लखनऊ। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भ्रष्टाचार और कामचोरी के आदी हो चुके अधिकारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देकर जो मिशाल पेश कर चुके हैं, अब उसी कारनामे को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दोहराने की तैयारी करते नजर आ रहे हैं। योगी ने यूपी के ऐसे अधिकारियों की एक सूची तैयार की है जिन पर सरकारी ड़ंडा चलना लगभग तय है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने अब तक के कार्यकाल में कुछ 135 अधिकारियों पर कार्रवाई की है, लेकिन योगी इस कार्रवाई के पहले ही चरण में शतक लगाते नजर आ रहे हैं।

सूत्रों की माने तो योगी आदित्यनाथ की हिट लिस्ट में कुछ एक नौकरशाहों के अलावा करीब दो दर्जन सीनियर पीसीएस अधिकारी और करीब 50 सीनियर इंजीनियर शामिल हैं। योगी ​की इस योजना की जानकारी मिलने के बाद से यूपी के लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग, पॉवर कार्पोरेशन, आवास विकास परिषद् और जल निगम जैसे विभागों में अहम पदों पर बैठकर भ्रष्टाचार और सरकारी धन की बर्बादी के आरोपों में सालों से जांचों का सामना करने वाले सीनियर इंजीनियरों की नींद उड़ी हुई है।

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बाबुओं और अधीनस्थ अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं —

कामचोर और भ्रष्ट अधिकारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दिए जाने का फैसला निश्चित ही स्वागत योग्य है। केन्द्र और राज्य सरकारों की इस पहल से अहम पदों पर बैठे अधिकारियों तक अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी से करने का संदेश गया है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या इस सख्ती को केवल उच्च पदस्थ अधिकारियों तक सीमित करना पूरी तरह से उचित है।

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जानकारों की माने तो उच्च पदस्थ अधिकारियों की जिम्मेदारी भले ही ज्यादा हो लेकिन किसी भी विभागीय अनियमितता या विभागीय हीला हवाली में अधीनस्थ अधिकारियों की भूमिका भी बराबर की होती है। सीनियर निर्देश देते हैं, अधीनस्थ अधिकारी जमीनी काम करते हैं। विभाग के बाबू भुगतान करते हैं।

केवल लोकनिर्माण विभाग की ही बात की जाए तो एक वरिष्ठ अभियंता की निगरानी में कई प्रोजेक्ट चलते हैं। इन प्रोजेक्टस की निगरानी के लिए सहायाक अभियंता, अधीक्षण अभियंता और जूनियर इंजीनियर जैसे अधीनस्थ अधिकारी होते हैं। जूनियर इंजीनियर जैसे अधिकारी जमीनी कामों की पूरी निगरानी करते हैं और अपनी रिपोर्ट अपने ऊपर के अधिकारी को भेजते हैं। उच्च पदस्थ अधिकारी अलग—अलग प्रोजेक्ट्स का दौरान करके, जूनियर इंजीनियर की रिपोर्ट और बिल पर हस्ताक्षर कर फाइल को आगे बढ़ा देते हैं। यूनिट के बाबू उन बिलों को पास करवाकर भुगतान करते हैं।

इस तरह से देखा जाए तो उच्च पद पर बैठे अधिकारी तक पहुंचने वाली अनियमितता निचले स्तर से शुरू होती है। आम तौर पर उच्च पदस्थ अधिकारी बदलते रहते हैं लेकिन अधीनस्थ अधिकारियों की बदली लंबे अंतराल के बाद होती है। मुख्य रूप से बाबुओं की तैनाती दशकों तक एक ही पद पर बनी रहती है। इस लिहाज से निचले स्तर इतना मजबूत तंत्र जड़ें जमा लेता है। जो उच्च पदस्थ अधिकारी की कार्यशैली को भी प्रभावित करता है।

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इस विषय को अगर सरकारें गंभीरता से लें तो उन्हें कुछ भ्रष्ट बाबुओं और छोटे अधिकारियों पर बैठे अधिकारियों पर भी अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने जैसी कार्रवाई करनी चाहिए। ताकि हर कुर्सी पर बैठे सरकारी नौकर को संदेश जाए कि उसे अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाना है। अगर उसने अपने कर्तव्य यानी ड्यूटी से समझौता किया तो यह उसकी नौकरी के लिए खतरनाक हो सकता है।