UPPSC भर्ती घोटाले की सीबीआई जांच में फंसा पेंच, योगी सरकार का बैकफुट पर जाना तय

यूपीपीएससी भर्ती घोटाले की सीबीआई जांच में फंसा पेंच, योगी सरकार का बैकफुट पर जाना तय

लखनऊ। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग आयोग (UPPSC) में जाति विशेष के उम्मीदवारों को पक्षपात पूर्ण तरीके से चयनित करने के मामले में सीबीआई जांच की अधिसूचना जारी करने वाली उत्तर प्रदेश की नवनिर्वाचित सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार को इलाहाबाद हाईकोर्ट से तगड़ा झटका मिलता नजर आ रहा है। जानकारों की माने तो यूपीपीएससी के चेयरमैन डॉ. अनिरुद्ध सिंह यादव की ओर से भर्ती घोटाले की सीबीआई जांच की अधिसूचना को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दे डाली है। यूपीपीएससी की ओर से दाखिल की गई याचिका पर हाईकोर्ट 9 जनवरी को सुनवाई करेगा, अदालत ने यूपी सरकार से जांच के फैसले को लेकर अपना पक्ष रखने को कहा है। कानूनी लिहाज से सीएम योगी को इस मामले में बैकफुट पर जाना पड़ेगा।

मिली जानकारी के मुताबिक अप्रैल 2012 से मार्च 2017 के बीच यूपीपीएससी के द्वारा की गई तमाम ​भर्तियों में हुए घोटाले की सीबीआई जांच की अधिसूचना को चुनौती देते हुए कहा गया है कि यूपीपीएससी पूरी तरह से स्वायत्त संस्था है, जिसकी स्थापना संविधान के अनुच्छेद 315 से 319 के तहत की गई है। संवैधानिक रूप से यूपीपीएससी के कार्य और अधिकार क्षेत्र में प्रदेश सरकार सीधे तौर पर हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। एक संस्था के रूप में यूपीपीएससी की जवाबदेही राज्यपाल और राष्ट्रपति कार्यालय को है न कि प्रदेश सरकार को। इसलिए प्रदेश सरकार यूपीपीएससी द्वारा की गई भर्तियों पर प्रश्नचिन्ह लगाने का अधिकार नहीं रखती।

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यूपीपीएससी के चेयरमैन डॉ.अनिरुद्ध सिंह बने सीबीआई जांच में रोड़ा—

15 मार्च 2016 को यूपीपीएससी के चेयरमैन बने डॉ. अनिरुद्ध सिंह यादव की नियुक्ति अखिलेश सरकार की सिफारिश पर राज्यपाल द्वारा की गई थी। संवैधानिक रूप से डॉ. अनिरुद्ध सिंह यादव का कार्याकाल छह साल का है। जानकारों की माने तो यूपी सरकार की ओर से अप्रैल 2012 से मार्च 2017 के दौरान हुई भर्तियों की सीबीआई जांच करवाने के फैसले को डॉ. अनिरुद्ध सिंह यादव ने बड़ी सोची समझी योजना और पुख्ता कानूनी सलाह के बाद चुनौती दी है। जिन कानूनी तथ्यों के आधार पर यूपीपीएससी ने हाईकोर्ट की राह पकड़ी है उनमें यूपीपीएससी द्वारा सीबीआई जांच का विरोध 100 प्रतिशत उसके पक्ष में जाता नजर आ रहा है।

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सीबीआई जांच की अधिसूचना से पहले क्यों नहीं हटाए गए डॉ. अनिरुद्ध सिंह ​यादव—

यूपीपीएससी के वर्तमान चेयरमैन डॉ. अनिरुद्ध सिंह यादव की ओर से सीबीआई जांच को चुनौती देने के बाद उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की सोच पर ​सवाल उठने लाजमी हैं। कहा जाने लगा है कि यूपी सरकार को डॉ. अनिरुद्ध सिंह यादव को चेयरमैन के पद से हटाने के बाद ही सीबीआई जांच करवाने की अधिसूचना जारी करनी चाहिए थी।

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ऐसे तमाम सवालों के बीच कुछ तथ्य ऐसे हैं जो यूपीपीएससी भर्ती घोटाले में सीबीआई जांच की अधिसूचना जारी करने की मंशा पर ही सवाल खड़े कर देता है। कानूनी जानकारों की माने तो यूपीपीएससी एक संवैधानिक संस्था है, जिसके चेयरमैन यानी अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल के पास है। जिसमें राज्य सरकार बेहद अहम भूमिका निभाती है। लेकिन जब आयोग के चेयरमैन को हटाने की बात आती है तो इसमें प्रदेश सरकार की कोई भूमिका नजर नहीं आती, संविधान के अनुच्छेद 317 के मुताबिक लोक सेवा आयोग के सदस्यों को हटाने का अधिकार केवल राष्ट्रपति के पास है, राष्ट्रपति कार्यालय के लिए भी ऐसा करने के लिए शर्ते रखी गईं हैं।

कानूनी पक्ष की नजरंदाजी कर लिया गया यूपीपीएससी भर्ती घोटाले की सीबीआई जांच का फैसला-

कानूनी लिहाज से पूरे प्रकरण को देखा जाए तो यूपीपीएससी भर्ती घोटाले की सीबीआई जांच करवाने का फैसला पूरी तरह से राजनैतिक नजर आ रहा है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सत्तारूढ़ बीजेपी के द्वारा निर्वासित समाजवादी सरकार की नीतियों के खिलाफ चुनावी मंचों से की गई बयानबाजी को ध्यान में रखते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ ने यूपीपीएससी घोटाले की सीबीआई जांच करवाने की अधिसूचना तो जारी कर दी लेकिन उनके सिपहसलारों ने संवैधानिक आधार पर प्रदेश सरकार की सीमाओं को इस मामले में पूरी तरह से नजरंदाज किया है।

हकीकत में प्रदेश सरकार को यूपीपीएससी के कार्यक्षेत्र में किसी प्रकार का हस्तक्षेप करने का अधिकार ही नहीं है। ऐसे में वह यूपीपीएससी भर्ती घोटाले की सीबीआई जांच करवाने का फैसला स्वयं कैसे ले सकती है। संभवतय: योगी सरकार को यूपीपीएससी भर्ती घोटाले पर अपना पहला कदम पीछे ही लेना पड़ेगा, और आगे की कार्रवाई के लिए अपने कानूनी सलाहाकारों की योग्यता को परखना होगा।

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