्यादा वोट मिले लेकिन वह भी उसे 1977 के रिकार्ड तक नहीं पहुंचा सका।

1989 के चुनाव तक तो कांग्रेस व जनता पार्टी समेत अन्य विपक्ष का प्रतिकार करता रहा लेकिन इस चुनाव के बाद प्रदेश में कांग्रेस के पैर उखड़ने लगे। नब्बे के दशक में शुरू हुए मन्दिर आन्दोलन ने तो कांग्रेस की हवा ही निकाल दी। पार्टी उस समय से जो कमजोर होनी शुरू हुई तब से आज तक सम्भल नहीं पाई ।