लखनऊ। यूपी की राजनीति (UP Politics) में अक्सर जातीय समीकरण और चुनावी गठजोड़ ही चर्चा के प्रमुख केंद्र बनते हैं, लेकिन इस बार विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद जारी अंतिम मतदाता सूची ने न सिर्फ आंकड़ों में बड़ा बदल दिया है। बल्कि यूपी विधानसभा चुनाव 2027 (UP Assembly Elections 2027) से पहले सभी राजनीतिक दलों को अपने पूरे चुनावी गणित पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।
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बीते 10 अप्रैल को जारी अंतिम सूची के अनुसार यूपी में कुल 13 करोड़ 39 लाख 84 हजार 792 मतदाता हैं। इससे पहले 27 अक्टूबर 2025 को जारी सूची में यह संख्या 15.44 करोड़ थी। यानी इस पूरी प्रक्रिया में करीब 2.05 करोड़ मतदाताओं के नाम हटे हैं। हालांकि 6 जनवरी को जारी मसौदा सूची (12.55 करोड़) के मुकाबले अंतिम सूची में 84.28 लाख मतदाता बढ़े भी हैं।
शहरी इलाकों में सबसे बड़ी कटौती
मतदाता सूची के इस पुनरीक्षण का असर राज्य के लगभग हर हिस्से में दिखा, लेकिन सबसे ज्यादा हलचल उन शहरी जिलों में मची जिन्हें अब तक बीजेपी (BJP) का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। राजधानी लखनऊ में 9.14 लाख यानी 22.89 प्रतिशत मतदाताओं के नाम सूची से हट गए।
इसी तरह गाजियाबाद में 20.24 प्रतिशत, कानपुर नगर में 19.42 प्रतिशत, गौतम बुद्ध नगर में 19.33 प्रतिशत, मेरठ में 18.75 प्रतिशत, आगरा में 17.71 प्रतिशत और प्रयागराज में 17.62 प्रतिशत मतदाता कम हो गए हैं। इन आंकड़ों को केवल तकनीकी प्रक्रिया मानकर नजरअंदाज करना मुश्किल है, क्योंकि यही वे शहर हैं जहां 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में BJP ने बड़ी जीत दर्ज की थी। लखनऊ, गाजियाबाद, नोएडा, मेरठ और प्रयागराज जैसे शहरी केंद्र BJP की चुनावी सफलता की रीढ़ रहे हैं। ऐसे में इन इलाकों में बड़े पैमाने पर मतदाता घटने से स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठने लगा है कि क्या इससे पार्टी की चुनावी स्थिति पर असर पड़ेगा।
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BJP के एक वरिष्ठ नेता इस स्थिति को अलग नजरिए से देखते हैं। उनका कहना है कि यह “प्राकृतिक शिफ्टिंग” का परिणाम है। उनके अनुसार, “शहरों में रहने वाले बड़ी संख्या में प्रवासी मतदाता अपने पैतृक गांवों में वापस लौटे हैं या उन्होंने वहां वोट ट्रांसफर कराया है। इससे शहरों में संख्या घटी है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि इससे किसी एक पार्टी को नुकसान हो, लेकिन विपक्ष इस तर्क से सहमत नहीं दिखता।
समाजवादी पार्टी (SP) के अनुषांगिक संगठन लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभिषेक यादव (Abhishek Yadav, National President of Lohia Vahini) का कहना है कि शहरी क्षेत्रों में इतनी बड़ी कटौती कई सवाल खड़े करती है। अभिषेक का मानना है कि यह बदलाव चुनावी संतुलन को प्रभावित कर सकता है और इसकी गहन जांच होनी चाहिए।
कम हार-जीत अंतर वाली सीटों की बड़ी भूमिका
दिलचस्प बात यह है कि ग्रामीण इलाकों में भी मतदाता घटे हैं, लेकिन वहां यह गिरावट अपेक्षाकृत कम रही है। कन्नौज, बलरामपुर, बदायूं, बहराइच, फर्रुखाबाद, सोनभद्र और इटावा जैसे जिलों में 14 से 17 प्रतिशत के बीच नाम हटाए गए हैं। ये जिले पारंपरिक रूप से सपा के प्रभाव क्षेत्र माने जाते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक (PDA) समीकरण के सहारे अपनी सीटें 37 तक बढ़ाई थीं और ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत पकड़ बनाई थी। ऐसे में इन इलाकों में मतदाता घटने से सपा के भीतर भी चिंता है, लेकिन प्रतिशत कम होने के कारण पार्टी इसे पूरी तरह नुकसान की स्थिति नहीं मान रही।
इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा असर उन विधानसभा सीटों पर दिख रहा है जहां पहले जीत का अंतर बहुत कम था। राज्य में करीब 49 सीटें ऐसी हैं जहां 2022 के चुनाव में जीत का अंतर 5000 से कम था। अब इन सीटों पर हजारों की संख्या में मतदाता घटने से पूरा चुनावी गणित बदल सकता है। लखनऊ कैंट विधानसभा सीट पर सबसे ज्यादा 34.18 प्रतिशत मतदाता कम हुए हैं। इसके बाद इलाहाबाद उत्तर (34.01 फीसदी), लखनऊ पूर्व (31.01 फीसदी), आगरा कैंट (30.47 फीसदी) और साहिबाबाद (30.36 फीसदी) जैसी सीटें हैं। ये सभी सीटें BJP के पास रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जहां जीत का अंतर कम था, वहां यह बदलाव निर्णायक साबित हो सकता है। उम्मीदवारों को अब नए सिरे से जातीय और स्थानीय समीकरण बैठाने होंगे।
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यह ट्रेंड राजनीतिक बहस को और तेज कर रहा है। विपक्ष इसे सामाजिक आधार पर असर मान रहा है, जबकि चुनाव आयोग (Election Commission) का कहना है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और नियमों के तहत की गई है। आयोग के मुताबिक डुप्लीकेट, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं को हटाना जरूरी था और इसी वजह से इतनी बड़ी संख्या में नाम कटे हैं। इस प्रक्रिया में सामने आया कि करीब 1.04 करोड़ मतदाताओं के डेटा में पारिवारिक मिलान नहीं था, जबकि 2.22 करोड़ मामलों में तार्किक विसंगतियां थीं। इन सभी मामलों की जांच के बाद ही अंतिम सूची तैयार की गई।
मुस्लिम बहुल क्षेत्रों पर भी असर
मतदाता सूची के इस बदलाव में एक और अहम पहलू मुस्लिम बहुल क्षेत्रों का है. जिन जिलों में मुस्लिम आबादी अधिक है- जैसे संभल, रामपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर और मुजफ्फरनगर- वहां मतदाता घटने की दर 8 से 12 प्रतिशत के बीच रही, जो शहरी जिलों की तुलना में काफी कम है। भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) ने उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से 46 सीटों के लिए हिंदी और उर्दू में अंतिम मतदाता सूची जारी की है। ये वे सीटें हैं जहां करीब 30 प्रतिशत या उससे अधिक आबादी उर्दू पढ़-समझ सकती है, इसलिए इन्हें खास तौर पर द्विभाषी सूची में शामिल किया गया है।
इन सीटों को राजनीतिक रूप से मुस्लिम प्रभाव वाले क्षेत्र माना जाता है, जिनमें से अधिकांश पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थित हैं। पहले इन सीटों पर BJP और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबला लगभग बराबरी का रहा था। 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने इन 46 सीटों में से 23 सीटें जीती थीं, जबकि BJP ने 22 सीटों पर जीत दर्ज की थी। सपा की जीत का औसत अंतर लगभग 27 हजार वोट रहा, जबकि BJP का औसत अंतर करीब 17 हजार वोट था। लेकिन अब विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद तस्वीर कुछ बदली हुई दिख रही है।
जारी आंकड़ों के मुताबिक, BJP ने जो सीटें जीती थीं, उन पर 71,342 मतदाताओं के नाम कटे हैं, जबकि सपा की सीटों पर यह संख्या 43,926 है। यानी BJP के कब्जे वाली सीटों पर अधिक वोट कम हुए हैं। इन 46 सीटों में से 16 सीटों पर मुस्लिम विधायक चुने गए थे, जिनमें 15 सपा से और एक सहयोगी दल SBSP से था। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी इन क्षेत्रों में सपा और कांग्रेस गठबंधन को बढ़त मिली थी। कुल मिलाकर, इन सीटों पर मतदाता सूची में हुए बदलाव ने राजनीतिक दलों खासकर BJP की चिंता बढ़ा दी है और आने वाले चुनावों के लिए नए समीकरण बनाने की जरूरत पैदा कर दी है।
BJP मंत्रियों की बढ़ेगी मुश्किलें
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SIR के बाद जारी अंतिम मतदाता सूची ने खास तौर पर सत्ता पक्ष, यानी BJP के कई दिग्गज नेताओं की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सामने आए आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश की कई वीआईपी सीटों पर बड़ी संख्या में वोट घटे हैं, जिससे जीत का पुराना गणित अब भरोसेमंद नहीं रहा। सबसे ज्यादा असर उन सीटों पर दिख रहा है जहां BJP के वरिष्ठ नेता या मंत्री चुनाव लड़ते रहे हैं।
उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य (Deputy Chief Minister Keshav Prasad Maurya) की सिराथू सीट (Sirathu Seat) 2022 में वह यह चुनाव महज 7,337 वोटों से हार गए थे, लेकिन अब इस सीट पर 52,985 वोट कम हो गए हैं। ऐसे में अगली बार मुकाबला और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना (Assembly Speaker Satish Mahana) की कानपुर की महाराजपुर सीट (Kanpur Maharajpur Seat) पर भी बड़ा असर दिखा है। यहां कुल 1.29 लाख वोट कटे, जबकि करीब 39 हजार नए जुड़े। इसके बावजूद नेट आधार पर करीब 90 हजार वोट कम हो गए हैं। अगर महाना फिर चुनाव लड़ते हैं, तो उन्हें बिल्कुल नए सिरे से रणनीति बनानी होगी।
इसी तरह कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी (Cabinet Minister Nand Gopal Gupta Nandi) की इलाहाबाद दक्षिण सीट (Allahabad South Seat) पर करीब 99 हजार वोट कम हुए हैं। यह गिरावट इतनी बड़ी है कि उनकी पारंपरिक बढ़त पर सीधा असर पड़ सकता है। हरदोई में आबकारी राज्यमंत्री नितिन अग्रवाल (Minister of State for Excise, Nitin Agarwal, Hardoi) की सीट पर 85,757 वोट घटे हैं, जबकि उन्होंने पिछला चुनाव 43,148 वोटों से जीता था। यानी उनकी जीत के अंतर से दोगुने से भी ज्यादा वोट कम हो गए हैं, जो उनके लिए सीधी चुनौती है।
उच्च शिक्षा राज्यमंत्री रजनी तिवारी (Minister of State for Higher Education, Rajni Tiwari) की शाहाबाद सीट (Shahabad Seat) पर भी करीब 39 हजार वोट कम हुए हैं. वहीं मथुरा की छाता सीट से विधायक लक्ष्मी नारायण चौधरी (MLA Laxmi Narayan Chaudhary) के क्षेत्र में 47 हजार वोट घटे हैं, जबकि उनकी पिछली जीत का अंतर लगभग 48 हजार था। इन आंकड़ों से साफ है कि BJP के कई मंत्रियों की सीटों पर वोटों की कटौती इतनी बड़ी है कि पुराने जीत के अंतर अब सुरक्षित नहीं रह गए हैं। ऐसे में पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इन सीटों पर नए सामाजिक और जातीय समीकरण तैयार करे।
पलायन और डुप्लीकेट हटाने का असर
SIR के बाद अंतिम आंकड़ों को देखते हुए मतदाता सूची के इस बदलाव के पीछे एक बड़ा कारण पलायन भी बताया जा रहा है। चुनाव आयोग और BJP दोनों का मानना है कि बड़ी संख्या में लोग शहरों से अपने गांवों की ओर लौटे हैं और उन्होंने वहां वोट ट्रांसफर कराया है। खासतौर पर वे लोग जो दूसरे राज्यों से आकर शहरों में काम करते थे, उन्होंने अपने मूल स्थान पर मतदाता पंजीकरण कराया है।
इस प्रक्रिया के दौरान बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस समेत सभी दलों ने अपने कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर लगाया। कुल 5.82 लाख बूथ लेवल एजेंट इस प्रक्रिया में शामिल हुए। पार्टियों ने न केवल यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि उनके समर्थकों के नाम न कटें, बल्कि नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए भी अभियान चलाया। 86.69 लाख लोगों ने फॉर्म-6 भरकर नाम जुड़वाने के लिए आवेदन किया, जबकि 3.18 लाख लोगों ने फॉर्म-7 के जरिए नाम हटवाने के लिए आवेदन किया।
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इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस पूरी प्रक्रिया से किसे फायदा होगा और किसे नुकसान। इसका स्पष्ट जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह मान लेना गलत होगा कि वोट कटने से किसी एक पार्टी को ही नुकसान हुआ है।असली तस्वीर तब सामने आएगी जब यह पता चलेगा कि नए जुड़े मतदाता किस सामाजिक और राजनीतिक वर्ग से आते हैं।
फिलहाल इतना जरूर तय है कि इस मतदाता सूची ने 2027 के विधानसभा चुनाव की दिशा बदल दी है। BJP को शहरी इलाकों में अपनी पकड़ फिर से मजबूत करनी होगी, जबकि सपा को ग्रामीण और सामाजिक समीकरण को और मजबूत करना होगा। बीएसपी और कांग्रेस भी इस बदलाव में अपने लिए नई संभावनाएं तलाशनी होंगी।