Zero Movie Review: दमदार कलाकारों के साथ शाहरुख की सबसे बेदम फिल्म ‘जीरो’

Zero Movie Review
Zero Movie Review: दमदार कलाकारों के साथ शाहरुख की सबसे बेदम फिल्म 'जीरो'

फिल्म: जीरो

Zero Movie Review :

निर्देशक: आनंद एल. राय

स्टार: शाहरुख खान, अनुष्का शर्मा, कटरीना कैफ, तिग्मांशु धूलिया, आर माधवन

अवधि: 2.38 घण्टे

रेटिंग्स: 1*

Zero Film Review: शाहरुख खान फिल्म जीरो(Zero) से एक बार फिर बेहद चैलेंजिंग रोल के साथ लौटे हैं। शायद ही शाहरुख के लुक पर इतना काम उनके तीन दशक के करियर में कभी हुआ हो। लेकिन इसी फिल्म में उन्हें अपने रोल से चैलेंज दे रही हैं अनुष्का शर्मा। उनकी अदाकारी शाहरुख पर भारी है। ढाई घंटे से ज्यादा की फिल्म में कैटरीना कैफ (Katrina Kaif) सुपरस्टार एक्ट्रेस बबिता कुमारी के रोल में हैं, और उनका रोल कैमियो जैसा लगता है। फिल्म में सितारों की भीड़ होने के बावजूद ‘Zero’ सिर्फ शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा की ही फिल्म है। आनंद एल राय द्वारा निर्देशित ‘जीरो’ (Zero) में कुछ नया देखने को नहीं मिला, सिवाय बउआ सिंह को ‘मंगल’ भेजने के। लेकिन बाकी लोगों के गले उतरेगी यह कहना मुश्किल है।

निर्देशन की धार और कलम की ताकत इस फिल्म में पूरी तरह से गायब है

‘जीरो’ में ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपके दिल को छू सके सभी कुछ फिल्मी और बनावटी लगता है। फ़िल्मी मैंने इसलिए लिखा क्योंकि आनंद एल राय अपनी फिल्मों में जमीनी एहसास दिखाने के लिए जाने जाते है जो दर्शक इसके पहले काफी पसंद कर चुके है। हिमांशु शर्मा ने इस फिल्म की कहानी लिखी है और फिल्म देखने के बाद आप खुद से यही कहते है की यह सब क्या था। हिमांशु के कलम की धार इस फिल्म में पूरी तरह से गायब है। ‘जीरो’ में सब कुछ सहज दिखाया गया है।

कहने का मतलब ये है की जब चीजों का ट्रांजीशन होता है तब निर्देशक ने ये बताने की कोशिश नहीं की है की चीजें आखिर हुई कैसे। सबसे पहली शिकायत तो यही है की फिल्म में एक बौने और और एक ऑटिस्टिक औरत का जो प्रेम दिखाया गया है वो अपने आप में ही काफी अटपटा लगता है। दो बे मेल दुनिया को आनंद राय ने मिलाने की कोशिश की है और उनकी हर कोशिश झूठी लगती है।

शाहरुख खान कॉमेडी टाइमिंग ही देखने लायक है

गनीमत है की शाहरुख खान के कॉमिक टाइमिंग की वजह से फिल्म में कुछ जान रहती है। उनको देखने में मजा आता है। इसकी एक वजह ये भी हो सकती है की शाहरुख खान अपने इस अंदाज में सालों बाद नजर आयें है। अनुष्का एक ऑटिस्टिक औरत है फिल्म में और उन्होंने एक ऑटिस्टिक पेशेंट के मैनेरिज्म को सीखने के लिए किसका सहारा लिए इस बात को मुझे जानने में दिलचस्पी होगी। उनका अभिनय, अभिनय कम और लीपा पोती ज्यादा नजर आता है। कैटरीना कैफ कम समय के लिए फिल्म में है लेकिन ईमानदारी उनके काम में नजर आती है। मोहम्मद ज़ीशान अयूब के लिए यही सलाह होगी की अपने हीरो का दोस्त बनना वो बंद कर दे।

एक साइड किक के अलावा वो और कुछ नजर नहीं आते है। इस फिल्म के सबसे बड़े मुजरिम आनंद राय और हिमांशु शर्मा ही है जिनके ना निर्देशन और ना ही लेखन में कोई धार है। जरा सोचिए एक सीन में कैटरीना कैफ का पब्लिक के सामने अपीयरेंस का सीन है और वो वह पर शराब की बोतल के साथ पहुंच जाती है। ये सब कुछ बकवास नजर आता है। अजय अतुल के संगीत की की ताकत सिर्फ एक गाने में ही नजर आती है। बाकी सभी गाने औसत दर्जे के ही हैं।

फिल्म: जीरो

निर्देशक: आनंद एल. राय

स्टार: शाहरुख खान, अनुष्का शर्मा, कटरीना कैफ, तिग्मांशु धूलिया, आर माधवन

अवधि: 2.38 घण्टे

रेटिंग्स: 1*

Zero Film Review: शाहरुख खान फिल्म जीरो(Zero) से एक बार फिर बेहद चैलेंजिंग रोल के साथ लौटे हैं। शायद ही शाहरुख के लुक पर इतना काम उनके तीन दशक के करियर में कभी हुआ हो। लेकिन इसी फिल्म में उन्हें अपने रोल से चैलेंज दे रही हैं अनुष्का शर्मा। उनकी अदाकारी शाहरुख पर भारी है। ढाई घंटे से ज्यादा की फिल्म में कैटरीना कैफ (Katrina Kaif) सुपरस्टार एक्ट्रेस बबिता कुमारी के रोल में हैं, और उनका रोल कैमियो जैसा लगता है। फिल्म में सितारों की भीड़ होने के बावजूद ‘Zero' सिर्फ शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा की ही फिल्म है। आनंद एल राय द्वारा निर्देशित ‘जीरो' (Zero) में कुछ नया देखने को नहीं मिला, सिवाय बउआ सिंह को ‘मंगल' भेजने के। लेकिन बाकी लोगों के गले उतरेगी यह कहना मुश्किल है।

निर्देशन की धार और कलम की ताकत इस फिल्म में पूरी तरह से गायब है

'जीरो' में ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपके दिल को छू सके सभी कुछ फिल्मी और बनावटी लगता है। फ़िल्मी मैंने इसलिए लिखा क्योंकि आनंद एल राय अपनी फिल्मों में जमीनी एहसास दिखाने के लिए जाने जाते है जो दर्शक इसके पहले काफी पसंद कर चुके है। हिमांशु शर्मा ने इस फिल्म की कहानी लिखी है और फिल्म देखने के बाद आप खुद से यही कहते है की यह सब क्या था। हिमांशु के कलम की धार इस फिल्म में पूरी तरह से गायब है। 'जीरो' में सब कुछ सहज दिखाया गया है। कहने का मतलब ये है की जब चीजों का ट्रांजीशन होता है तब निर्देशक ने ये बताने की कोशिश नहीं की है की चीजें आखिर हुई कैसे। सबसे पहली शिकायत तो यही है की फिल्म में एक बौने और और एक ऑटिस्टिक औरत का जो प्रेम दिखाया गया है वो अपने आप में ही काफी अटपटा लगता है। दो बे मेल दुनिया को आनंद राय ने मिलाने की कोशिश की है और उनकी हर कोशिश झूठी लगती है।

शाहरुख खान कॉमेडी टाइमिंग ही देखने लायक है

गनीमत है की शाहरुख खान के कॉमिक टाइमिंग की वजह से फिल्म में कुछ जान रहती है। उनको देखने में मजा आता है। इसकी एक वजह ये भी हो सकती है की शाहरुख खान अपने इस अंदाज में सालों बाद नजर आयें है। अनुष्का एक ऑटिस्टिक औरत है फिल्म में और उन्होंने एक ऑटिस्टिक पेशेंट के मैनेरिज्म को सीखने के लिए किसका सहारा लिए इस बात को मुझे जानने में दिलचस्पी होगी। उनका अभिनय, अभिनय कम और लीपा पोती ज्यादा नजर आता है। कैटरीना कैफ कम समय के लिए फिल्म में है लेकिन ईमानदारी उनके काम में नजर आती है। मोहम्मद ज़ीशान अयूब के लिए यही सलाह होगी की अपने हीरो का दोस्त बनना वो बंद कर दे। एक साइड किक के अलावा वो और कुछ नजर नहीं आते है। इस फिल्म के सबसे बड़े मुजरिम आनंद राय और हिमांशु शर्मा ही है जिनके ना निर्देशन और ना ही लेखन में कोई धार है। जरा सोचिए एक सीन में कैटरीना कैफ का पब्लिक के सामने अपीयरेंस का सीन है और वो वह पर शराब की बोतल के साथ पहुंच जाती है। ये सब कुछ बकवास नजर आता है। अजय अतुल के संगीत की की ताकत सिर्फ एक गाने में ही नजर आती है। बाकी सभी गाने औसत दर्जे के ही हैं।