पिथौरागढ़। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में एक ऐसा मंदिर स्थित है, जिसे लोग “न्याय का दरबार” कहते हैं। यह मंदिर मां कोकिला का है, जिन्हें कोटगाड़ी देवी के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर में अदालत समेत हर दरवाजे से निराश हो चुके लोग भी पहुंचते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां देवी बिना वकील और दलील के न्याय कर देती हैं।
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कहां है मंदिर
आपको बता दें कि यह मंदिर पिथौरागढ़ जिले के पांखू क्षेत्र के कोटगाड़ी गांव में स्थित है। यह प्रसिद्ध पर्यटन स्थल चौकोड़ी के पास है और कोटमन्या तथा थल से लगभग 17 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है। इस मंदिर को स्थानीय लोग शक्तिपीठ मानते हैं जो देवी भगवती को समर्पित है।
कैसे लगाई जाती है अर्जी
यहां मंदिर में श्रद्धालु चिट्ठी लिखकर न्याय की गुहार लगाते हैं। इस मंदिर में टंगी असंख्य अर्जियां इस आस्था की गवाही देती हैं। इसके अलावा दूर-दराज के भक्त मंदिर के नाम डाक से भी पत्र भेजते हैं और मनोकामना पूरी होने पर धन्यवाद का पत्र भी लिखकर भेजते हैं। इस मंदिर की मान्यता यह भी है कि देवी का नाम लेकर कहीं से भी पुकार लगाई जाए, तो वह सुन लेती हैं। वहां के स्थानीय भाषा में इसे विरोधी के खिलाफ “घात” डालना कहा जाता है।
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नाम के पीछे की मान्यता
लोक मान्यता के मुताबिक, “कोट” का अर्थ कोर्ट यानी अदालत और “गाड़” का अर्थ निकालना है। इसका मतलब है कि जो न्याय अदालत में भी नहीं मिल पाता, उसे देवी बाहर से ही न्याय दिला देती हैं। इसी कारण उन्हें न्याय की देवी कहा जाता है।
न्याय के साथ डर भी
ऐसी मान्यता है कि यदि विरोधी दोषी हो, तो देवी उसे कठोर दंड देती हैं। लेकिन अगर फरियादी ही झूठा आरोप लगा रहा हो, तो वह भी देवी के कोप से नहीं बच पाता है। इसी के चलते लोग बहुत सोच-समझकर ही यहां गुहार लगाते हैं। श्रद्धा के साथ मिला यह भय स्थानीय समाज में नैतिक अनुशासन भी बन गया है।
जंगल बचाने की अनूठी परंपरा
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सूत्रों से मिली प्राप्त जानकारी के मुताबिक, कुमाऊं के कई गांवों ने इस आस्था का उपयोग पर्यावरण बचाने में भी किया है। गांववाले अपने आसपास के जंगलों को पांच से 10 वर्षों के लिए मां कोकिला को अर्पित कर देते हैं। इसके बाद उन जंगलों से कोई एक पौधा भी काटने की हिम्मत नहीं करता।
पूजा की परंपरा
यहां की स्थानीय मान्यता है कि देवी ने स्वयं दशौली गांव के पाठक ब्राह्मण परिवार को पूजा के लिए बुलवाया था। आज भी उस परिवार की करीब 10 पीढ़ियों के लगभग 28 परिवार इस मंदिर में पूजा का दायित्व पूरा करते हैं। इस मंदिर के पास भंडारी ग्वल ज्यू का मंदिर भी है, जहां कोटगाड़ी आने वाले श्रद्धालुओं के लिए शीश नवाना और खिचड़ी का प्रसाद चढ़ाना बहुत आवश्यक माना जाता है।
कैसे पहुंचें
हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा पंतनगर है, जहां से मंदिर करीब 245 किलोमीटर दूर है।
रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम है, जहां से दूरी लगभग 210 किलोमीटर है।
दोनों जगहों से टैक्सी या निजी वाहन से पहुंचा जा सकता है।