नई दिल्ली। भारत सरकार ने सोमवार (16 जून 2025) को ऐतिहासिक कदम उठाते हुए वर्ष 2027 में होने वाली 16वीं जनगणना के लिए राजपत्र अधिसूचना (Gazette Notification) जारी कर दी है। यह जनगणना न केवल पूरी तरह डिजिटल होगी, बल्कि आजाद भारत के इतिहास में पहली बार जाति आधारित जनगणना होगी।
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भारत की कुल आबादी कितनी है? इसमें कितने हिन्दू, कितने मुसलमान और दूसरे धर्मों के लोग कितने हैं? किन जातियों की क्या स्थिति है? इस सभी सवालों का जवाब अब जल्द ही मिलने वाला है। इस बार की जनगणना कई मायनों में खास रहने वाली है, क्योंकि इसमें नागरिकों को एक नया और बेहद अहम विकल्प मिलने जा रहा है। यह ऑपशन है सेल्फ एनुमरेशन का… यानी लोग अब खुद ही अपनी और अपने परिवार की जानकारी देख और अपडेट कर सकेंगे।
बताते चलें कि आजाद भारत में पहली बार जाति आधारित जनगणना की घोषणा 30 अप्रैल 2025 को केंद्र सरकार ने की थी, जिसे राजनीतिक मामलों की कैबिनेट कमेटी (CCPA) ने मंजूरी दी। यह जनगणना 1 मार्च 2027 से शुरू होने वाली है, जिसमें चार राज्यों से शुरुआत होगी और पहाड़ी राज्यों में 1 अक्टूबर 2026 से प्रक्रिया आरंभ होगी।
बता दें कि ब्रिटिश शासन के दौरान 1872 से 1931 तक नियमित रूप से जाति आधारित जनगणना होती थी, जिसमें 1931 की जनगणना में 4,147 जातियां दर्ज की गई थीं। आजादी के बाद, 1951 से जनगणना में केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आंकड़े शामिल किए गए, अन्य जातियों की गणना नहीं की गई। 2011 में सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) कराई गई, लेकिन इसके आंकड़े पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हुए।
जाति आधारित जनगणना को जहां समर्थक दल बता रहे हैं कि यह कदम सामाजिक न्याय, संसाधन वितरण, और लक्षित नीतियों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा। तो वहीं कुछ आलोचकों का कहना है कि इससे सामाजिक विभाजन बढ़ सकता है।
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16 वर्ष बाद सामने आएगा डेटा
पिछली जनगणना 2011 में हुई थी, लेकिन 2021 में कोविड के चलते जनगणना नहीं हो पाई। अब 16 वर्षों बाद देश की जनसंख्या, घरों, जातियों और सामाजिक स्थिति का नया डेटा सामने आएगा। जातिगत जनगणना-2027 का उद्देश्य नीति निर्माण को अधिक समावेशी और लक्षित बनाना है। जाति आधारित जनगणना का उद्देश्य निम्नलिखित हैं।
सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना: जाति आधारित आंकड़े सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों की स्थिति को समझने में मदद करेंगे, जिससे उनकी बेहतरी के लिए लक्षित नीतियां बनाई जा सकें।
संसाधन वितरण: सरकारी योजनाओं, आरक्षण, और अन्य लाभों का उचित वितरण सुनिश्चित करने के लिए सटीक आंकड़े उपलब्ध होंगे।
नीति निर्माण: शिक्षा, रोजगार, और सामाजिक कल्याण योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने के लिए जातिगत डेटा नीति निर्माताओं को आधार प्रदान करेगा।
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पिछड़े वर्गों की पहचान: अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अन्य समुदायों की जनसंख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सटीक आकलन करना।
ऐतिहासिक असमानताओं का समाधान: जातिगत भेदभाव और असमानताओं को कम करने के लिए डेटा आधारित समाधान तैयार करना।
यह जनगणना सामाजिक समावेशन और समानता को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, हालांकि इसके कार्यान्वयन और प्रभाव को लेकर बहस भी जारी है।