Vat Savitri Vrat 2019: जाने महिलाएं क्यों रखती हैं वट सावित्री व्रत और क्या है इसका महत्त्व

Vat Savitri Vrat 2019: जाने महिलाएं क्यों रखती हैं वट सावित्री व्रत और क्या है इसका महत्त्व
Vat Savitri Vrat 2019: जाने महिलाएं क्यों रखती हैं वट सावित्री व्रत और क्या है इसका महत्त्व

लखनऊ। ज्येष्ठ कृष्णपक्ष की अमावस्या को वट सावित्री की पूजा की जाती है। इस बार यह सोमवार यानि 3 मई को वट सावित्रि व्रत किया जा रहा है। इस दिन सुहागिन औरतें वट वृक्ष यानि बरगद का पूजा पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत करती हैं। आज हम आपको वट वृक्ष का महत्व बताने जा रहे हैं और महिलाएं क्यों रखती हैं वट सावित्री व्रत इसके बारे में बताने जा रहे हैं।

Vat Savitri Vrat 2019 Date Shubh Muhurat And Significance Of Vat Vriksha :

वट वृक्ष का महत्व

  • वट देव वृक्ष है, वट वृक्ष के मूल में भगवान ब्रह्मा, मध्य में जनार्दन विष्णु तथा अग्रभाग में देवाधिदेव शिव स्थित रहते हैं।
  • देवी सावित्री भी वट वृक्ष में प्रतिष्ठित रहती हैं।
  • इसी अक्षय वट के पत्रपुटक पर प्रलय के अन्तिम चरण में भगवान श्रीकृष्ण ने बालरूप में मार्कण्डेय ऋषि को प्रथम दर्शन दिया था।
  • प्रयागराज में गंगा के तट पर वेणीमाधव के निकट अक्षय वट प्रतिष्ठित है।
  • हानिकारक गैसों को नष्ट कर वातावरण को शुद्ध करने में वट वृक्ष का विशेष महत्व है।
  • वट वृक्ष की औषधि के रूप में उपयोगिता से सभी परिचित हैं।

महिलाएं क्यों रखती हैं वट सावित्री व्रत

मान्यता है कि वट वृक्ष दीर्घकाल तक अक्षय बना रहता है, उसी प्रकार दीर्घायु, अक्षय सौभाग्य तथा निरन्तर अभ्युदय की प्राप्ति के लिए वट वृक्ष की आराधना की जाती है। इसी वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने मृत पति सत्यवान को पुन: जीवित किया था। तब से यह व्रत वट-सावित्री के नाम से किया जाता है। इस दिन सभी महिलाएं अपने पती की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं।

व्रत कथा

भविष्य पुराण के अनुसार, सावित्री राजा अश्वपति की कन्या थीं। सावित्री ने सत्यवान को पति रूप में स्वीकार किया। अपने अंधे सास-ससुर की सेवा करने के उपरांत सावित्री भी सत्यभान के साथ लकड़ियां लेने जंगल जाती थीं। एक दिन सत्यवान को लकड़ियां काटते समय चक्कर आ गया और वह पेड़ से उतरकर नीचे बैठ गए। उसी समय भैंसे पर सवार होकर यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए। सावित्री ने उन्हें पहचान लिया और कहा, ‘आप मेरे पति के प्राण न लें।’ यमराज नहीं माने और सत्यवान के प्राण को लेकर वह अपने लोक को चल पड़े। सावित्री भी उनके पीछे चल दीं। बहुत दूर जाकर यमराज ने सावित्री से कहा, ‘पतिव्रते! अब तुम लौट जाओ, इस मार्ग में इतनी दूर कोई नहीं आ सकता।’ सावित्री ने कहा, ‘महाराज पति के साथ आते हुए न तो मुझे कोई ग्लानि हो रही है और न कोई श्रम हो रहा है, मैं सुखपूर्वक चल रही हूं। स्त्रियों का एकमात्र आश्रय-स्थान उनका पति ही है, अन्य कोई नहीं।’ सावित्री के पति धर्म से प्रसन्न यमराज ने वरदान के रूप में अंधे सास-ससुर को आंखें दीं और सावित्री को पुत्र होने का
आशीर्वाद देते हुए सत्यवान के प्राणों को लौटा दिया। इस प्रकार सावित्री ने अपने सतीत्व के बल पर अपने पति को मृत्यु के मुख से छीन लिया।

लखनऊ। ज्येष्ठ कृष्णपक्ष की अमावस्या को वट सावित्री की पूजा की जाती है। इस बार यह सोमवार यानि 3 मई को वट सावित्रि व्रत किया जा रहा है। इस दिन सुहागिन औरतें वट वृक्ष यानि बरगद का पूजा पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत करती हैं। आज हम आपको वट वृक्ष का महत्व बताने जा रहे हैं और महिलाएं क्यों रखती हैं वट सावित्री व्रत इसके बारे में बताने जा रहे हैं। वट वृक्ष का महत्व
  • वट देव वृक्ष है, वट वृक्ष के मूल में भगवान ब्रह्मा, मध्य में जनार्दन विष्णु तथा अग्रभाग में देवाधिदेव शिव स्थित रहते हैं।
  • देवी सावित्री भी वट वृक्ष में प्रतिष्ठित रहती हैं।
  • इसी अक्षय वट के पत्रपुटक पर प्रलय के अन्तिम चरण में भगवान श्रीकृष्ण ने बालरूप में मार्कण्डेय ऋषि को प्रथम दर्शन दिया था।
  • प्रयागराज में गंगा के तट पर वेणीमाधव के निकट अक्षय वट प्रतिष्ठित है।
  • हानिकारक गैसों को नष्ट कर वातावरण को शुद्ध करने में वट वृक्ष का विशेष महत्व है।
  • वट वृक्ष की औषधि के रूप में उपयोगिता से सभी परिचित हैं।
महिलाएं क्यों रखती हैं वट सावित्री व्रत मान्यता है कि वट वृक्ष दीर्घकाल तक अक्षय बना रहता है, उसी प्रकार दीर्घायु, अक्षय सौभाग्य तथा निरन्तर अभ्युदय की प्राप्ति के लिए वट वृक्ष की आराधना की जाती है। इसी वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने मृत पति सत्यवान को पुन: जीवित किया था। तब से यह व्रत वट-सावित्री के नाम से किया जाता है। इस दिन सभी महिलाएं अपने पती की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। व्रत कथा भविष्य पुराण के अनुसार, सावित्री राजा अश्वपति की कन्या थीं। सावित्री ने सत्यवान को पति रूप में स्वीकार किया। अपने अंधे सास-ससुर की सेवा करने के उपरांत सावित्री भी सत्यभान के साथ लकड़ियां लेने जंगल जाती थीं। एक दिन सत्यवान को लकड़ियां काटते समय चक्कर आ गया और वह पेड़ से उतरकर नीचे बैठ गए। उसी समय भैंसे पर सवार होकर यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए। सावित्री ने उन्हें पहचान लिया और कहा, 'आप मेरे पति के प्राण न लें।' यमराज नहीं माने और सत्यवान के प्राण को लेकर वह अपने लोक को चल पड़े। सावित्री भी उनके पीछे चल दीं। बहुत दूर जाकर यमराज ने सावित्री से कहा, 'पतिव्रते! अब तुम लौट जाओ, इस मार्ग में इतनी दूर कोई नहीं आ सकता।' सावित्री ने कहा, 'महाराज पति के साथ आते हुए न तो मुझे कोई ग्लानि हो रही है और न कोई श्रम हो रहा है, मैं सुखपूर्वक चल रही हूं। स्त्रियों का एकमात्र आश्रय-स्थान उनका पति ही है, अन्य कोई नहीं।' सावित्री के पति धर्म से प्रसन्न यमराज ने वरदान के रूप में अंधे सास-ससुर को आंखें दीं और सावित्री को पुत्र होने का आशीर्वाद देते हुए सत्यवान के प्राणों को लौटा दिया। इस प्रकार सावित्री ने अपने सतीत्व के बल पर अपने पति को मृत्यु के मुख से छीन लिया।