क्या होगा राजा भैया का अगला पॉलिटिकल मूव..?

Raja Bhaiya, राजा भैया
क्या होगा राजा भैया का अगला पॉलिटिकल मूव..?

लखनऊ । उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिशों के तहत सपा और बसपा की बीच पनपी करीबी ने कई सियासी सूरमाओं की सियासत को पलट कर रख दिया है। जिसमें एक नाम क्षेत्रीय क्षत्रप रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया का भी है। दशकों से समाजवादी पार्टी के साथ बफा निभा रहे राजा भैया और बसपा सुप्रीमो मायावती की दुश्मनी किसी से छुपी नहीं है। डेढ़ दशक पुरानी इसी दुश्मनी को मायावती और राजा भैया दोनों ही पूरी तरह से निभाने में जुटे हैं।

What Will Be Raja Bhaiyas Next Political Move :

राजा भैया ने राज्यसभा चुनाव में सपा को समर्थन करने का दावा तो किया लेकिन सपा स​मर्थित बसपा उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने ने से स्पष्ट इंकार कर दिया। अखिलेश यादव के समझाने पर भी राजा भैया अपनी लाइन पर डटे रहे।

इस बीच खबर आई की राजा भैया ने अपने मताधिकार का प्रयोग करने के बाद सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की है। हालांकि राजा भैया ने मीडिया के सामने स्वीकार किया कि वह सीएम से मिले थे, लेकिन यह मुलाकात राजनीतिक न होकर पारिवारिक थी, जिसे राज्यसभा वोटिंग से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। उन्होंने अपना मत समाजवादी पार्टी के पक्ष में दिया है।

राजा भैया ने ट्वीट करके कहा, “न मैं बदला हूं और न ही मेरी राजनीतिक विचारधारा। मैं अखिेलश यादव के साथ हूं, इसका अर्थ ये नहीं हैं कि मैं बसपा के साथ हूं।”

अखिलेश और राजा भैया का साथ माया को नहीं आया रास—

मायावती के बारे में जो लोग जानते हैं, उनकी माने तो मायावती को वे लोग पसंद हैं जो उनकी पसंद का ध्यान रखते हों। मायावती के करीबी रखने के लिए जरूरी है कि आप उसी विकल्प का चुनाव करें जो उन्हें पसंद हो।यानी आपकी पसंद जोकि आपकी निजी राय है, मायावती को नापसंद होने पर आपकी पसंद नहीं रहनी चाहिए। ऐसा ही राजा भैया के मामले में हुआ है, मायावती के रूख को ध्यान में रखते हुए अखिलेश यादव ने सबसे पहला काम अपने उस ट्वीट को डिलीट करने का किया, जिसे उन्होंने राज्यसभा चुनाव के मतदान के दौरान राजा भैया के समर्थन के लिए धन्यवाद देते हुए पोस्ट किया था।

जिसके ठीक बाद उन्होंने मायावती का गठबंधन बनाए रखने के लिए धन्यवाद देते हुए दूसरा ट्वीट किया। ये स्पष्ट संकेत हैं कि अखिलेश यादव बसपा से बनते गठबंधन की कीमत पर राजा भैया का साथ नहीं चाहते।

मायावती के एक बयान और उस पर आई ​अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया ने स्पष्ट कर दिया कि सपा और राजा भैया का साथ अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। सपा और बसपा के गठबंधन में राजा भैया के लिए कोई जगह नहीं बची है। राजा भैया के लिए अखिलेश यादव अपने राजनीतिक करियर को दांव पर नहीं लगाएंगे।

वहीं राजा भैया के करीबी भी ये बात जानते हैं कि रघुराज प्रताप सिंह बैकफुट पर जाने के आदी नहीं हैं। वह सपा का साथ देने के लिए मायावती के प्रति नरम नहीं पड़ेगे।

अब भाजपा के साथ आएंगे राजा भैया —

यूपी के क्षत्रिय नेताओं की लॉबी में अपना अलग कद और पहचान रखने वाले राजा भैया को लेकर पूर्व में भी ऐसे कयास लगाए जाते रहे कि वह भाजपा के साथ खड़े नजर आएंगे। मगर राजा भैया ने बिना किसी लाग लपेट के निर्दलीय चुनाव लड़कर सपा का समर्थन किया। वह दल गत राजनीति से दूर रहकर मुलायम सिंह यादव के परिवार और सपा का समर्थन करते रहे।

वर्तमान परिस्थितियों में जिस तरह से सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने उनसे दूरियां बनाने की पहल की है, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि राजा भैया के लिए भाजपा के साथ जाने का विकल्प खुल गया है। सपा का बसपा के साथ जाने के लिए उन्हें अलग थलग छोड़ देना राजा भैया को सियासी लिहाज से विकल्पहीन बना चुका है।

यूपी की राजनीति को प्रभावित करते हैं राजा भैया—

प्रतापगढ़ जिले के कुंडा से छह बार के विधायक और भदरी राजघराने के कुंवर राघुराज प्रताप सिंह यानी राजा भैया की सियासी हैसियत और कद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि वह आज तक निर्दलीय चुनाव जीतते आए हैं। निर्दलीय विधायक होने के बावजूद राजा भैया को उत्तर प्रदेश की सरकारें नजरंदाज नहीं कर पाईं हैं। मायावती की सरकारों को छोड़ दें तो वह हमेशा सत्ता के करीब ही रहे हैं।

राजा भैया पहली बार 24 साल की उम्र में पहली बार विधायक चुने गए थे, उसके बाद से उनका सियासी रसूख लगातार बढ़ता गया। 1997 में बसपा और भाजपा के असफल गठबंधन वाली सरकार के टूटने के बाद कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री के रूप में बहुमत दिलाने का काम राजा भैया ने ही किया था।जिसके बाद राजा भैया को कल्याण सिंह सरकार ने मंत्री पद देकर सम्मान दिया था।

साल 2002 में दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती ने राजा भैया से बदला लिया। उनके पिता और चचेरे भाई को पोटा कानून के तहत जेल भेजकर राजा भैया पर दर्जनों आपराधिक मामले खोल दिए। करीब एक साल तक जेल में रहे राजा भैया ने एकबार फिर मायावती की सरकार में सेंधमारी की, लेकिन इस बार सत्ता की चाभी उन्होंने मुलायम सिंह यादव के हाथों में थमाई। मुलायम सिंह यादव ने भी राजा भैया को जेल से बाहर निकालकर अपने मंत्रिमंडल में जगह दी।

मायावती राजा भैया से बसपा विधायकों को तोड़कर ले जाने और उनके विरोधियों की सरकार बनवाने में मदद करने के लिए दुश्मनी मानती आईं हैं। राजा भैया भी मायावती के ताकत में रहते पूरी तरह से चौकन्ने रहते हैं।

राजा भैया भले ही कुंडा से निर्दलीय जीत हासिल करते हों, लेकिन उनका प्रभाव आस पास की अन्य नौ विधानसभा सीटों पर भी देखने को मिलता है। वह उन दो लोकसभा सीटों की हार जीत भी प्रभावित करते हैं, जिनके परिसीमन में ये विधानसभा सीटें आतीं हैं।

लखनऊ । उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिशों के तहत सपा और बसपा की बीच पनपी करीबी ने कई सियासी सूरमाओं की सियासत को पलट कर रख दिया है। जिसमें एक नाम क्षेत्रीय क्षत्रप रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया का भी है। दशकों से समाजवादी पार्टी के साथ बफा निभा रहे राजा भैया और बसपा सुप्रीमो मायावती की दुश्मनी किसी से छुपी नहीं है। डेढ़ दशक पुरानी इसी दुश्मनी को मायावती और राजा भैया दोनों ही पूरी तरह से निभाने में जुटे हैं।राजा भैया ने राज्यसभा चुनाव में सपा को समर्थन करने का दावा तो किया लेकिन सपा स​मर्थित बसपा उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने ने से स्पष्ट इंकार कर दिया। अखिलेश यादव के समझाने पर भी राजा भैया अपनी लाइन पर डटे रहे।इस बीच खबर आई की राजा भैया ने अपने मताधिकार का प्रयोग करने के बाद सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की है। हालांकि राजा भैया ने मीडिया के सामने स्वीकार किया कि वह सीएम से मिले थे, लेकिन यह मुलाकात राजनीतिक न होकर पारिवारिक थी, जिसे राज्यसभा वोटिंग से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। उन्होंने अपना मत समाजवादी पार्टी के पक्ष में दिया है।राजा भैया ने ट्वीट करके कहा, "न मैं बदला हूं और न ही मेरी राजनीतिक विचारधारा। मैं अखिेलश यादव के साथ हूं, इसका अर्थ ये नहीं हैं कि मैं बसपा के साथ हूं।"

अखिलेश और राजा भैया का साथ माया को नहीं आया रास—

मायावती के बारे में जो लोग जानते हैं, उनकी माने तो मायावती को वे लोग पसंद हैं जो उनकी पसंद का ध्यान रखते हों। मायावती के करीबी रखने के लिए जरूरी है कि आप उसी विकल्प का चुनाव करें जो उन्हें पसंद हो।यानी आपकी पसंद जोकि आपकी निजी राय है, मायावती को नापसंद होने पर आपकी पसंद नहीं रहनी चाहिए। ऐसा ही राजा भैया के मामले में हुआ है, मायावती के रूख को ध्यान में रखते हुए अखिलेश यादव ने सबसे पहला काम अपने उस ट्वीट को डिलीट करने का किया, जिसे उन्होंने राज्यसभा चुनाव के मतदान के दौरान राजा भैया के समर्थन के लिए धन्यवाद देते हुए पोस्ट किया था।जिसके ठीक बाद उन्होंने मायावती का गठबंधन बनाए रखने के लिए धन्यवाद देते हुए दूसरा ट्वीट किया। ये स्पष्ट संकेत हैं कि अखिलेश यादव बसपा से बनते गठबंधन की कीमत पर राजा भैया का साथ नहीं चाहते।मायावती के एक बयान और उस पर आई ​अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया ने स्पष्ट कर दिया कि सपा और राजा भैया का साथ अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। सपा और बसपा के गठबंधन में राजा भैया के लिए कोई जगह नहीं बची है। राजा भैया के लिए अखिलेश यादव अपने राजनीतिक करियर को दांव पर नहीं लगाएंगे।वहीं राजा भैया के करीबी भी ये बात जानते हैं कि रघुराज प्रताप सिंह बैकफुट पर जाने के आदी नहीं हैं। वह सपा का साथ देने के लिए मायावती के प्रति नरम नहीं पड़ेगे।

अब भाजपा के साथ आएंगे राजा भैया —

यूपी के क्षत्रिय नेताओं की लॉबी में अपना अलग कद और पहचान रखने वाले राजा भैया को लेकर पूर्व में भी ऐसे कयास लगाए जाते रहे कि वह भाजपा के साथ खड़े नजर आएंगे। मगर राजा भैया ने बिना किसी लाग लपेट के निर्दलीय चुनाव लड़कर सपा का समर्थन किया। वह दल गत राजनीति से दूर रहकर मुलायम सिंह यादव के परिवार और सपा का समर्थन करते रहे।वर्तमान परिस्थितियों में जिस तरह से सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने उनसे दूरियां बनाने की पहल की है, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि राजा भैया के लिए भाजपा के साथ जाने का विकल्प खुल गया है। सपा का बसपा के साथ जाने के लिए उन्हें अलग थलग छोड़ देना राजा भैया को सियासी लिहाज से विकल्पहीन बना चुका है।

यूपी की राजनीति को प्रभावित करते हैं राजा भैया—

प्रतापगढ़ जिले के कुंडा से छह बार के विधायक और भदरी राजघराने के कुंवर राघुराज प्रताप सिंह यानी राजा भैया की सियासी हैसियत और कद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि वह आज तक निर्दलीय चुनाव जीतते आए हैं। निर्दलीय विधायक होने के बावजूद राजा भैया को उत्तर प्रदेश की सरकारें नजरंदाज नहीं कर पाईं हैं। मायावती की सरकारों को छोड़ दें तो वह हमेशा सत्ता के करीब ही रहे हैं।राजा भैया पहली बार 24 साल की उम्र में पहली बार विधायक चुने गए थे, उसके बाद से उनका सियासी रसूख लगातार बढ़ता गया। 1997 में बसपा और भाजपा के असफल गठबंधन वाली सरकार के टूटने के बाद कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री के रूप में बहुमत दिलाने का काम राजा भैया ने ही किया था।जिसके बाद राजा भैया को कल्याण सिंह सरकार ने मंत्री पद देकर सम्मान दिया था।साल 2002 में दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती ने राजा भैया से बदला लिया। उनके पिता और चचेरे भाई को पोटा कानून के तहत जेल भेजकर राजा भैया पर दर्जनों आपराधिक मामले खोल दिए। करीब एक साल तक जेल में रहे राजा भैया ने एकबार फिर मायावती की सरकार में सेंधमारी की, लेकिन इस बार सत्ता की चाभी उन्होंने मुलायम सिंह यादव के हाथों में थमाई। मुलायम सिंह यादव ने भी राजा भैया को जेल से बाहर निकालकर अपने मंत्रिमंडल में जगह दी।मायावती राजा भैया से बसपा विधायकों को तोड़कर ले जाने और उनके विरोधियों की सरकार बनवाने में मदद करने के लिए दुश्मनी मानती आईं हैं। राजा भैया भी मायावती के ताकत में रहते पूरी तरह से चौकन्ने रहते हैं।राजा भैया भले ही कुंडा से निर्दलीय जीत हासिल करते हों, लेकिन उनका प्रभाव आस पास की अन्य नौ विधानसभा सीटों पर भी देखने को मिलता है। वह उन दो लोकसभा सीटों की हार जीत भी प्रभावित करते हैं, जिनके परिसीमन में ये विधानसभा सीटें आतीं हैं।