इस विधानसभा सीट का इतिहास बड़ा निराला

कायमगंज: यूपी के फर्रुखाबाद जिले की कायमगंज विधान सभा सीट का इतिहास भी बड़ा निराला है। यहाँ का विधायक बनना भी सौभाग्यशाली होने के साथ ही दुर्भाग्यशाली भी होता है. पिछले नौ चुनावों का इतिहास यही है जो जीतकर विधायक बन गया मान लो उसके राजनीतिक पतन के दिन शुरू हो गए। विधायक कायमगंज दुबारा विधायक तो नहीं बन पाए उलटे राजनीति में भी हंसिये पर आ गए। अच्छे अच्छे कायमगंज से चुनाव लड़ने से तौबा करने लगे। राजनीति के पंडितों का मानना है कि न तो राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं हैं और न लोगों का मिजाज। ऐसे में सीट पर नो रिपीट की परंपरा दोहराए जाने से इनकार नहीं किया जा सकता।

कायमगंज विधान सभा सीट नो रिपीट एमएलए सीट बन गयी है। 1977 के विधान सभा चुनाव सीट से कायमगंज की सियासत ने कुछ ऐसा करवट ली कि नेता जी पूरी जद्दोजहद के बाद विधायक तो बन गए पर विधायकी के कार्यकाल के बाद उनकी सियासत हंसिये पर आ गयी। एक बार के पूर्व विधायकों ने सियासत में हाथ- पाँव तो आजमाए पर उनका कद सिकुड़ता गया। 1977 की जनता पार्टी की आंधी में गिरीश चन्द्र तिवारी कायमगंज से विधायक चुने गए थे। लेकिन 1980 के चुनाव में उनके निकटतम प्रतिद्वंदी रहे अनवार मोहम्मद खान विधायक बने।




अनवार खान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे वह दो बार कमालगंज क्षेत्र से विधायक और फर्रुखाबाद सीट से लोकसभा चुनाव लड़े पर कभी कुछ हासिल नहीं कर पाए। 1985 के विधान सभा चुनाव में निर्दलीय राजेंद्र सिंह गंगवार चुनाव जीत कर विधायक बने। लेकिन 1989 में वह रिपीट न हो पाए। यही नहीं इस विधायकी के बाद राजेंद्र सिंह गंगवार को राजनीति का कोई सम्मानजनक पद नहीं मिल पाया। 1989 में यहाँ से निर्दलीय फकीरे लाल राजपूत विधायक चुने गए. लेकिन वह 1991 में अपने निकटतम प्रतिद्वंदी रहे इज़हार आलम खान से चुनाव हार गए। 1989 में इजहार आलम खान पहली बार विधायक चुने गए। लेकिन उसके बाद से आज तक वह कोई चुनाव नहीं जीत सके।

1997 के विधान सभा चुनाव में भाजपा के सुशील शाक्य ने निवर्तमान विधायक इजहार आलम खान को हरा दिया। इसके बाद सुशील शाक्य 2002 और 2007 का चुनाव भी लड़े। यही नहीं 2012 के चुनाव में उन्होंने क्षेत्र बदलकर चुनाव लड़ा पर दोबारा जीत का मुंह नहीं देख पाए. 2002 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस की लुईस खुर्शीद विधायक चुनी गयी। इसके बाद वह 2007 में कायमगंज से और 2012 में फर्रुखाबाद से विधायकी का चुनाव लड़ीं। यही नहीं 2004 में फर्रुखाबाद सीट से लोक सभा का चुनाव लड़ीं। पर अब तक न वह विधायक बन पाईं और न विधायक।

2007 के विधान सभा चुनाव में बसपा के कुलदीप गंगवार विधायक चुने गए. पर अमृतपुर सीट से 2012 का चुनाव हार गए। विधान सभा क्षेत्र दलित आरक्षित हो जाने पर 2012 में सपा के अजीत कठेरिया विधायक चुने गए थे. अब पिछले आठ चुनावों के ट्रेंड को देखते हुए किसी के राजनीतिक भविष्य के बारे में कुछ भी क्लियर कट नहीं कहा जा सकता। लम्बे समय से राजनीति के जानकार और विश्लेषक रहे राकेश चौहान का कहना है कि इस क्षेत्र के विधायक मतदाताओं की कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे हैं इसलिए मतदाता हर चुनाव में नया प्रयोग करता है. कई चुनावों के संयोजक और संचालक रह चुके डा. दिनेश अग्निहोत्री का कहना है कि वादाखिलाफ नेताओं को यहाँ के मतदाता सबक सिखाते हैं. इसके बाद भी कोई सबक लेने को तैयार नहीं है।

जालौन से सौरभ पाण्डेय की रिपोर्ट

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