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Unnao Case : उन्‍नाव रेप पीड़िता की मां का सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पहला रिएक्‍शन, बोलीं- हम फैसले से खुश,दोषी को मिले मौत की सजा

By संतोष सिंह 
Updated Date

नई दिल्ली: उन्‍नाव रेप कांड (Unnao Rape Case) में ट्रायल कोर्ट से दोषी करार पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर (Former BJP MLA Kuldeep Singh Sengar) को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से तगड़ झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने दिल्‍ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें सेंगर की सजा को कम कर दिया गया था। CJI जस्टिस सूर्यकांत की अध्‍यक्षता वाली वेकेशन बेंच ने सुनवाई के दौरान सख्‍त टिप्‍पणियां भी की हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद उन्‍नाव रेप कांड की पीड़िता का पहला रिएक्‍शन सामने आया है। उन्‍होंने देश की सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के फैसले पर खुशी जताई और कहा कि वे कुलदीप सेंगर के लिए फांसी की सजा की मांग करते हैं। इस हाईप्रोफाइल मामले में CBI की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए थे। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है।

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सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने उन्नाव रेप मामले (Unnao Rape Case)  में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को बड़ी राहत देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) के आदेश पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Cour)  ने 23 दिसंबर 2025 के हाईकोर्ट आदेश के अमल पर स्टे लगाते हुए साफ किया कि सेंगर को फिलहाल जेल से रिहा नहीं किया जाएगा। प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सीबीआई (CBI) की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता और दोषी की ओर से वरिष्ठ वकीलों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि इस मामले में कानून से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं, जिन पर विचार आवश्यक है। अदालत ने नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

उन्‍नाव पीड़िता की मां ने कहा कि हम सुप्रीम कोर्ट (Supreme Cour)   के फैसले से खुश हैं। हमारे वकीलों को सुरक्षा दी जाए. हाईकोर्ट के जजों ने गलत फैसला दिया था। कुलदीप सेंगर को फांसी की सजा दी जाए। राहुल गांधी और अन्य लोगों का धन्यवाद जिन्‍होंने साथ दिया।

SG तुषार मेहता की दलील

सुनवाई के दौरान SG तुषार मेहता ने अदालत से विवादित आदेश पर रोक लगाने का आग्रह करते हुए कहा कि हम उस बच्‍ची के प्रति जवाबदेह हैं।’ उन्होंने लोक सेवक (पब्लिक सर्वेंट) की परिभाषा और उसके इस्‍तेमाल पर दलीलें रखीं और अंतुले (Antulay) मामले का हवाला दिया। SG तुषार मेहता ने कहा कि यदि तर्क के लिए मान भी लिया जाए कि संबंधित व्यक्ति लोक सेवक नहीं है, तब भी वह पॉक्सो कानून की धारा 5(3) के दायरे में आएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी अपराध या दंड को पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता। इस पर CJI जस्टिस सूर्यकांत ने सवाल किया कि क्या लोक सेवक की परिभाषा को केवल सख्त कानूनी अर्थों में देखा जाना चाहिए या समाज में प्रभुत्वशाली स्थिति रखने वाले व्यक्ति को भी इसमें शामिल माना जा सकता है। CJI ने कहा कि मामले के संदर्भ और परिस्थितियों की प्रासंगिकता महत्वपूर्ण है।

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यह मामला अलग: सुप्रीम कोर्ट

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सामान्य तौर पर किसी व्यक्ति को रिहा किए जाने के बाद ऐसे आदेशों पर बिना सुने रोक नहीं लगाई जाती, लेकिन इस मामले में परिस्थितियां अलग हैं, क्योंकि दोषी एक अन्य अपराध में भी सजा काट रहा है। इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट के 23 दिसंबर 2025 के आदेश पर रोक लगाई जाती है और दोषी की रिहाई नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Cour)   ने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़िता को अलग से विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल करने का वैधानिक अधिकार है और इसके लिए उसे अदालत से अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। यदि पीड़िता को मुफ्त कानूनी सहायता की आवश्यकता होगी तो सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विस कमेटी उसे सहायता प्रदान करेगी।

क्‍या बोले CJI जस्टिस सूर्यकांत?

सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत (CJI Justice Suryakant) ने सुनवाई के दौरान कुछ अहम टिप्पणियां की हैं। उन्‍होंने कहा कि यदि हाईकोर्ट की व्याख्या के अनुसार पटवारी या कांस्टेबल को पॉक्सो कानून के तहत लोक सेवक माना जाए, लेकिन विधायक या सांसद को नहीं, तो इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता होगी। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग इस मामले से राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि दोषसिद्धि न्यायपालिका ने ही की है। CJI ने सभी पक्षों को संदेश देते हुए कहा,कि अपनी दलीलें अदालत के अंदर रखें, बाहर नहीं। हम हाथी दांत के टावरों में नहीं बैठे हैं और न्यायिक व्यवस्था को डराने-धमकाने की कोशिश न करें। इस बीच, वरिष्ठ अधिवक्ता महमूद प्राचा ने कहा कि पीड़िता और उसके परिवार पर हुए अत्याचारों को सुनकर कोई भी उनके पक्ष में खड़ा होगा, लेकिन अभी इस मामले को जीत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कानूनी लड़ाई का बड़ा हिस्सा अभी बाकी है।

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