नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय (Uttar Pradesh Congress President Ajay Rai) ने सोमवार को ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (Shankaracharya of Jyotirpeeth, Swami Avimukteshwarananda Saraswati) के पक्ष खुला पत्र लिखते हुए कहा कि सत्ता के हंटर से संतों की आवाज़ दबाने की कोशिश बंद करें। उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) को पत्र लिखकर ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के विरुद्ध दर्ज ‘पॉक्सो प्रकरण’ की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की है।
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उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई तब हुई जब स्वामी जी ने कुंभ मेले की अव्यवस्थाओं पर प्रदेश सरकार को घेरा था, जो सीधे तौर पर ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ की बू देता है। कांग्रेस का स्पष्ट मानना है कि अनुच्छेद 25-26 के तहत मिली धार्मिक स्वायत्तता और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का सम्मान होना चाहिए। किसी भी आध्यात्मिक पद की गरिमा को सियासी रंजिश का हथियार बनाना लोकतंत्र और संविधान, दोनों के खिलाफ है। हम मांग करते हैं कि किसी स्वतंत्र या केंद्रीय एजेंसी से इसकी जांच कराई जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
सत्ता के हंटर से संतों की आवाज़ दबाने की कोशिश बंद करें!
उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष श्री @kashikirai जी ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के विरुद्ध दर्ज 'पॉक्सो प्रकरण' की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की है।
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— UP Congress (@INCUttarPradesh) February 23, 2026
अजय राय ने लिखा कि विगत दिनों विभिन्न समाचार माध्यमों में प्रकाशित सूचनाओं से आप अवश्य अवगत होंगे कि ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती के विरुद्ध पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज की गई है। यह भी बताया गया है कि उक्त प्राथमिकी न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में दर्ज की गई। न्यायालय के आदेशों का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक एवं शासन का कर्तव्य है तथापि इस प्रकरण के समय परिस्थितियों एवं व्यापक परिप्रेक्ष्य ने समाज में गंभीर प्रश्न और आशंकाएं उत्पन्न कर दी है।
उन्होंने लिखा कि आप भली भांति अवगत होंगे कि स्वामी जी ने पूर्व में महाकुंभ मेले में हुई भगदड़ के संदर्भ में राज्य सरकार की प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सार्वजनिक रूप से प्रश्न उठाए थे। तत्पश्चात उन्हें माघ मेले में स्नान से रोके जाने तथा उनके साथ आए बटुकों के साथ कथित दुर्व्यवहार की घटनाएं भी प्रकाश में आई, जिनकी व्यापक आलोचना हुई। ऐसे परिप्रेक्ष्य में वर्तमान आपराधिक कार्यवाही का समय स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक विमर्श का विषय बन गया है।
यह भी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि प्राथमिकी दर्ज कराने वाले व्यक्तियों की पृष्ठभूमि, उनकी परिस्थितियां तथा संभावित प्रेरक तत्वों का निष्पक्ष परीक्षण हो। यदि यह प्रकरण पूर्णतः विधिसम्मत एवं स्वतंत्र आपराधिक प्रक्रिया का परिणाम है, तो पारदर्शी जांच से सत्य स्वतः स्थापित होगा, किंतु यदि इसके पीछे किसी प्रकार की राजनीतिक प्रेरणा, दबाव अथवा दुर्भावना की आशंका है, तो उसका समय रहते निराकरण भी उतना ही आवश्यक है। ऐसी स्थिति में यदि आवश्यक हो तो किसी स्वतंत्र या केंद्रीय एजेंसी द्वारा पर्यवक्षित जांच ही जनविश्वास को सुदृढ़ कर सकती है।
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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 एवं 26 धार्मिक स्वतंत्रता तथा धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं। शंकराचार्य का पद सनातन परंपरा में सर्वोच्च आध्यात्मिक पदों में से एक है, जिसकी मान्यता एवं परंपरा ऐतिहासिक धार्मिक परिपाटियों द्वारा निर्धारित होती है। इस संदर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णय मार्गदर्शक है. जिसमें न्यायालय ने प्रतिपादित किया कि यदि प्रथम दृष्टया आपराधिक कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण या प्रतिशोधात्मक प्रतीत हो, तो न्यायिक हस्तक्षेप उचित है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कानून का उपयोग दमन या प्रतिशोध के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।
स्पष्ट है कि असहमति या आलोचना को दंडात्मक शक्ति से दबाया नहीं जा सकता। उपरोक्त संवैधानिक सिद्धांतों के आलोक में यह अत्यंत आवश्यक है कि आपराधिक प्रक्रिया निष्पक्ष, स्वतंत्र एवं राजनीतिक प्रभाव से पूर्णतः मुक्त हो धार्मिक पद की गरिमा अथवा उसकी वैधता को आपराधिक विवादों के साथ मिश्रित न किया जाए तथा राज्यसत्ता का प्रयोग किसी आध्यात्मिक नेतृत्व को प्रभावित करने या उसकी प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाने के औजार के रूप में न हो।
प्रधानमंत्री जी यदि किसी शीर्ष धर्माचार्य के विरुद्ध उत्पन्न परिस्थितियों से यह धारणा बनती है कि शासन और आध्यात्मिक परंपरा के मध्य अनावश्यक टकराव की स्थिति है, तो इससे व्यापक धार्मिक समाज में असंतोष एवं पीड़ा की भावना उत्पन्न हो सकती है। ऐसी किसी भी आशंका का समय रहते निराकरण लोकतांत्रिक संतुलन एवं सामाजिक सौहार्द की दृष्टि से आवश्यक है।
भारतीय समाज में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा की जा रही कार्यवाहियां अनावश्यक कठोरता या प्रतिशोधात्मक भावना से प्रेरित है। यदि ऐसा है, तो इससे न केवल राज्य की छवि धूमिल होती है. बल्कि केंद्र सरकार की शासकीय क्षमता पर भी प्रश्नचिह्न लग सकता है। ऐसी किसी भी धारणा का समय रहते निराकरण अत्यंत आवश्यक है। यह विषय केवल एक व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि आस्था, संवैधानिक अधिकारों और शासन की निष्पक्षता से जुड़ा हुआ है। देश की जनता यह विश्वास चाहती है कि भारत में कानून का शासन सर्वोपरि है और किसी भी प्रकार के दुरुपयोग को संरक्षण प्राप्त नहीं होगा।