गुुजरात कांग्रेस को कितनी दूर तक ले जाएगी अहमद पटेल की जीत

गुुजरात कांग्रेस को कितनी दूर तक ले जाएगी अहमद पटेल की जीत

नई दिल्ली। गुजरात में मंगलवार को हुए राज्य सभा की तीन सीटों के मतदान के बाद करीब छह घंटों तक दिल्ली में चुनाव आयोग के मुख्य द्वार पर चले कई राउंड पॉलिटिकल ड्रामे के बाद कांग्रेस के लिए अाखिरकार एक अच्छी खबर आ गई है। कांग्रेस के सबसे कद्दावर रणनीतिकार अहमद पटेल करीब 15 दिनों की खींचतान के बाद पांचवीं बार राज्यसभा पहुंचने में कामयाब रहे।

इस राज्य सभा चुनाव को लेकर भाजपा ने जिस अंदाज में अपनी रणनीति को आगे बढ़ाया उससे अंत समय तक अहमद पटेल की जीत पर संशय बना रहा। वोटिंग के बाद कांग्रेस ने क्रास वोटिंग करने वाले अपने ही दो विधायकों के मतों को निरस्त करवाने के लिए जिस तरह से चुनाव आयोग के चक्कर लगाए उससे स्पष्ट था कि इन दो वोटों पर ही कांग्रेस की जीत का दारोमदार टिका हुआ है।

आखिरकार कांग्रेस ने दो वोटों को निरस्त करवा कर अहमद पटेल की हार को जीत के गणित में बदल लिया। अब सवाल उठता है कि कांग्रेस के इस रणनीतिकार की जीत गुजरात में कांग्रेस को इस मुकाम तक पहुंचा पाती है। एक लंबे समय के बाद कांग्रेस भाजपा को मात देती नजर आई है। दूसरे शब्दों में साल 2014 के बाद यह पहला मौका है जब कांग्रेस ने भाजपा की रणनीति को फेल किया है।

गुजरात की राजनीति पर क्या होगा असर—

गुजरात का विधानसभा चुनाव इसी साल होना है। पिछले 15 सालों से सत्ता से दूर कांग्रेस के लिए यह चुनाव कई मायनों में अहम है। जिसकी पहली वजह है गुजरात में बीजेपी की ब्रांडिंग करने वाले नरेन्द्र मोदी का केन्द्र की राजनीति में चले जाना।

नरेन्द्र मोदी के दिल्ली की राजनीति में सक्रिय होने के बाद कांग्रेस को पूरी उम्मीद है कि वह इस बार गुजरात की सत्ता ​हथियाने में कामयाब रहेगी। अहम पटेल की जीत से कांग्रेस के इन मनसूबों को ताकत ताकत मिलेगी।

वहीं दूसरे नजरिए से देखा जाए तो अहमद पटेल की जीत टूट का शिकार हुई गुजरात कांग्रेस का मनोबल बढ़ाने में सहायक भर होगी। इस जीत का कोई भी प्रभाव गुजरात विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा यह सिर्फ सांकेतिक रूप से ही सही माना जा सकता है। क्योंकि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में गुजरात कांग्रेस के पास केवल 42 विधायक हैं। यह संख्या मतदान से पहले तक 44 और 15 दिन पहले तक 57 हुआ करती थी।

गुजरात में कांग्रेस के मजबूत होने के दावे विधायकों की बगावत से जोड़े जाने पर खोखले नजर आते हैं। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो कांग्रेसी विधायकों की बगावत पार्टी की ढ़ीली पड़ती जमीनी पकड़ और कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व की रणनीतिक असफलता की ओर इशारा करती है। अहमद पटेल जिन परिस्थितियों में राज्य सभा पहुंच पाए हैं इसे पार्टी की रणनीती और मजबूती से ज्यादा उनके भाग्यशाली होने से जोड़कर देखने की जरूरत है। यह जीत वर्तमान में कुछ सुर्खियां बटोरने के बाद भविष्य में अहमद पटेल की व्यक्तिगत कामयाबी भर बन कर रह जाएगी।

गुजरात पर भाजपा की पकड़ बरकरार—

जमीनी स्तर पर देखा जाए तो भाजपा आज भी कांग्रेस से कई गुना मजबूत स्थिति में नजर आती है। नरेन्द्र मोदी भले ही दिल्ली की राजनीति में प्रवेश कर गए हो लेकिन वह किसी न किसी वजह से गुजरात के दौरों पर बने रहते हैं। वह अब भी गुजरात की जनता से संवाद स्थापित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। नरेन्द्र मोदी का चेहरा गुजरात की जनता के बीच अपनी लोकप्रियता बनाए रखने में अब तक कामयाब रहा है। उनके चेहरे और अमित शाह की रणनीति के आगे कांग्रेस का कोई रणनीति कामयाब होगी इस बात की संभावनाएं बेहद कम ही नजर आती हैं।

नेता और नेतृत्व विहीन गुजरात कांग्रेस—

गुजरात कांग्रेस की बात की जाए तो वर्तमान में गुजरात कांग्रेस के पास तो कोई नेता है और न ही नेतृत्व। ले देकर शंकर सिंह वाघेला के रूप में पार्टी के पास एक वरिष्ठ और अनुभवी चेहरा था, जिसने पार्टी हाईकमान की अनदेखी के चलते पार्टी छोड़ दी। ऐसी परिस्थितियों में अगर पार्टी किसी नए चेहरे पर दांव लगाती भी है तो पार्टी के भीतर ही उसकी स्वीकरोक्ती पर सवाल उठ सकते हैं। जिससे कांग्रेस में दोबारा फूट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।