राममन्दिर के सहारे अपनी ब्रांडिंग क्यों कर रहे श्रीश्री रविशंकर

लखनऊ। मार्केटिंग, इमेज बिल्डिंग जैसे शब्दों ने दुनिया में समाजसेवा को करोड़ों-अरबों का पेशा बना दिया है। इससे साधू समाज भी अछूता नहीं रहा है। बाबा रामदेव, जिन्होंने योगगुरु के रूप में अपनी पहचान बनाने से लेकर एक सफलतम कारोबारी बनने तक जो कुछ किया उसमें इमेज बिल्डिंग और मार्केटिंग की एक स्ट्रेटजी स्पष्ट नजर आती है।

ऐसा ही कुछ अब श्रीश्री रविशंकर करते नजर आ रहे हैं। जिसके लिए उन्होंने देश के सबसे विवादित धार्मिक मुद्दे को अपना माध्यम बनाया है। जो उन्हें सुर्खियों में तो बनाए हुए है, लेकिन इस विवाद के हल की संभावना दूर—दूर तक नजर नहीं आ रही है।

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श्रीश्री रविशंकर के एकाएक राममन्दिर विवाद में कूदने के औचित्य पर सवाल उठाना लाजमी हो जाता है। क्योंकि वे जबरन एक ऐसे मामले में नाक घुसेड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जो अदालत में विचाराधीन है और सांप्रदायिक राजनीतिक के लिहाज से हमेशा से ज्वलंत रहा है। ऐसे में श्रीश्री को इस विवाद में मध्यस्थता करने की नियत को टटोलना जरूरी हो जाता है।

श्रीश्री रविशंकर के राममंदिर विवाद में मध्यस्थता करने की वजह को ढूंढ़ने के लिए हम बाबा रामदेव को एक केस स्टडी के रूप ले सकते हैं। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि श्रीश्री रविशंकर भी बाबा रामदेव की तरह ही अपने प्रोडक्ट्स लांच कर चुके हैं, लेकिन उनकी ब्रांड सफलता के मामले में पतंजलि के सामने कहीं नहीं ठहरती। खास तौर से उत्तरी भारत में। हो सकता है श्रीश्री रविशंकर ने बाबा रामदेव से कुछ सीख लिया हो।

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योगगुरु बाबा रामदेव एक सामान्य से गुमनाम सन्यासी हुआ करते थे, जिन्होंने करीब एक दशक तक योग के प्रचार प्रसार के जरिए समाज में अपनी मजबूत पैठ के साथ मोटा पैसा भी बनाया। देश और दुनिया में हर धर्म और संप्रदाय के लोग उनसे जुड़े। अपनी पहचान से उन्होंने पहले पतंजलि योगपीठ की स्थापना की। साल 2011—12 में वह भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के अंदोलन से जुड़े।

हालांकि इस आंदोलन के दूसरे हिस्से में सक्रिय भूमिका के साथ उतरने का दांव बाबा रामदेव पर उल्टा बैठ गया। यहीं से बाबा रामदेव ने अपनी नई छवि को गढ़ना शुरू किया। बाबा के रूप में उन्होंने सहानुभूति मिल रही थी तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर मुखर होना उनके लिए समर्थन जुटा रहा था।

बाबा ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर केन्द्र सरकार को घेरने के लिए देशभर में हस्ताक्षर अभियान चलाया और इस अभियान की आड़ में उन्होंने देश भर का भ्रमण कर एक छोटे कस्बे से लेकर टियर वन शहरों में अपनी एक मजबूत टीम खड़ी कर ली। भ्रष्टाचार के विरोध में भावनात्मक रूप से रामदेव के साथ जुड़ी इन टीमों के सदस्य युवा थे और देश में बदलाव के प्रति गंभीर भी।

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भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने अंदोलन में सफल होने के साथ ही रामदेव ने विदेशी बैंकों में जमा भारत के कालेधन को देश में वापस लाने के लिए अपनी आवाज को बुलंद किया। यह दौर ऐसा था, जब बाबा का हर मुद्दे को राजनीतिक और सामाजिक रूप से स्वीकार किया जा रहा था।

अपनी बढ़ती लोकप्रियता का फायदा उठाते हुए बाबा रामदेव ने भारत में कारोबार कर रही विदेशी कंपनियों पर भी हमला बोल दिया। जिसके विकल्प के रूप में पतंजलि के नाम से अपने एफएमजीसी प्रोडक्ट्स की रेंज बाजार में लांच कर दी। बाबा ने अपने बिजनेस मॉडल को एक आन्दोलन का रूप दिया। जिसका मुख्य आधार था देश के पैसे को विदेशी कंपनियों के हाथों में जाने से रोकना। दूसरे शब्दों में देश का पैसा देश की भलाई के काम के लिए।

योगगुरु से अन्दोलनकारी और फिर बिजनेसमैन बने बाबा रामदेव ने रातों रात पतंजलि नाम से अपने घरेलू उत्पाद रेंज को लांच कर डाला। इस समय देश की बड़ी आबादी बाबा रामदेव के आंदोलन और विचारों के समर्थन में खड़ी थी। जिसे बाबा ये समझाने में कामयाब रहे कि उनकी कंपनी देश की भलाई के लिए काम करेगी। जो मुनाफा पतंजलि कमाएगी, उससे वह देश की समस्याओं को हल करने में लगाएंगे, जैसे रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य। जबकि इसके उलट विदेशी कंपनियां भारत में मुनाफा कमाकर विदेश ले जातीं हैं।

बाबा की बात लोगों की समझ में आ गई, शायद वह दौर ही ऐसा था जिसमें राष्ट्रभक्ति की एक नई परिभाषा गढ़ी जा रही थी। जिसके केन्द्र में तीन मुद्दे थे, राजनीतिक भ्रष्टाचार, कालाधन और विदेशी कंपनियों को होने वाले मुनाफे को विदेश जाने से रोकना। बाबा इन तीनों ही मुद्दों पर सवार थे और तीनों का विकल्प उनके पास मौजूद था।

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राजनीतिक भ्रष्टाचार और कालेधन का मुद्दा बाबा रामदेव ने भाजपा को 2014 की विजय के अशीर्वाद के साथ थमा दिया और विदेश कंपनियों का मुकाबला करने के लिए बाबा रामदेव ने खुद कारोबारी बनना स्वीकार कर लिया था।

यहां पर बाबा की आलोचनाओं का एक छोटा दौर भी शुरू हुआ लेकिन बाबा ने इसके लिए अपनी रणनीति पहले ही तैयार कर रखी थी। बाबा ने अपने साथ आन्दोलन के समय जुड़े लोगों को बिक्री के माध्यम बनाया। जिसका लाभ बाबा और समर्थकों दोनों को मिला। वर्तमान समय में पतंजलि देश में सबसे तेजी से उभरता मल्टीप्रोडक्ट ब्रांड है।

क्या है श्रीश्री रविशंकर की योजना —

श्रीश्री रविशंकर यूं तो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, लेकिन उनकी छवि एक हाईप्रोफाइल स्प्रिचुअल गुरु की है जो फिल्मी सितारों और देश के बड़े कारोबारी घरानों के बीच मजबूत पैठ रखते हैं। सामान्य आदमी खासतौर से उत्तरी भारत के लोगों के लिए श्रीश्री का नाम एक हद तक नया है। जिसकी पहचान शहरी आबादी के बीच ही है।

ऐसे में श्रीश्री का उत्तर भारत में आकर रामजन्मभूमि मंदिर के लिए मध्यस्थता करने का प्रयास बिन सिर पैर का नजर आता है। क्योंकि अपने प्रयास के दौरान वह सिर्फ मध्यस्थता पर ज्यादा शब्द ही रटते नजर आए, लेकिन मध्यस्थता किन मुद्दों पर होगी जब इस बात पर सवाल उठे तो वह पूरी तरह से दिशाहीन और मुद्दा विहीन खड़े रहे।

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राममन्दिर और बाबरी मस्जिद के पक्षकारों को छोड़कर उन्होने हिन्दू और मुस्लिम धर्म के तमाम सूरमाओं से मुलाकात कर डाली। कई धर्मगुरुओं और मौलानाओं से व्यक्तिगत भेंट कर उन्होंने सुर्खियां खूब बटोरीं और अपने प्रयास के लिए समर्थन के बीच आलोचनाओं का भी सामना किया। कुल मिलाकर वह इस दौरान किसी न किसी बहाने से सुर्खियों में बने रहे। मीडिया में उन्हें वही जगह मिलती नजर आ रही है जो कभी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बाबा रामदेव को मिली थी, जिसे लेकर वह एक कदम आगे बढ़ गए और कालेधन को देश की राजनीति का मुद्दा बनाने में कामयाब रहे।

श्रीश्री का प्रयास भी कुछ कुछ वैसा ही नजर आ रहा है। उनके प्रयास को देखकर ऐसा लगता है कि वे उत्तर भारत में अपनी ब्रांडिंग के लिए देश के सबसे विवादित धार्मिक मसले के माध्यम से संभावनाएं तलाश रहे हैं। इस नजरिए से श्रीश्री के प्रयासों को देखा जाए तो वह अपनी योजना में सफल रहे हैं, ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि उनकी पहल से राममन्दिर के निर्माण की दिशा में किसी तरह के समझौते की उम्मीद तक पैदा नहीं हुई।

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