योगी के यूपी में कुपोषण जनित बीमारी से एक ही परिवार के तीन बच्चों की मौत

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Up Me Kuposhan Se Hui Teen Maut

बस्ती: कुपोषण यूं तो आधी दुनिया के लिए समस्या बना हुआ है। भारत जैसे देश में इस समस्या से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर करीब दर्जनभर प्रयास चल रहे हैं। जिसमें केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकारें और उनके अलग अलग विभाग अपने स्तर पर योजनाएं चलाकर कुपोषण से निपटने के दावे करते हैं।

इन दावों की पोल उत्तर प्रदेश में खुली है। जहां एक ही परिवार के तीन बच्चों ने एक के बाद एक दम तोड़ दिया, लेकिन कुपोषण रोकने के लिए मोटी तनख्वा पर अपने बच्चों को पालने वाले सरकारी नौकरों तक मामला नहीं पहुंचा। कुपोषण ने इस परिवार के तीन बच्चों को इस हद तक अपनी चपेट में लिया कि उनकी जीवन लीला ही समाप्त हो गई।

घटना शुक्रवार की है जब बनकटी विकास खंड के कैथौरा गांव के निवासी विनोद की 5 वर्षीय पुत्री गुड़िया की मौत हो गई। पीड़ित पिता का कहना है कि उसकी बेटी जब अपनी अंतिम सांसे गिन रही थी, उस समय अस्पताल के डॉक्टर उसे एक जगह से दूसरी जगह रेफर कर रहे थे। आखिरकार उसकी बेटी ने दम तोड़ दिया।

बकौल विनोद गुड़िया की तबीयत खराब होने पर वह उसे लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनकटी ले गया। वहां पर मामूली इलाज के बाद सरकारी एंबुलेंस से उसे जिला अस्पताल में स्थित पुनर्वास केंद्र बस्ती रेफर कर दिया गया। पुनर्वास केंद्र पर तैनात लोगों ने पल्ला झाड़ते हुए उसे टीबी अस्पताल रेफर कर दिया।

वहां तैनात चिकित्सक ने गुड़िया के इलाज में रुचि न दिखाते हुए उसे बाबा राघव दास मेडिकल कालेज गोरखपुर ले जाने की सलाह दी, साथ ही हिदायत दी कि पीएचसी बनकटी पर बलगम की जांच करा लेना। बलगम की जांच में टीबी की भी पुष्टि हुई। लेकिन पीएचसी पर बच्चों के टीबी की दवा मौजूद नहीं थी। आखिरकार इलाज के अभाव में गुड़िया नें शुक्रवार को दम तोड़ दिया।

जब इस विषय में अधिकारियों से बात की गई तो उन्होंने सारी सरकारी लापरवाई कुपोषण के मत्थे मढ़ दी, लेकिन उनसे जब यह पूछा गया कि क्या कुपोषण रजिस्टर में गुड़िया का नाम दर्ज था, तो जवाब में बताया गया कि आंगनबाड़ी कार्यकत्री हड़ताल पर हैं। हड़ताल खत्म होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि गुड़िया का नाम लाल श्रेणी में दर्ज था या नहीं।

लेकिन गुड़िया की कहानी इ​तनी भर नहीं थी, क्योंकि सितंबर के महीने में उसके छोटे भाई और बहन की मौत कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में हो गई थी। उन दोनों को भी टीबी हुई थी। उस समय गांव में कुपोषण उन्मूलन योजना के लिए जिम्मेदार सरकारी कर्मचारियों ने इस बात का खयाल नहीं रखा कि विनोद के अन्य बच्चों की जांच भी करवाई जाए।

तीन बच्चों की मौत से टूट गया परिवार

दिवगंत गुड़िया की 4 वर्षीय बहन सुनीता एवं 3 वर्षीय भाई शंकर की सितंबर माह में 15 दिन के अंतराल में कुपोषण से मौत हो चुकी है। मेहनत मजदूरी करके जीवन यापन करने वाला विनोद किसी प्रकार बच्चों को पाल पोस रहा था। असमय तीन बच्चों की मौत से वह टूट गया है। पत्नी नीलम को ¨चता है कि ¨जदा बचे दो बच्चे दिलीप 9 एवं डेढ़ वर्षीय शिवम भी कहीं कुपोषण का शिकार न हो जाएं।

बस्ती: कुपोषण यूं तो आधी दुनिया के लिए समस्या बना हुआ है। भारत जैसे देश में इस समस्या से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर करीब दर्जनभर प्रयास चल रहे हैं। जिसमें केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकारें और उनके अलग अलग विभाग अपने स्तर पर योजनाएं चलाकर कुपोषण से निपटने के दावे करते हैं। इन दावों की पोल उत्तर प्रदेश में खुली है। जहां एक ही परिवार के तीन बच्चों ने एक के बाद एक दम तोड़ दिया, लेकिन…