यह हिन्दू सख्स रखता है पिछले 31 सालों से रोज़ा, वजह जान हैरान रह जाएंगे आप

Yah Hindu Sakhs Rakh Raha Hai Pichhle 31 Salo Se Roza

गोरखपुर। आज के समय में जहां समाज को जाति-पाति, भेदभाव के नाम पर सियासी पार्टियां तोड़ने में जुटी है जिससे बहकावे में आकार हम सोशल मीडिया पर नफरत की आग भी फैला रहें है वहीं हमारे समाज में कुछ ऐसे लोग है जो सियासी पार्टियों की विचारधारा से अलग है। आज भी हमारे समाज में ऐसे लोग है जो धर्म- मजहब से ऊपर उठ कर आपसी भाई चारा और इंसानियत के बारे में सोचते है। ऐसा ही एक नया मामला सीएम योगी का गढ़ कहे जाने वाले गोरखपुर से आया है जहां एक हिन्दू सख्स पिछले 31 साल से रोज़ा रख रहे है। इसके पीछे का कारण पुछे जाने पर इस सख्स का कहना है कि मुझे नहीं पता था कि रोज़ा किस धर्म का होता है मैंने बचपन में अपने पापा को देखा था हालांकि उन्होने अपने समय में रमजान के महीने में कोई मन्नत मांगी थी जो पूरी हो गयी थी उसके बाद उन्होने रोज़ा रखना शुरू किया था जिसे देख मैंने भी रोज़ा रखना शुरू कर दिया।



मामला गोरखपुर के राजघाट थाना क्षेत्र की है। यहाँ के रहने वाले बाबू लाल का परिवार सां‍प्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल है। बाबूलाल ने बताया की वो पिछले 31 साल से रोज़ा रख रहे है। इतना ही नहीं बाबू लाल ने बताया कि रोज़ा रखना उन्होने अपने पिता और बहन से सीखा तब वो 11 साल के थे। 11 साल कि उम्र से वो रोज़ा रखते चले आ रहे है। इसमे इंका पूरा परिवार साथ देता है, पत्नी गीतांजलि सहरी और इफ्तारी की तैयारी करती हैं। तो बेटा करन, बेटी सदाक्षी और आराध्या दस्तरख्वान पर उनका साथ देते हैं। शुरुआत के 10 रोजे तक ऐसे ही चलता है।



लालबाबू का कहना है कि उनके पिता गंगा प्रसाद का 1986 में निधन हो गया था। उन्होने आगे बताया कि 1950 में परिवार के गुजर-बसर के लिए स्व गंगा प्रसाद ने रमजान में एक दुकान की मन्नत मांगी थी, कि अगर दुकान मिल गई तो वो हर रमजान में 10 रोजे रखेंगे। और जब मन्नत पूरी हो गयी तब से उन्होने र्पोजा रखना शुरू कर दिया था। तब से पिता की इसी परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए वो रोज़ा रखते चले आ रहे है।

गोरखपुर। आज के समय में जहां समाज को जाति-पाति, भेदभाव के नाम पर सियासी पार्टियां तोड़ने में जुटी है जिससे बहकावे में आकार हम सोशल मीडिया पर नफरत की आग भी फैला रहें है वहीं हमारे समाज में कुछ ऐसे लोग है जो सियासी पार्टियों की विचारधारा से अलग है। आज भी हमारे समाज में ऐसे लोग है जो धर्म- मजहब से ऊपर उठ कर आपसी भाई चारा और इंसानियत के बारे में सोचते है। ऐसा ही एक नया मामला…