क्या सोनिया गांधी की डिनर टेबल पर निकलेगा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का काट

सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
क्या सोनिया गांधी की डिनर टेबल पर निकलेगा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का काट

नई दिल्ली। सक्रिय राजनीति से सन्यास लेने की खबरों के बीच कांग्रेस की कमान बेटे राहुल गांधी को सौंपने के बाद सोनिया गांधी एकबार फिर देश की राजनीति को साधने में जुट चुकीं हैं। वह जानतीं हैं कि 2014 के आम चुनावों में जिस चेहरे को उनकी पार्टी ने कम आंकने की गलती की थी, वही चेहरा आज देश की राजनीति के केन्द्र में है। चार साल विपक्ष में गुजारने के बाद भी उनकी पार्टी के पास एक भी ऐसा ठोस मुद्दा नहीं है, जिसके बल पर प्रधानमंत्री बन चुके नरेन्द्र मोदी जैसे मंझे हुए रणनीतिकार और नेता को घेर सके।

What Will Sonia Gandhi Get Out Of Her Political Dinner :

ऐसे में सोनिया गांधी ने बिखरे पड़े विपक्ष को एक जुट करने की नई कोशिश के तहत मंगलवार की शाम अपने आवास पर डिनर का आयोजन रखा है। जिसके लिए उन्हीं पार्टियों को न्यौता भेजा गया है, जिनके नेता भाजपा के बढ़ते जनाधार से असुरक्षा महसूस कर रहे हैं। मोटे तौर पर 19 राजनैतिक दलों के नेताओं के डिनर में शामिल होने की उम्मीद की जा रही है। जिनमें कांग्रेस की विचारधारा का विरोध करने वाले बामपंथी दलों के नेताओं के नाम भी शामिल हैं।

सोनिया गांधी ने कुछ समय पहले ही भाजपा विरोधी दलों से आपसी मनमुटाव दूर कर एक जुट होने की अपील की थी। मनमुटाव दूर हुआ या नहीं, ये समय बताएगा, लेकिन सभी का आमना सामना करवाने का माध्यम वह स्वयं बन रहीं हैं।

इस सियासी डिनर में शामिल हो रहीं पार्टियों का अपना अलग चरित्र और चेहरा हैं। फिर भी इन सभी को कोई बात एक करती है, वह है वर्तमान हालातों में अपने वजूद की चिंता। सबसे बड़ी चिंता कांग्रेस को है, जिसने करीब 60 सालों तक देश पर राज किया है और 4 सालों में उसे विपक्षी दल की पहचान तक नहीं मिल सकी।

गाहे बगाहे इन सभी 19 की 19 पार्टियों की हालत एक जैसी है। सबके लिए एक ही खतरा है नरेन्द्र मोदी। वही मोदी जिसने दशकों से नंबर दो कहलाने वाली पार्टी को नंबर एक पर लाकर खड़ा कर दिया। 2014 में केन्द्र की सत्ता हासिल करने के साथ शुरू हुआ, भाजपा की विजय का सिलसिला आज 21 राज्यों तक जा पहुंचा है। भाजपा की हर विजय ने उसके प्रतिद्वंदियों की संख्या को बढ़ाया है।

कैसे संभव है एकता—

कांग्रेस जो आज जिन भाजपा विरोधी दलों को एक करने की कोशिश में जुटी है, उनमें से अधिकांश उसी से टूटकर बने हैं। कहने के लिए तो इन दलों की अपनी विचारधारा है, लेकिन वास्तविकता ये है कि सभी मौकापरस्ती की राजनीति से उपजे। जातिवाद और संप्रदायवाद की सोशल इंजीनियरिंग ने इन्हें ताकत दी। भ्रष्टाचार ने इन्हें जड़ें जमाने की क्षमता दे दी।

अधिकांश दलों के फैसले एक परिवार या व्यक्ति लेता है। जिसके लिए निजी हित सर्वोपरि है। इन दलों के माई बाप केवल एक ही जगह झुकते हैं, जहां सीबीआई का डंडा चलाने की ताकत होती है। कांग्रेस ने केन्द्र में रहते इस हुनर को इजाद किया था। अब कांग्रेस के सामने दोहरी लड़ाई है। अब न तो उसके हाथों में सीबीआई का चाबुक है और न ही वो ताकत जिसके बल पर वह अकेले केन्द्र की सत्ता के आसपास पहुंचने का दमखम रखती हो।

बीते चार सालों में ऐसे कई मौके बने जब लगा कि ​नरेन्द्र मोदी का काट गठबंधन से निकाला जाएगा। बिहार में भाजपा को मिली हार के बाद विपक्ष में एक बहुत बड़ी उम्मीद जागी थी। ​सबकुछ ठीक चल रहा था कि हितों के टकराव के आगे गठबंधन धर्म टूट गया और भाजपा बिहार हारकर भी जीत गई।

नई दिल्ली। सक्रिय राजनीति से सन्यास लेने की खबरों के बीच कांग्रेस की कमान बेटे राहुल गांधी को सौंपने के बाद सोनिया गांधी एकबार फिर देश की राजनीति को साधने में जुट चुकीं हैं। वह जानतीं हैं कि 2014 के आम चुनावों में जिस चेहरे को उनकी पार्टी ने कम आंकने की गलती की थी, वही चेहरा आज देश की राजनीति के केन्द्र में है। चार साल विपक्ष में गुजारने के बाद भी उनकी पार्टी के पास एक भी ऐसा ठोस मुद्दा नहीं है, जिसके बल पर प्रधानमंत्री बन चुके नरेन्द्र मोदी जैसे मंझे हुए रणनीतिकार और नेता को घेर सके।ऐसे में सोनिया गांधी ने बिखरे पड़े विपक्ष को एक जुट करने की नई कोशिश के तहत मंगलवार की शाम अपने आवास पर डिनर का आयोजन रखा है। जिसके लिए उन्हीं पार्टियों को न्यौता भेजा गया है, जिनके नेता भाजपा के बढ़ते जनाधार से असुरक्षा महसूस कर रहे हैं। मोटे तौर पर 19 राजनैतिक दलों के नेताओं के डिनर में शामिल होने की उम्मीद की जा रही है। जिनमें कांग्रेस की विचारधारा का विरोध करने वाले बामपंथी दलों के नेताओं के नाम भी शामिल हैं।सोनिया गांधी ने कुछ समय पहले ही भाजपा विरोधी दलों से आपसी मनमुटाव दूर कर एक जुट होने की अपील की थी। मनमुटाव दूर हुआ या नहीं, ये समय बताएगा, लेकिन सभी का आमना सामना करवाने का माध्यम वह स्वयं बन रहीं हैं।इस सियासी डिनर में शामिल हो रहीं पार्टियों का अपना अलग चरित्र और चेहरा हैं। फिर भी इन सभी को कोई बात एक करती है, वह है वर्तमान हालातों में अपने वजूद की चिंता। सबसे बड़ी चिंता कांग्रेस को है, जिसने करीब 60 सालों तक देश पर राज किया है और 4 सालों में उसे विपक्षी दल की पहचान तक नहीं मिल सकी।गाहे बगाहे इन सभी 19 की 19 पार्टियों की हालत एक जैसी है। सबके लिए एक ही खतरा है नरेन्द्र मोदी। वही मोदी जिसने दशकों से नंबर दो कहलाने वाली पार्टी को नंबर एक पर लाकर खड़ा कर दिया। 2014 में केन्द्र की सत्ता हासिल करने के साथ शुरू हुआ, भाजपा की विजय का सिलसिला आज 21 राज्यों तक जा पहुंचा है। भाजपा की हर विजय ने उसके प्रतिद्वंदियों की संख्या को बढ़ाया है।कैसे संभव है एकता—कांग्रेस जो आज जिन भाजपा विरोधी दलों को एक करने की कोशिश में जुटी है, उनमें से अधिकांश उसी से टूटकर बने हैं। कहने के लिए तो इन दलों की अपनी विचारधारा है, लेकिन वास्तविकता ये है कि सभी मौकापरस्ती की राजनीति से उपजे। जातिवाद और संप्रदायवाद की सोशल इंजीनियरिंग ने इन्हें ताकत दी। भ्रष्टाचार ने इन्हें जड़ें जमाने की क्षमता दे दी।अधिकांश दलों के फैसले एक परिवार या व्यक्ति लेता है। जिसके लिए निजी हित सर्वोपरि है। इन दलों के माई बाप केवल एक ही जगह झुकते हैं, जहां सीबीआई का डंडा चलाने की ताकत होती है। कांग्रेस ने केन्द्र में रहते इस हुनर को इजाद किया था। अब कांग्रेस के सामने दोहरी लड़ाई है। अब न तो उसके हाथों में सीबीआई का चाबुक है और न ही वो ताकत जिसके बल पर वह अकेले केन्द्र की सत्ता के आसपास पहुंचने का दमखम रखती हो।बीते चार सालों में ऐसे कई मौके बने जब लगा कि ​नरेन्द्र मोदी का काट गठबंधन से निकाला जाएगा। बिहार में भाजपा को मिली हार के बाद विपक्ष में एक बहुत बड़ी उम्मीद जागी थी। ​सबकुछ ठीक चल रहा था कि हितों के टकराव के आगे गठबंधन धर्म टूट गया और भाजपा बिहार हारकर भी जीत गई।