गौरी लंकेश ने जिस बात से था चेताया, उनकी मौत पर उसी को गया दोहराया

बेंगलुरु। कर्नाटक के बेंगलुरु में 5 सितंबर की शाम वरिष्ठ महिला पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी जाती है। जिसके बाद सोशल मीडिया पर विचारों की बाढ़ आ जाती है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से जमकर रायता फैलाया जाता है जिनका उपयोग यूजर्स अपने स्वादानुसार करते हैं। दो धड़ो में बंट चुका समाज का बुद्धजीवी वर्ग अपनी-अपनी बातों को सही साबित करने की हर मुमकिन कोशिश करने में लग जाता है। फिर क्या, शुरू हो जाता है विचारों का आदान-प्रदान, आरोप-प्रत्यारोप, सवाल-जबाब और भी बहुत कुछ। इन तीन दिनों में कब्र में समा चुकी महिला पत्रकार ने वह सब कुछ हासिल कर लिया जो उन्होने जीते-जी नहीं कमाया। 5 सितंबर से पहले तक जहां एक्का-दुक्का लोगों को छोड़ दिया जाए अधिकतर लोगों को इस महिला पत्रकार का नाम तक नहीं पता था वही लोग आज इनकी मौत पर ज्ञान बघारने में लगे हुए है। जिस महिला पत्रकार के बारे में 90 फीसद लोगों को जानकारी तक नहीं थी आज वही लोग इधर-उधर से ज्ञान बटोर अपनी फेसबुक वाल पर उड़ेलने में लगे हुए है।

गौरी लंकेश की हत्या के बाद सोशल मीडिया पर फैले रायते से फायदा हो न हो लेकिन स्वाद जरूर मिल रहा है। तभी तो इस मामले में इतनी दिलचस्पी ली जा रही है। दुनिया को अलविदा कहने से पहले इस महिला पत्रकार ने जिस बात की जिक्र अपनी आखिरी संपादकीय में किया होता है वही चीज़ इस घटना में देखने को मिलती है। हम बात कर रहें है फेक न्यूज़ की! जी हां, जिस बात को लेकर गौरी चिल्ला चिल्ला अपील कर रही थी, जिस जाल में न फंसने की नसीहत वह बार बार दे रही थी, जिन बातों को पहुंचाने खातिर इस महिला ने गोलियों खाई, आखिरकार वही संदेश हमतक पहुंच सका। तभी तो इनकी मौत पर फेक न्यूज़ का पिटारा सा खुल गया है। अफवाहों का दौर जारी है, कभी कुछ, कभी कुछ। विरोधी और समर्थक दो खेमे बटे हुए है हैं। हर बात का पोस्टमॉर्टम हो रहा है, सोशल मीडिया अखाड़ा बना हुआ है, नई-नई थिअरी उछाली जा रही हैं। कॉन्सपिरेसी थिअरीज जैसे हिंदू थीं तो दफनाया क्यों गया? मुसलमान थीं! नहीं, ईसाई थीं। ईसाई पर जोर बढ़ गया है।

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गौरी के नाम को लेकर अफवाह
दरअसल गौरी पूरा नाम लिखती थी Gauri Lankesh Patrike। अब कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने गौरी लंकेश के पूरे नाम में ‘पत्रिके’ को ‘पैट्रिक’ पढ़ लिया। फिर क्या, शुरू हो गयी अफवाहों की गाथा। ‘आग की तरह’ फैल गई खबर। वॉट्सऐप की क्लासरूम से लेकर सोशल मीडिया के गलियारे तक। मूर्खों की जमात पूरे आत्मविश्वास से मैदान में उतर आई, अब लगे पड़े हैं-पत्रिके को पैट्रिक साबित करने में।

अपने आखिरी संपादकीय में गौरी ने लिखा था कि एक सेट अजेंडे के तहत फेक न्यूज़ को समाज में फैला लोगों को गुमराह किया जा रहा है जिससे हम सब को सावधान रहने की जरूरत है लेकिन उन्हें क्या पता था यहां सब बुद्धजीवी है, किसी प्रकार की ज्ञान की यहां जरूरत नहीं यहां तो खुद ज्ञान बांटा जाता है। खैर अब जब वह इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनके जाने के बाद भी बहुत कुछ है जैसे उनके द्वारा लिखे हुए पोस्ट, शेयर किए गए ट्वीट, शेयर की गयी फ़ोटोज़। खैर इतना कुछ तो बहुत है हमे सोशल मीडिया पर यूनिवर्सिटी चलाने के लिए, कसूरवार और ज़िम्मेवार ठहरने के लिए।

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उपयुक्त बातों को दरकिनार कर दिया जाए तो इससे चिंता का विषय क्या होगा जिस तरह से गौरी की हत्या के बाद सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ जहर उगला गया। यहां सामान्य शिष्टाचार की कमी और असहिष्णुता का प्रदर्शन हुआ है जो हमारे सामाजिक मूल्यों में आई बड़ी गिरावट को दिखाता है। ऐसे लोग उस राजनीति से ताकत और प्रेरणा हासिल करते हैं जिसके लिए तर्क और असहमति का जवाब हिंसा है। सभी पार्टियों के नेताओं, जिनमें ज्यादातर सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, इनको यह सोचने की जरूरत है कि यह प्रवृत्ति स्वतंत्र और लोकतांत्रिक संवाद के लिए कितना बड़ा खतरा है।

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