योगी जी! क्या ऐसे मंत्री-विधायकों के रहते आपके अधिकारी ले पाएंगे निष्पक्ष फैसले

लखनऊ। योगी आदित्यनाथ बतौर मुख्यमंत्री अपना सौ दिनों का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। इन सौ दिनों में योगी को यह बात समझ आ गई है कि वे सूबे की सबसे बड़ी कुर्सी पर तो बैठे हैं लेकिन उनके सिर पर कांटों का ताज है। जनता ने जो अपेक्षाएं उन्हें देखकर पालीं हैं उन पर खरा उतरना आसान नहीं है। इसके लिए उन्हें और उनके सहयोगियों को कड़े और बड़े फैसले लेने होंगे। फैसले लिए भी जा रहे हैं लेकिन सीएम योगी के ही मंत्री और विधायकों को इन फैसलों से परेशानी होना शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री के निर्देशों को विधायक और मंत्री मानने से इंकार कर रहे हैं।

Yogi Ji Whether Your Officials Will Be Able To Take Fair Decisions From Such Minister Legislators :

सीएम योगी ने यूपी के सभी जिला अधिकारियों को सख्त और निष्पक्ष काम करने का निर्देश दिया था। अधिकारियों ने सीएम की निर्देशों को अमल लाने की कोशिश की तो लेकिन स्थानीय विधायक सत्ता का रसूख दिखा कर अधिकारियों के फैसलों को प्रभावित करने की कोशिश में लगे नजर आए। ऐसे बीजेपी नेताओं की लिस्ट बढ़ती ही जा रही है जो अपना वर्चस्व दिखाने के खातिर बागी रूप अख़्तियार करने को तैयार है।

हम बात करे बीजेपी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर की जिन्होंने जिलाधिकारी के तबादले को लेकर अपने समर्थकों के साथ धरने पर बैठने का एलान कर दिया है। ऐसा ही कुछ दिन पहले गोरखपुर में देखने को मिला था जहां भाजपा के वरिष्ठ नेता और गोरखपुर से विधायक राधा मोहनदास अग्रवाल बात न माने जाने पर महिला आईपीएस से भिड़ गए थे। सत्ता में रहते हुए अपने फरमान की सुनवाई नेता जी को इतनी नगवार गुजरी कि वे स्थानीय प्रशासन के खिलाफ धरना देने को तैयार हो गए थे।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर सरकार के नुमाइंदे ही प्रशासनिक कार्रवाईयों के बीच अपनी नाक फंसा कर निष्पक्ष फैसलों को प्रभावित कर अपने समर्थकों को खुश करते रहेंगे तो बदलाव कैसे आएगा। अगर वाहन चैकिंग के दौरान कोई अधिकारी अपनी ड्यूटी के दौरान किसी विधायक या मंत्री के करीबी की गाड़ी का चालान कर देता है तो उसका तबादला हो जाता है। आखिर इस तरह की राजनीति कितने दिन और चलेगी।

हमारा संविधान किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी को यह अधिकार नहीं देता कि उसके नेता या समर्थक सत्ता में आने के बाद नियम और कानून को ताक पर रखकर मनमानी करेंगे। हम जिस व्यवस्था में रहते हैं उसके भीतर के कानूनों का पालन करना हमारा दायित्व है। हर ​व्यक्ति अपने दायित्व का पालन भली भांति करे इसकी निगरानी के लिए प्रशासन को तैनात किया गया है। इस व्यवस्था से अगर छेड़छाड़ होती है तो निश्चित ही इसका प्रभाव पूरी व्यवस्था पर पड़ेगा जिसका परिणाम 100 दिन में नहीं पांच सालों में सामने आएगा।।

लखनऊ। योगी आदित्यनाथ बतौर मुख्यमंत्री अपना सौ दिनों का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। इन सौ दिनों में योगी को यह बात समझ आ गई है कि वे सूबे की सबसे बड़ी कुर्सी पर तो बैठे हैं लेकिन उनके सिर पर कांटों का ताज है। जनता ने जो अपेक्षाएं उन्हें देखकर पालीं हैं उन पर खरा उतरना आसान नहीं है। इसके लिए उन्हें और उनके सहयोगियों को कड़े और बड़े फैसले लेने होंगे। फैसले लिए भी जा रहे हैं लेकिन सीएम योगी के ही मंत्री और विधायकों को इन फैसलों से परेशानी होना शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री के निर्देशों को विधायक और मंत्री मानने से इंकार कर रहे हैं। सीएम योगी ने यूपी के सभी जिला अधिकारियों को सख्त और निष्पक्ष काम करने का निर्देश दिया था। अधिकारियों ने सीएम की निर्देशों को अमल लाने की कोशिश की तो लेकिन स्थानीय विधायक सत्ता का रसूख दिखा कर अधिकारियों के फैसलों को प्रभावित करने की कोशिश में लगे नजर आए। ऐसे बीजेपी नेताओं की लिस्ट बढ़ती ही जा रही है जो अपना वर्चस्व दिखाने के खातिर बागी रूप अख़्तियार करने को तैयार है। हम बात करे बीजेपी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर की जिन्होंने जिलाधिकारी के तबादले को लेकर अपने समर्थकों के साथ धरने पर बैठने का एलान कर दिया है। ऐसा ही कुछ दिन पहले गोरखपुर में देखने को मिला था जहां भाजपा के वरिष्ठ नेता और गोरखपुर से विधायक राधा मोहनदास अग्रवाल बात न माने जाने पर महिला आईपीएस से भिड़ गए थे। सत्ता में रहते हुए अपने फरमान की सुनवाई नेता जी को इतनी नगवार गुजरी कि वे स्थानीय प्रशासन के खिलाफ धरना देने को तैयार हो गए थे। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर सरकार के नुमाइंदे ही प्रशासनिक कार्रवाईयों के बीच अपनी नाक फंसा कर निष्पक्ष फैसलों को प्रभावित कर अपने समर्थकों को खुश करते रहेंगे तो बदलाव कैसे आएगा। अगर वाहन चैकिंग के दौरान कोई अधिकारी अपनी ड्यूटी के दौरान किसी विधायक या मंत्री के करीबी की गाड़ी का चालान कर देता है तो उसका तबादला हो जाता है। आखिर इस तरह की राजनीति कितने दिन और चलेगी। हमारा संविधान किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी को यह अधिकार नहीं देता कि उसके नेता या समर्थक सत्ता में आने के बाद नियम और कानून को ताक पर रखकर मनमानी करेंगे। हम जिस व्यवस्था में रहते हैं उसके भीतर के कानूनों का पालन करना हमारा दायित्व है। हर ​व्यक्ति अपने दायित्व का पालन भली भांति करे इसकी निगरानी के लिए प्रशासन को तैनात किया गया है। इस व्यवस्था से अगर छेड़छाड़ होती है तो निश्चित ही इसका प्रभाव पूरी व्यवस्था पर पड़ेगा जिसका परिणाम 100 दिन में नहीं पांच सालों में सामने आएगा।।