नई दिल्ली। दुर्गा पूजा के दौरान मां दुर्गा की आराधना के बाद जब उनकी विदाई का समय आता है, तो माहौल भावुक और उत्सवमय हो जाता है। खासतौर पर पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य क्षेत्रों में विजयादशमी के दिन ‘सिंदूर खेला’ की परंपरा निभाई जाती है। यह केवल एक रस्म या उत्सव नहीं, बल्कि इससे जुड़ी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का अपना एक विशेष महत्व है।
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विवाहित महिलाएं ‘सिंदूर खेला’ में मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सौभाग्य, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं। ऐसा माना जाता है कि मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर महिलाएं उनसे अपने परिवार की रक्षा और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मांगती हैं।
मां दुर्गा को सिंदूर क्यों लगाया जाता है?
सिंदूर को हिंदू परंपरा में सौभाग्य और वैवाहिक जीवन का प्रतीक माना जाता है। दुर्गा पूजा के दौरान मां दुर्गा को सिंदूर चढ़ाने के पीछे शक्ति और मंगल की भावना जुड़ी हुई है। इसके बाद महिलाएं एक-दूसरे के माथे और मांग में सिंदूर लगाकर एक दूसरे को शुभकामनाएं देती हैं।
‘सिंदूर खेला’ का संदेश क्या है?
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इस परंपरा का एक गहरा संदेश एकता, प्रेम और आपसी सौहार्द से भी माना जाता है। देवी की विदाई के समय महिलाएं एक-दूसरे के साथ खुशियां बांटती हैं। साथ ही आने वाले वर्ष के लिए सुख-शांति की कामना करती हैं। यह रस्म हमें यह भी याद दिलाती है कि उत्सव केवल व्यक्तिगत खुशी का अवसर नहीं, बल्कि समाज और परिवार को साथ जोड़ने का माध्यम भी है।
इसके अलावा मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन के साथ यह संदेश दिया जाता है कि मां भले ही अपने धाम लौट रही हों, लेकिन उनकी शक्ति, आस्था और आशीर्वाद भक्तों के जीवन में हमेशा बना रहे। यही वजह है कि ‘सिंदूर खेला’ आज भी दुर्गा पूजा की सबसे भावनात्मक और प्रसिद्ध परंपराओं में से एक माना जाता है।