जानें क्या है विवाह पंचमी का महत्व…

vivah-panchami-2018
जानें क्या है विवाह पंचमी का महत्व...

मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को बड़े ही धूम धाम से राजा राम सरकार का विवाहोत्सव मनाया जाता है। यह महोत्सव विशेष रूप से मिथलांचल में बहुत उत्साह के साथ मनाते हैं। त्रेता युग में पृथ्वी पर राक्षसों का अत्याचार अपनी चरम सीमा पर था। उस समय मुनि विश्वामित्र अपने यज्ञ की रक्षा करने के उद्देश्य से अयोध्या के महाराज दशरथ से उनके पुत्रों राम एवं लक्ष्मण जी को माँग कर ले गए। यज्ञ की समाप्ति के पश्चात विश्वामित्र जी जनक पुरी के रास्ते से वापसी आने के समय राजा जनक के सीता स्वयंवर की उद्घोषणा की जानकारी मिली। मुनि विश्वामित्र ने राम एवं लक्ष्मण जी को साथ लेकर सीता के स्वयंवर में पधारें।

Vivah Panchami Mahatva :

सीता स्वयंवर में राजा जनक जी ने उद्घोषणा की जो भी शिव जी के धनुष को भंग कर देगा उसके साथ सीता के विवाह का संकल्प कर लिया। स्वयंवर में बहुत राजा महाराजाओं ने अपने वीरता का परिचय दिया परन्तु विफल रहे। इधर जनक जी चिंतित होकर घोषणा की लगता है यह पृथ्वी वीरों से विहीन हो गयी है ए तभी मुनि विश्वामित्र ने राम को शिव धनुष भंग करने का आदेश दिया। राम जी ने मुनि विश्वामित्र जी की आज्ञा मानकर शिव जी की मन ही मन स्तुति कर शिव धनुष को एक ही बार में भंग कर दिया। उसके उपरान्त राजा जनक ने सीता का विवाह बड़े उत्साह एवं धूम धाम के साथ राम जी से कर दिया। साथ ही दशरथ के तीन पुत्रों भरत के साथ माध्वीए लक्ष्मण के साथ उर्मिला एवं शत्रुघ्न जी के साथ सुतकीर्ति का विवाह भी बड़े हर्ष एवं धूम धाम के साथ कर दिया।

प्रभु की यह लीला संदेश देती है कि धनुष अहंकार का प्रतीक है। प्रभु के अनुसार जब तक अन्त रूकरण में अहंकार के मेघ हैंए तब तक राम और सीता का मिलन नहीं हो सकता। भक्ति मार्ग में सबसे बड़ी बाधा अहंकार की है। यही बात हमारे जीवन में लागू होती है। हम भी ईश्वर को बाहरी नजरों से ढूंढते हैं या देखने का प्रयास करते हैंए पर इन आंखों से संसार को पूरी तरह से समझ नहीं पाते। राम विवाह राजनीतिक दृष्टि से भी बड़ी महत्वपूर्ण घटना है। रावण के अत्याचार से त्रस्त संसार को मुक्त कराने के लिए महात्मा विश्वामित्र ने यज्ञ रचाया और राम लक्ष्मण को यज्ञ के बहाने जनकपुर तक पहुंचा दिया। धनुष यज्ञ का आध्यात्मिक स्वरूप यह है कि साधक का हृदय ही जनकपुर का रंगमंच है और अंतःकरण का अभिमान ही शंकर जी का विशाल धनुष है। साधक के अंतःकरण में मन बुद्धि चित्त अहंकार का निवास होता है।

आध्यात्मिक दृष्ठि से हमारे मन में चंधमा बुद्धि में ब्रह्माए चित्त में विष्णु और अहंकार में शिव का निवास है। उन्हीं शिव का यह धनुष याने अहंकार का स्वरूप है। भगवान श्री राम ज्ञान हैं और सीता जी भक्ति है। हमारे हृदय में ज्ञान भक्ति का मिलन ही सीता राम विवाह है। किंतु अहंकार बाधा बना हुआ है जब तक इसका विनाश नहीं होगा ज्ञान भक्तिए जीवए ब्रह्म प्रकृति पुरुष सीता राम का मिलन असंभव है। उक्त उद्गार सिविल लाइंस रामकृष्ण बगिया में रामकथा महोत्सव के चतुर्थ दिवस पंडित निर्मल कुमार ने श्रोताओं के सम्मुख व्यक्त किए।

विवाह पंचमी का दिन धार्मिक दृष्टि से वैसे तो बहुत शुभ माना जाता है लेकिन कई क्षेत्रों में इस दिन बेटियों का विवाह करना शुभ नहीं माना जाता। इसके पिछे लोगों की यही मान्यता है कि विवाहोपरांत सीता को बहुत कष्ट झेलने पड़े थे। वनवास समाप्ति के पश्चात भी उन्हें सुख नहीं मिला और गर्भवती अवस्था में जंगल में मरने के लिये छोड़ दिया गया था। महर्षि वाल्मिकी के आश्रम में ही तमाम दुखरूसुख सहते उनकी उम्र बीती। इसी कारण लोग सोचते हैं कि उनकी बेटियों को भी माता सीता की तरह कष्ट न उठाने पड़ें तो इस दिन विवाह नहीं करते। इतना ही नहीं विवाह पंचमी के पर्व को मनाने के लिये यदि कोई कथा का आयोजन भी करता है तो कथा सीता स्वयंवर और प्रभु श्री राम और माता सीता के विवाह संपन्न होने के साथ ही समाप्त कर दी जाती है। इससे आगे की कथा दुखों से भरी है इसलिये इस दिन कथा का सुखांत ही किया जाता है और विवाहोपरांत की कथा नहीं कही जाती।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम सीता के शुभ विवाह के कारण ही विवाह पंचमी का पर्व अत्यंत पवित्र माना जाता है। भारतीय संस्कृति में राम सीता आदर्श दम्पत्ति माने गए हैं। इस पावन दिन सभी को राम.सीता की आराधना करते हुए अपने सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए प्रभु से आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

विवाह में यदि परेशानियां आ रही है तो करें विवाह पंचमी के दिन यह उपाय-

  • इस दिन भगवान राम और माता सीता की संयुक्त रूप से उपासना करने से विवाह होने में आ रही बाधाओं का नाश होता है।
  • इस दिन बालकाण्ड में भगवान राम और सीता जी के विवाह प्रसंग का पाठ करना शुभ होता है और विवाह जैसी बाधाएँ दूर हो जाती है।
  • विवाह पंचमी के दिन सम्पूर्ण रामचरित.मानस का पाठ करने से भी पारिवारिक जीवन सुखमय होता है।
  • सीता जी द्वारा माँ पार्वती की मनचाहे वर प्रभु रामद्ध की कामना हेतु निम्न स्तुति की थी…

जय जय गिरिवर राज किशोरी । जय महेश मुख चन्द चकोरी।।
जय गजबदन षडाननमाता ।जगत जननी दामिनी दुति गाता।।

नहिं तव आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।।
भव भव विभव पराभव कारिनि। विश्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।।

पति देवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस् सारदा सेष।।

सेवत तोहि सुलभ फल चारी।बरदायनी पुरारी पिआरी।।
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे ।सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।

मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबहीं के ।।
कीन्हेऊँ प्रगट न कारन तेहीं।अस कहि चरन गहे बैदेही ।।

बिनय प्रेम बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसकानी ।।
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ।।

सुनु सिय सत्य असीस हमारी । पूजिहिं मनकामना तुम्हारी ।।
नारद बचन सदा सुचि साचा । सो बरू मिलिहि जाहिं मनु राचा ।।

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरू सहज सुंदर साँवरो ।
करुना निधान सुजान सीलु सनेह जानत रावरो ।।

एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली ।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ।।

जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाय कहि ।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ।।

इस स्तुति करने से मनचाहा वर की प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 

पंडित प्रखर गोस्वामी

एस्ट्रो गुरुकुल क्लासेज
संपर्क करे व्हाट्सएप्प द्वारा- 7881106274

मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को बड़े ही धूम धाम से राजा राम सरकार का विवाहोत्सव मनाया जाता है। यह महोत्सव विशेष रूप से मिथलांचल में बहुत उत्साह के साथ मनाते हैं। त्रेता युग में पृथ्वी पर राक्षसों का अत्याचार अपनी चरम सीमा पर था। उस समय मुनि विश्वामित्र अपने यज्ञ की रक्षा करने के उद्देश्य से अयोध्या के महाराज दशरथ से उनके पुत्रों राम एवं लक्ष्मण जी को माँग कर ले गए। यज्ञ की समाप्ति के पश्चात विश्वामित्र जी जनक पुरी के रास्ते से वापसी आने के समय राजा जनक के सीता स्वयंवर की उद्घोषणा की जानकारी मिली। मुनि विश्वामित्र ने राम एवं लक्ष्मण जी को साथ लेकर सीता के स्वयंवर में पधारें। सीता स्वयंवर में राजा जनक जी ने उद्घोषणा की जो भी शिव जी के धनुष को भंग कर देगा उसके साथ सीता के विवाह का संकल्प कर लिया। स्वयंवर में बहुत राजा महाराजाओं ने अपने वीरता का परिचय दिया परन्तु विफल रहे। इधर जनक जी चिंतित होकर घोषणा की लगता है यह पृथ्वी वीरों से विहीन हो गयी है ए तभी मुनि विश्वामित्र ने राम को शिव धनुष भंग करने का आदेश दिया। राम जी ने मुनि विश्वामित्र जी की आज्ञा मानकर शिव जी की मन ही मन स्तुति कर शिव धनुष को एक ही बार में भंग कर दिया। उसके उपरान्त राजा जनक ने सीता का विवाह बड़े उत्साह एवं धूम धाम के साथ राम जी से कर दिया। साथ ही दशरथ के तीन पुत्रों भरत के साथ माध्वीए लक्ष्मण के साथ उर्मिला एवं शत्रुघ्न जी के साथ सुतकीर्ति का विवाह भी बड़े हर्ष एवं धूम धाम के साथ कर दिया। प्रभु की यह लीला संदेश देती है कि धनुष अहंकार का प्रतीक है। प्रभु के अनुसार जब तक अन्त रूकरण में अहंकार के मेघ हैंए तब तक राम और सीता का मिलन नहीं हो सकता। भक्ति मार्ग में सबसे बड़ी बाधा अहंकार की है। यही बात हमारे जीवन में लागू होती है। हम भी ईश्वर को बाहरी नजरों से ढूंढते हैं या देखने का प्रयास करते हैंए पर इन आंखों से संसार को पूरी तरह से समझ नहीं पाते। राम विवाह राजनीतिक दृष्टि से भी बड़ी महत्वपूर्ण घटना है। रावण के अत्याचार से त्रस्त संसार को मुक्त कराने के लिए महात्मा विश्वामित्र ने यज्ञ रचाया और राम लक्ष्मण को यज्ञ के बहाने जनकपुर तक पहुंचा दिया। धनुष यज्ञ का आध्यात्मिक स्वरूप यह है कि साधक का हृदय ही जनकपुर का रंगमंच है और अंतःकरण का अभिमान ही शंकर जी का विशाल धनुष है। साधक के अंतःकरण में मन बुद्धि चित्त अहंकार का निवास होता है। आध्यात्मिक दृष्ठि से हमारे मन में चंधमा बुद्धि में ब्रह्माए चित्त में विष्णु और अहंकार में शिव का निवास है। उन्हीं शिव का यह धनुष याने अहंकार का स्वरूप है। भगवान श्री राम ज्ञान हैं और सीता जी भक्ति है। हमारे हृदय में ज्ञान भक्ति का मिलन ही सीता राम विवाह है। किंतु अहंकार बाधा बना हुआ है जब तक इसका विनाश नहीं होगा ज्ञान भक्तिए जीवए ब्रह्म प्रकृति पुरुष सीता राम का मिलन असंभव है। उक्त उद्गार सिविल लाइंस रामकृष्ण बगिया में रामकथा महोत्सव के चतुर्थ दिवस पंडित निर्मल कुमार ने श्रोताओं के सम्मुख व्यक्त किए। विवाह पंचमी का दिन धार्मिक दृष्टि से वैसे तो बहुत शुभ माना जाता है लेकिन कई क्षेत्रों में इस दिन बेटियों का विवाह करना शुभ नहीं माना जाता। इसके पिछे लोगों की यही मान्यता है कि विवाहोपरांत सीता को बहुत कष्ट झेलने पड़े थे। वनवास समाप्ति के पश्चात भी उन्हें सुख नहीं मिला और गर्भवती अवस्था में जंगल में मरने के लिये छोड़ दिया गया था। महर्षि वाल्मिकी के आश्रम में ही तमाम दुखरूसुख सहते उनकी उम्र बीती। इसी कारण लोग सोचते हैं कि उनकी बेटियों को भी माता सीता की तरह कष्ट न उठाने पड़ें तो इस दिन विवाह नहीं करते। इतना ही नहीं विवाह पंचमी के पर्व को मनाने के लिये यदि कोई कथा का आयोजन भी करता है तो कथा सीता स्वयंवर और प्रभु श्री राम और माता सीता के विवाह संपन्न होने के साथ ही समाप्त कर दी जाती है। इससे आगे की कथा दुखों से भरी है इसलिये इस दिन कथा का सुखांत ही किया जाता है और विवाहोपरांत की कथा नहीं कही जाती। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम सीता के शुभ विवाह के कारण ही विवाह पंचमी का पर्व अत्यंत पवित्र माना जाता है। भारतीय संस्कृति में राम सीता आदर्श दम्पत्ति माने गए हैं। इस पावन दिन सभी को राम.सीता की आराधना करते हुए अपने सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए प्रभु से आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

विवाह में यदि परेशानियां आ रही है तो करें विवाह पंचमी के दिन यह उपाय-

  • इस दिन भगवान राम और माता सीता की संयुक्त रूप से उपासना करने से विवाह होने में आ रही बाधाओं का नाश होता है।
  • इस दिन बालकाण्ड में भगवान राम और सीता जी के विवाह प्रसंग का पाठ करना शुभ होता है और विवाह जैसी बाधाएँ दूर हो जाती है।
  • विवाह पंचमी के दिन सम्पूर्ण रामचरित.मानस का पाठ करने से भी पारिवारिक जीवन सुखमय होता है।
  • सीता जी द्वारा माँ पार्वती की मनचाहे वर प्रभु रामद्ध की कामना हेतु निम्न स्तुति की थी...
जय जय गिरिवर राज किशोरी । जय महेश मुख चन्द चकोरी।। जय गजबदन षडाननमाता ।जगत जननी दामिनी दुति गाता।। नहिं तव आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।। भव भव विभव पराभव कारिनि। विश्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।। पति देवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि सहस् सारदा सेष।। सेवत तोहि सुलभ फल चारी।बरदायनी पुरारी पिआरी।। देबि पूजि पद कमल तुम्हारे ।सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबहीं के ।। कीन्हेऊँ प्रगट न कारन तेहीं।अस कहि चरन गहे बैदेही ।। बिनय प्रेम बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसकानी ।। सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ।। सुनु सिय सत्य असीस हमारी । पूजिहिं मनकामना तुम्हारी ।। नारद बचन सदा सुचि साचा । सो बरू मिलिहि जाहिं मनु राचा ।। मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरू सहज सुंदर साँवरो । करुना निधान सुजान सीलु सनेह जानत रावरो ।। एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली । तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ।। जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाय कहि । मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ।। इस स्तुति करने से मनचाहा वर की प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।  पंडित प्रखर गोस्वामी एस्ट्रो गुरुकुल क्लासेज संपर्क करे व्हाट्सएप्प द्वारा- 7881106274