भ्रष्टाचार पर योगी सरकार का सेल्फी वार

भ्रष्टाचार पर योगी सरकार का सेल्फी वार

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने सड़क निर्माण में होने वाले भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए नई पहल की है। लोक निर्माण विभाग की ओर से जारी एक शासनादेश में कहा गया है कि किसी भी निर्माणाधीन सड़क और पुल के लिए सरकार लागत की अगली किश्त तभी जारी करेगी जब अधिशासी अभियंता पिछली किश्त के बाद हुए विकास कार्य की रिपोर्ट शासन को भेजेगा। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए अभियंता कार्यस्थल पर गए थे और वहां के भौतिक विकास का निरीक्षण और गुणवत्ता परीक्षण किया था, इस बात की प्रमाणिकता के लिए उन्हें अपने दौरे की तस्वीरें भी रिपोर्ट के साथ शासन को भेजनी होंगी।

विभागीय अधिकारियों का मानना है कि लंबे समय त​क किसी ठेकेदार के सम्पर्क में रहने से या किसी अन्य कारण से विभागीय अधिकारी अपने अ​धीनस्थ अधिकारी की मौखिक रिपोर्ट के आधार पर अपनी रिपोर्ट लगाकर कागजी थानापूर्ति कर देते हैं। इन्हीं रिपोर्टों के आधार पर ही शासन अगली किश्त जारी कर देता था। लंबे समय से चली आ रही इस प्रक्रिया में कई ऐसे लूप थे जिनकी वजह से विभाग में भ्रष्टाचार पनपा तो दूसरी ओर ठेकेदारों ने भी कार्य गुणवत्ता को गिराने और काम को निर्धारित समय में पूरा न करने की आदत डाल ली।

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अब ऐसे भ्रष्टाचार को रोकने और कार्य की नियमित गुणवत्ता समीक्षा के लिए शासन स्तर पर इस प्रक्रिया में अधिशासी अभियंता के निरीक्षण दौरों को सुनिश्चित करने के लिए दौरे की फोटोग्राफी अनिवार्य कर दी गई है। इन फोटोज को अभियंता अपनी रिपोर्ट के साथ संलग्न कर विभाग को भेजेगा। फोटोज के माध्यम से निर्माणाधीन सड़क या पुल हो चुके भौतिक विकास और रिपोर्ट भेजने वाले अधिकारी की मौजूदगी दोनों की तस्दीक की जा सकेगी।

जानकारों की माने तो लोकनिर्माण विभाग द्वारा राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत बनने वाले मार्गों और पुलों के निर्माण के लिए प्रदेश सरकार द्वारा जारी होने वाली धनराशि को विभाग कई किश्तों में लोक निर्माण इकाईयों के खातों में भेजा जाता है। इस प्रक्रिया को अपनाने का मुख्य उद्देश्य विकास कार्य की गति और गुणवत्ता को बनाए रखना है। जिसके लिए विभागीय इंजीनियर समय समय पर अपनी रिपोर्ट्स शासन को भेजते हैं और लागत के लिए अगली किश्त जारी करवाते हैं। यह प्रक्रिया दशकों से चली आ रही है। यही वजह है कि ठेकेदारों और इंजीनियरों के बीच एक अनकही सोच विकसित हो चुकी है। जिसके तहत ठेकेदार मनमाने तरीके से काम करता है और इंजीनियर से अपनी सांठगांठ के आधार पर अगली किश्त के लिए रिपोर्ट लगवा लेते हैं। जिसका आधार भ्रष्टाचार ही होता है और परिणाम घटिया और विकास कार्यों में होने वाली देरी के रूप में सामने आते हैं।

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नई व्यवस्था लागू होने से अधिकारियों की कामचोरी की आदत खत्म होगी। जेई जैसे पदों पर तैनात कर्मचारियों की मनमानी पर रोक लग सकेगी। ठेकेदारों पर भी कार्य की गुणवत्ता और कार्य की गति को बनाए रखने का दबाव रहेगा। इसके आधार पर जवाबदेही भी तय की जा सकेगी।

आपको बता दें कि लोक निर्माण विभाग के अपर मुख्य सचिव के कार्यालय से 10 अक्टूबर 2017 को जारी शासनादेश में स्पष्ट किया गया है कि राज्य सड़क निधि, पूर्वांचल विकास निधि, बुंदेलखंड विकास निधि और लोकनिर्माण विभाग की अन्य योजनाओं के तहत बनने वाले मार्गों और पुलों के निर्माण कार्यों में अवशेष धनराशि की मांग के लिए उपयोगिता प्रमाण पत्र और विकास कार्य रिपोर्ट के साथ फोटोग्राफ्स भी उपलब्ध करवाने होंगे।

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