महाभारत के युद्ध में अभिमन्यु को क्यों नहीं बचाए थे श्री कृष्ण, वजह आपको भी कर देगी सन्न

    Mahabharat

    नई दिल्ली: महाभारत की कथा से तो आप सभी परिचित होंगे ही मगर उसके बाद ही उससे जुड़ी ऐसी बहुत सी बाते हैं जिन्हे या तो आप नहीं जानते या फिर उन रहस्यों को आप कभी समझ ही नहीं पाये होंगे और ऐसे में आज हम आपको एक ऐसे ही रहस्य के बारे में बताने जा रहे हैं। आज हम आपको बताएँगे की आखिर क्यों इतनी शक्तिशाली होते हुए भी इतनी सारी लीलाएँ करने वाले भगवान श्री कृष्ण ने अपनी ही बहन सुभद्रा और महारथी अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की रक्षा नहीं की और क्यों उसे युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हो जाने दिया। हालांकि यह इतना भी आसान नहीं था जितना की यहाँ पर कहने और सुनने में लग रहा, इसके पीछे एक लंबी कहानी है जिसे हम आपको संक्षेप में बताने वाले हैं।

    Why Did Not Krishna Save Abhimanyu In The War Of Mahabharata The Reason Will Also Shock You :

    असल में यह सृष्टि का नियम है की जब भी कभी धरती पर या फिर समस्त तीनों लोकों में संकट की स्थिति आती है या अधर्म बढ्ने लगता है तो उस दौरान देवी देवता किसी ना किसी रूप में अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं और अधर्म का नाश करते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ था द्वापर युग में जब धरती पर पाप काफी ज्यादा बढ़ गया था और उस वक़्त भगवान विष्णु ने कृष्ण अवतार में धरती पर जन्म लिया था। बताया जाता है की भगवान कृष्ण जो की खुद ही विष्णु जी का अवतार थे उनकी मदद के लिए अन्य सभी देवी देवताओं को भ्रमहा जी की तरफ से आदेश मिला की वो खुद या फिर अपने पुत्र को धरती पर अवतार दिलाये और भगवान कृष्ण की तथा धर्म की रक्षा करें।

    ऐसे में इस आदेश को जब चंद्रमा ने सुना कि उनके पुत्र वर्चा को भी पृथ्वी पर जन्म लेना का अधिकार मिला है तो उन्होंने ब्रह्मा के उस आदेश को मानने से मना कर दिया। ऐसा बताया जाता है की कहते हैं कि चंद्रमा कभी नहीं चाहते थे कि उनका बेटा पृथ्वी पर जाकर महाभारत का युद्ध लड़े परंतु उन्हें विवश होकर अपने अपने पुत्र को महाभारत के युद्ध के लिए भेजना पड़ा था हालांकि इससे पहले चंद्रमा ने साफ कह दिया की उनका पुत्र धरती पर वर्चा अवतार नहीं लेगा। असल में ऐसा करने के लिए चंद्रमा ले ऊपर सभी देवताओं ने दबाव डाला और कहा कि धर्म की रक्षा करना सभी देवताओं का कर्तव्य है इसलिए वे या फिर उनका पुत्र अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हो सकते हैं।

    जिसके बाद अभिमन्यु के रूप में चन्द्रमा के पुत्र वर्चा ने जन्म लिया था, हालांकि आपको यह भी बता दें की वर्चा को भेजते समय चन्द्रमा ने देवताओ से यह शर्त रखी थी की “मै अपने प्राण-प्यारे पुत्र को नहीं भेजना चाहता” फिर भी इस काम से पीछे हटना उचित नहीं जान पड़ता इसलिए वर्चा मनुष्य बनेगा तो सही, परन्तु वहाँ अधिक दिनों तक नहीं रहेगा। मेरा पुत्र अर्जुन का ही पुत्र होगा, नर-नारायण की अनुपस्थिति में मेरा पुत्र चक्रव्यूह का भेदन करेगा और घमासान युद्ध करके बड़े-बड़े महारथियों को चकित कर देगा और फिर इसी तरह से दिन भर युद्ध करने के बाद सायंकाल में मुझसे मिलने भी आ जाएगा।

    यही वजह थी की महाभारत के युद्ध के दौरान द्रोणाचार्य के चक्रव्यूह भेदते हुए अभिमन्यु दिनभर युद्ध करने के उपरांत कौरवो के हाथो चक्रव्यूह के भीतर ही वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं। चूंकि चंद्रमा ने शर्त रखी हुई थी इसलिए स्वयम भगवान श्री कृष्ण ने भी अभिमन्यु की नियति में हस्तक्षेप नहीं किया और उसे नहीं बचाया।

    नई दिल्ली: महाभारत की कथा से तो आप सभी परिचित होंगे ही मगर उसके बाद ही उससे जुड़ी ऐसी बहुत सी बाते हैं जिन्हे या तो आप नहीं जानते या फिर उन रहस्यों को आप कभी समझ ही नहीं पाये होंगे और ऐसे में आज हम आपको एक ऐसे ही रहस्य के बारे में बताने जा रहे हैं। आज हम आपको बताएँगे की आखिर क्यों इतनी शक्तिशाली होते हुए भी इतनी सारी लीलाएँ करने वाले भगवान श्री कृष्ण ने अपनी ही बहन सुभद्रा और महारथी अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की रक्षा नहीं की और क्यों उसे युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हो जाने दिया। हालांकि यह इतना भी आसान नहीं था जितना की यहाँ पर कहने और सुनने में लग रहा, इसके पीछे एक लंबी कहानी है जिसे हम आपको संक्षेप में बताने वाले हैं। असल में यह सृष्टि का नियम है की जब भी कभी धरती पर या फिर समस्त तीनों लोकों में संकट की स्थिति आती है या अधर्म बढ्ने लगता है तो उस दौरान देवी देवता किसी ना किसी रूप में अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं और अधर्म का नाश करते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ था द्वापर युग में जब धरती पर पाप काफी ज्यादा बढ़ गया था और उस वक़्त भगवान विष्णु ने कृष्ण अवतार में धरती पर जन्म लिया था। बताया जाता है की भगवान कृष्ण जो की खुद ही विष्णु जी का अवतार थे उनकी मदद के लिए अन्य सभी देवी देवताओं को भ्रमहा जी की तरफ से आदेश मिला की वो खुद या फिर अपने पुत्र को धरती पर अवतार दिलाये और भगवान कृष्ण की तथा धर्म की रक्षा करें। ऐसे में इस आदेश को जब चंद्रमा ने सुना कि उनके पुत्र वर्चा को भी पृथ्वी पर जन्म लेना का अधिकार मिला है तो उन्होंने ब्रह्मा के उस आदेश को मानने से मना कर दिया। ऐसा बताया जाता है की कहते हैं कि चंद्रमा कभी नहीं चाहते थे कि उनका बेटा पृथ्वी पर जाकर महाभारत का युद्ध लड़े परंतु उन्हें विवश होकर अपने अपने पुत्र को महाभारत के युद्ध के लिए भेजना पड़ा था हालांकि इससे पहले चंद्रमा ने साफ कह दिया की उनका पुत्र धरती पर वर्चा अवतार नहीं लेगा। असल में ऐसा करने के लिए चंद्रमा ले ऊपर सभी देवताओं ने दबाव डाला और कहा कि धर्म की रक्षा करना सभी देवताओं का कर्तव्य है इसलिए वे या फिर उनका पुत्र अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हो सकते हैं। जिसके बाद अभिमन्यु के रूप में चन्द्रमा के पुत्र वर्चा ने जन्म लिया था, हालांकि आपको यह भी बता दें की वर्चा को भेजते समय चन्द्रमा ने देवताओ से यह शर्त रखी थी की “मै अपने प्राण-प्यारे पुत्र को नहीं भेजना चाहता” फिर भी इस काम से पीछे हटना उचित नहीं जान पड़ता इसलिए वर्चा मनुष्य बनेगा तो सही, परन्तु वहाँ अधिक दिनों तक नहीं रहेगा। मेरा पुत्र अर्जुन का ही पुत्र होगा, नर-नारायण की अनुपस्थिति में मेरा पुत्र चक्रव्यूह का भेदन करेगा और घमासान युद्ध करके बड़े-बड़े महारथियों को चकित कर देगा और फिर इसी तरह से दिन भर युद्ध करने के बाद सायंकाल में मुझसे मिलने भी आ जाएगा। यही वजह थी की महाभारत के युद्ध के दौरान द्रोणाचार्य के चक्रव्यूह भेदते हुए अभिमन्यु दिनभर युद्ध करने के उपरांत कौरवो के हाथो चक्रव्यूह के भीतर ही वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं। चूंकि चंद्रमा ने शर्त रखी हुई थी इसलिए स्वयम भगवान श्री कृष्ण ने भी अभिमन्यु की नियति में हस्तक्षेप नहीं किया और उसे नहीं बचाया।