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सूरत में मजदूरों का हिंसक रूप गंभीर चिंता का विषय

By टीम पर्दाफाश 
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सूरत: देश में कोरोना वायरस काफी तेजी से अपना पैर पसारते जा रहा है। 6500 से ज्यादा लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं, जबकि 239 लोगों की मौत हो चुकी है। कोरोना महामारी को रोकने के लिए सरकार ने देश में 21 दिनों का लॉकडाउन लगा दिया है। हालांकि, लॉकडाउन के बावजूद संक्रमितों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। वहीं, कई जगहों पर लॉकडाउन से परेशान होकर लोग उत्पात भी मचा रहे हैं। इसी कड़ी में गुजरात के सूरत में सैकड़ों प्रवासी मजदूर सड़क पर उतरकर तांडव मचाने लगे। इतना ही नहीं प्रवासी मजदूरों ने कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया और तोड़फोड़ भी की।

भूख और पैसे के अभाव ने इन मजदूरों को इस लाकडाउन में भी सड़क पर उतरने और विरोध प्रदर्शन करने के लिए बाध्य कर दिया। देर रात की इस घटना ने एक गंभीर चिंता पैदा कर दी है। अपने घर परिवार से दूर मजदूरों को रोजगार तो खोना ही पड़ा है, कई को उन आवासों से भी बेदखल कर दिया गया है जिसमें वे काम के दौरान रह रहे थे। सूरत की घटना का संकेत भयावह है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

सरकारों ने तो राहत के कई पैकजों की घोषाणाएं कर रखी हैं। लेकिन उनके अमल में लाए जाने पर कई क्षेत्रों में सवाल उठ रहे हैं। सूरत का संदेश तो यही है कि लोगों के भीतर भरोसा पैदा किए जाने की जरूरत है। और उन्हें आशंकाओं और अनिश्तिताओं से बाहर निकालने के सघन कार्य की जरूरत है। अभी भी ग्रामीण इलाकों की खबरें नहीं आ रही हैं। वहां लोगों की जिंदगियों पर इस तालाबंदी का क्या असर है इस पर भी गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।

रिपोर्ट के अनुसार लॉकडाउन के 17 दिन बीत जाने के बाद स्थितियां गंभीर होने लगी हैं। न तो इनके पास खाने के लिए कुछ अनाज है और न ही मकान मालिक का किराया देने के लिए पैसा। ऊपर से बताया जा रहा है कि जहां ये काम करते थे उनके मालिकों ने उनकी सैलरी भी नहीं दी। जिसके चलते हालत और गंभीर हो गए हैं। रात में प्रदर्शन करने वालों में ज़्यादातर हीरे के व्यापारियों के यहां काम करने वाले कारीगर थे।

सूरत जैसी मजदूरों की परेशानी की खबरे देश के दूसरे राज्यों से भी आ रही हैं। हालांकि वहां अभी मजदूर लाकडाउन का पालन कर रहे हैं। लेकिन फोन और सोशल मीडिया से वे अपने संदेश अपने राज्यों की सरकारों, मीडिया और संपर्क के लोगों को भेज रहे हैं। मजदूरों के सवालों की भी उतनी ही बडी है, जितना लॉकडाउन को बेहतर तरीके से पालन कराना। लॉकडाउन की कामयाबी में इन मजदूरों की भी भूमिका है। जो घर परिवार से दूर बिना किसी आसरे के रह रहे हैं। और कब तक वे रहेंगे, उन्हें पता भी नहीं है। हिंदू-मुसलमान टॉपिक से इस सवाल पर चर्चा ज्यादा जरूरी है। क्योंकि भारत की अर्थ संरचना के ये अग्रिम प्रहरी हैं।

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