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बचपन से ही देश प्रेमी थे विक्रम बतरा, दूसरों की मदद के लिए रहते थे आगे

By सोने लाल 
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नई दिल्ली। कारगिल विजय दिवस के मौके पर आज हम भारत देश के वीर सपूतों को याद करके उनकी वीरता को सलाम करते हैं। कारगिल युद्ध के महानायक शहीद कै. विक्रम बतरा की माता कमला बताती हैं कि उन्हों ने अपने बेटे ​विक्रम की कई यादें हैं जिनको वह संजोकर रखी हैं। घर में ही बेटे की याद में शहीद स्मारक कक्ष बनाकर बचपन से लेकर शहादत तक की सभी चीजों को सहेजकर रखा है। स्कूल में भी अग्रणी भूमिका निभाने के साथ सेना में भी कैप्टन विक्रम बत्रा ने कई सम्मान हासिल किए थे।

कमला बतरा बताती हैं कि विक्रम बचपन से ही साहसी और देश प्रेमी था। जिसने अपने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुती दे दी, उस पर मुझे गर्व है। कारगिल युद्ध में कैप्‍टन विक्रम के साथ सूबेदार मेजर रहे उपमंडल बैजनाथ की सिंबल पंचायत निवासी धनवीर सिंह राणा ने बताया कि अदम्य साहस के बलबूते ही उन्होंने सबसे कठिन दो चोटियों पर भारतीय सेना को फतह दिलाई थी। प्वाइंट 5140 में जीत हासिल करने के बाद सात जुलाई, 1999 को 13 जैक राइफल की डेल्टा कंपनी को प्वाइंट 4875 पर चढ़ाई करने के आदेश मिले।

सैनिकों की हौसला आफजाई के लिए रात से ही विक्रम बतरा की टोली जय दुर्गे, जाट बलवान जय भगवान, बोले सोनेहाल के नारे लगाते हुए आगे बढ़ी। कै. बत्रा ने स्वयं गन संभालते हुए दुश्मनों से चोटी खाली करवा दी थी। धनवीर सिंह राणा बताते हैं कि कैप्‍टन बत्रा के साथ उन्होंने रेजिमेंट के तीन अन्य साथियों को भी खोया है।

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