वाराणसी भगदड़: शिवपाल के करीबी पंकज बाबा पर कार्यवाही क्यों नहीं ?





वाराणसी: पंकज यादव की ओर से डोमरी चंदौली में 15 और 16 अक्टूबर को कराए गए समागम के दौरान राजघाट पुल पर मची भगदड़ में 25 लोगों की मौत और सैकड़ों घायल होने के मामले में भले ही शहर के जिम्मेदार अधिकारियों का निलंबन और हस्तांतरण हुआ हो साथ ही दूसरी तरफ पुलिस द्वारा आश्रम के प्रबंधक समेत पांच लोगों के खिलाफ रामनगर थाने में मुकदमा भी कायम कराया हो,लेकिन जो बड़ी बात यह हैं कि मुख्य आयोजनकर्ता पंकज यादव उर्फ पंकज बाबा के खिलाफ प्राथमिकी अब तक दर्ज क्यों नहीं किया गया? शायद इसके पीछे बाबा का सपा प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव का करीबी होना तो नहीं ?

ह्रदय विदारक घटना के बाद जाएगी स्थानीय प्रशासन और नेता भले ही अपने को पाक साफ़ साबित करे लेकिन पूरी घटना के खलनायक अब भी पुलिस कार्यवाही से कोसों दूर हैं। पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों पर गाज गिरने के बाद तय माना जा रहा था कि अब आयोजकों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई होगी। अंदेशा था कि पंकज यादव के खिलाफ मुकदमा कायम होगा इसलिए सोमवार को दोपहर में ही पंकज यादव ने लाव-लश्कर के साथ बनारस छोड़ मथुरा को निकल भागा ।


रामनगर थाना प्रमुख ने राजघाट पुल पर 15 अक्टूबर को शोभायात्रा के दौरान मची भगदड़ के दौरान हुई मौतों के मामले में आयोजनकर्ताओं पर सूचनाओं के छिपाने व लापरवाही के आरोप में जय गुरुदेव आश्रम के प्रबंधक बेचू प्रसाद गुप्ता समेत चरण सिंह, बाबूराम , अवधेश मणि त्रिपाठी और जसवंत प्रसाद के खिलाफ अपने ही थाने में आईपीसी की 143, 149, 177, 188, 304, 420 धारा के तहत मुकदमा पंजीकृत किया है ।

बताते चले कि जय गुरुदेव के उत्तराधिकारी पंकज बाबा की ओर से वाराणसी के रामनगर स्थित डोमरी इलाके में दो दिवसीय सत्संग समागम का आयोजन किया गया था। आयोजन के पहले दिन 15 अक्टूबर को समर्थकों ने शोभायात्रा निकाली थी। शोभायात्रा में लाखों श्रद्धालुओं के जुटने के चलते राजघाट पुल पर भीषण जाम लग गया। इस दौरान पुल टूटने की अफवाह फैल गई। अफवाह के बाद ऐसी भगदड़ मची कि 25 लोगों की मौत हो गई जबकि कई लोग जख्मी हो गए।

वाराणसी में जय गुरुदेव के श्रद्धालुओं की जुटान आध्यात्मिक नगरी काशी में यू हीं नहीं जुटी थी। इस आयोजन को लेकर व्यापक पैमाने पर तैयारी की गई थी। भगदड़ में इतने लोगों की मौत न होती तो जिला प्रशासन और पुलिस महकमा सोता रहता और बनारस में गंगा किनारे मथुरा के जवाहर बाग की तर्ज पर एक शहर बसा दिया गया होता।

धर्म नगरी मथुरा के जवाहर बाग में जय गुरुदेव के शिष्य रामवृक्ष यादव ने कब्जा कर रखा था। बाग में हथियार बंद लड़ाकों की फौज थी। बीते जून को जब पुलिस जवाहर बाग खाली कराने पहुंची थी तब रामवृक्ष के समर्थकों ने हल्ला बोल दिया था और तत्कालीन एसपी सिटी की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। रामवृक्ष भी जय गुरुदेव का उत्तराधिकारी बनने की कतार में था लेकिन सपा सुप्रीमो के भाई शिवपाल यादव का हाथ उनके दूसरे शिष्य पंकज यादव पर था और पंकज को उन्होंने उत्तराधिकारी बनवा दिया।

सूत्रों के अनुसार पंकज यादव जय गुरुदेव का उत्तराधिकारी बनने के बाद शिवपाल यादव का और खास बन गया। पश्चिम में सपा के मजबूत होने के बाद शिवपाल की निगाहें पूर्वी उत्तर प्रदेश पर थी। पंकज यादव को पूरब में जमीन तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। सूत्रों के अनुसार पंकज यादव ने मथुरा के बाद पूरब में जड़ें जमाने के लिए धर्म नगरी काशी को चुना।




पंकज यादव व उसके समर्थक लंबे समय से यहां शाकाहार यात्रा के बहाने वाराणसी में बड़ा आयोजन करना चाहते थे। रामनगर में गंगा किनारे डोमरी, कटेसर इलाके को चुना गया। अनुयायियों को ठहराने के नाम पर रामनगर में गंगा किनारे बीते एक माह से तैयारी चल रही थी। सारा काम बड़ी खामोशी से हो रहा था और जिला प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगने दी गई। भगदड़ के बाद जब आला अधिकारी मौके पर पहुंचे तो हैरान रह गए क्योंकि उनके सामने नजारा कुछ ऐसा था। नेपाल से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों से समर्थक अपने साजो-सामान के साथ आए थे।

जय गुरुदेव के अनुयायियों ने गंगा किनारे एक छोटा सा शहर बसा दिया था। टेंट लगाकर सिर छिपाने की जगह के साथ ही आठ सौ से अधिक पंडाल बनाए गए थे। एक छोटा सा बाजार भी बन गया था जहां रोजमर्रा की जरूरतों के सारे सामान मिल रहे थे। पेयजल के लिए जमीन खोदकर ट्यूबवेल लगा दिया गया था। बिजली, पानी, अन्न, पार्किंग आदि की व्यवस्था भी आयोजकों ने कर रखी थी। पंकज यादव के संस्था से जुड़े पदाधिकारियों ने इन सब कार्यों के लिए बाकायदा अलग-अलग विभाग बना रखे थे और अपने साथियों की तैनाती कर रखी थी।

मथुरा के जवाहर बाग में जिस तरह रामवृक्ष यादव समानांतर सरकार चला रहा था, वाराणसी में भी पंकज यादव की गंगा किनारे पांच किलोमीटर के दायरे में एक तरह से सरकार चल रही थी। सूत्रों की माने तो पंकज यादव व उनके समर्थकों की योजना तो यहीं थी कि पहले एक सभा करके इधर के लोगों का मूड भांपेंगे और फिर आगे की रूपरेखा तय की जाएगी। पंकज यादव को भी उम्मीद नहीं थी कि भीड़ इतनी हो जाएगी। पूरब में इतनी भीड़ देखकर प्रफुल्लित पंकज यादव अपनी योजना को अमलीजामा पहनाने की तैयारी में था कि भगदड़ मच गई और सारी योजनाएं धरी रह गई। सत्संग समागम के पहले दिन ही हादसा होने से दूसरे दिन की सभा शोकसभा में बदल गई लेकिन पंकज यादव ने फिर भी दो घंटे तक प्रवचन दिया और अपने अनुयायियों को शहीद का दर्जा तक दे दिया था।