UPRNN में 350 करोड़ के घोटाले को दबाने के लिए डाली गई 3.32 करोड़ की मिट्टी

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के सरकारी विभागों में बैठे घोटालेबाज बहुत दूर की सोच रखते हैं। अपनी कुर्सी को बचाने के लिए अधीनस्थों को हमप्याला बनाकार मोहरा बनाया जाता है और करोड़ों डकारने के बाद जांच के नाम पर उन्हीं अधीनस्थों को बली का बकरा बनाकर घोटालों की फाइलें दफन कर दी जातीं हैं।

हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम (UPRNN) की वाराणसी यूनिट में 2011 से 2013 के बीच हुए 350 करोड़ के घोटाले की। जो अब यूपीआरएनएन पर 700 करोड़ की देनदारी के रूप सिर उठाकर खड़ा हो गया है।

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निगम की वाराणसी रीजन की अलग-अलग यूनिटों ने भवन निर्माण के लिए मिले करीब 350 करोड़ रूपए कागजों पर बिल्डिंग बनाकर ठेकेदारों की मिलीभगत से हजम कर लिए। चूंकि सिस्टम ऊपर तक भ्रष्ट था इसलिए जिम्मेदारों ने नोटों की खुशबू के आगे अपनी आंखें मीच रखीं थीं। नोटों की खुशबू का आना जैसे ही बंद हुई अधिकारियों की ईमान एकाएक जाग गया। आनन फानन में एक औपचारिक जांच शुरू करवाई गई और वाराणसी यूनिट के एक एकाउंटेंट और एक प्रोजेक्ट मैनेजर को संयुक्त रूप से दोषी पाते हुए 3.32 करोड़ की रिकवरी के आदेश के साथ बर्खास्त कर दिया गया।

जानकारों की माने तो इस पूरी मिली भगत में सबसे बड़ी भूमिका निगम के लेखा नियंत्रक की होती है। निगम के आंतरिक संविधान के अनुसार कंट्रोलर आॅफ एकाउंट्स (लेखा नियंत्रक) की जिम्मेदारी होती है कि निगम मुख्यालय से क्षेत्री कार्यालय और इकाईयों के खातों में जाने वाले बजट की प्रति दो माह पर समीक्षा करे। जिसके लिए लेखा नियंत्रक को यूनिटों के दौरे कर वहां प्रयोग हो रही निर्माण सामग्री के दामों की समीक्षा करना आवश्यक होता है।

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350 करोड़ के इस घोटाले में तत्कालीन लेखा नियंत्रक और वर्तमान में वित्तीय सलाहकार विनोद कुमार ​प्रभाकर की ओर से बड़ी लापरवाई की गई। जब प्रभाकर को विभाग को हुए नुकसान में अपनी गर्दन नपती नजर आई उन्होंंने अपनी पहुंच का लाभ उठाया। मुख्यालय में बैठे अपने जैसे अन्य लोगों को भी इस मामले में फंसने का हवाला देकर बीच का रास्ता निकाला गया।

कहा जाता है न कि लोहे को लोहा ही काटता है, इसलिए बड़े भ्रष्टाचार को ढ़ंकने के लिए छोटे भ्रष्टाचार का लिहाफ तैयार किया गया। साल 2011 से 2013 के बीच हुए घोटाले को कवर करने के लिए साल 2014 में निगम के लखनऊ मुख्यालय से दो जांचे शुरू होतीं हैं। जिनमें कुल 3.32 करोड़ के गैरप्रस्तावित कार्य करवाने (जिसमें एक आरोप पत्र में करीब 2.60 करोड़ का मिट्टी भराई और दूसरे में बिना प्रशासनिक संतुति के भवन निर्माण के काम को जांच का विषय बनाया गया।) के आरोप में वाराणसी की यूनिट—2 के एक एकाउंटेंट और एक प्रोजेक्ट मैनेजर को रिकवरी के साथ बर्खास्त कर दिया।

एक तरफ यह कार्रवाई चल रही थी तो दूसरी ओर लेखा नियंत्रक विनोद कुमार प्रभाकर अपनी जिम्मेदारियों से छुटकारा पाने की जुगत में लगे थे। शायद वह जानते थे कि आज नहीं तो कल 350 करोड़ के ​घोटाले का जिन्न बाहर निकलेगा। सत्ता में अपनी मजबूत पहुंच के कारण प्रभाकर कामयाब रहे और मुख्यालय की जांच में वाराणसी की इकाई—2 के दो कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त होने के करीब दो महीने बाद ही उन्होंने निगम के वित्तीय सलाहकार के रूप में नई जिम्मेदारी संभाल ली।

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अब तीन साल बाद इस घोटाले ने ​यूपीआरएनएन के खातों पर 700 करोड़ की देनदारी चुकाने की तलवार लटका दी है। जिन सरकारी विभागों ने यूपीआरएनएन ने भवन निर्माण के लिए 350 करोड़ रुपए दिए थे उन्होंने भवन के लिए दावा ठोंक दिया है। यूपीआरएनएन के सामने सबसे बड़ी समस्या ये है कि उसके खातों में आई रकम तो खर्च हो चुकी है, लेकिन विभागों को देने के लिए बिल्डिंग उसके पास नहीं है। वर्तमान समय में उन्हीं भवनों के निर्माण के लिए निगम को कम से कम 700 करोड़ रुपए की जरूरत होगी।

निर्माण निगम के सामने खड़ी इस समस्या को प्रमुख सचिव लोक निर्माण विभाग ने बड़ी गंभीरता से लिया है। सूत्रों की माने तो इस मामले में प्रमुख सचिव ने निर्माण निगम को विभागीय जांच करने के आदेश दिए थे, लेकिन निगम के नए प्रबंध निदेशक 700 करोड़ जैसी बड़ी रकम से जुड़े सालों पुराने भ्रष्टाचार की जांच शासकीय स्तर पर करवाने की अपील की है। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि इस मामले की शासकीय जांच में इस घोटाले की वास्तविकता जरूर सामने आएगी।

स्मारकों के निर्माण में भी तत्कालीन लेखानियंत्रक प्रभाकर ने किया बड़ा खेल —

​करीब 10 सालों तक यूपीआरएनएन के लेखानियंत्रक रहने के बाद 2014 में वित्तीय सलाहकार बने विनोद कुमार प्रभाकर ने यूपीआरएनएन को मायावती सरकार के दौरान भी बड़े भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का काम किया था। लखनऊ में मायावती के ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में यूपीआरएनएन द्वारा बनाए गए विभिन्न स्मारकों और पार्कों के निर्माण के लिए खरीदे गए पत्थरों में बड़े स्तर पर हुई धांधली लोकायुक्त की जांच में सामने आ चुकी है।

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लोकायुक्त ने अपनी जांच में कहा था कि निर्माण निगम ने पत्थरों की खरीद बाजार रेट से 40 प्रतिशत अधिक कीमत पर की गई। इस खरीद को बतौर लेखा नियंत्रक विनोद कुमार प्रभाकर के कार्यकाल में ही अंजाम दिया गया। लेखा नियंत्रक के रूप में प्रभाकर की जिम्मेदारी थी कि वे निर्माण सामग्री की बाजार कीमत की समीक्षा करते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। फिलहाल इस घोटाले की जांच ईओडब्ल्यू कर रही है। ऐसे एक या दो नहीं कई अन्य मामले है जिनमें प्रभाकर ने बतौर लेखा नियंत्रक अपने कर्तव्यों पर निवर्हन सूचिता के साथ नहीं किया।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के सरकारी विभागों में बैठे घोटालेबाज बहुत दूर की सोच रखते हैं। अपनी कुर्सी को बचाने के लिए अधीनस्थों को हमप्याला बनाकार मोहरा बनाया जाता है और करोड़ों डकारने के बाद जांच के नाम पर उन्हीं अधीनस्थों को बली का बकरा बनाकर घोटालों की फाइलें दफन कर दी जातीं हैं। हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम (UPRNN) की वाराणसी यूनिट में 2011 से 2013 के बीच हुए 350 करोड़ के घोटाले की। जो…
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