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बंगाल की दिवाली है बेहद खास! मशालों के बीच होता है ‘बामा काली नृत्य’, जानें क्या है ये परंपरा

By Sushil Sah 
Updated Date

कोलकाता। जहां पूरे देश में दीपों, रंगोली और आतिशबाजी के साथ दिवाली का त्योहार मनाया जाता है, वहीं पश्चिम बंगाल में इस त्योहार का एक अलग और बेहद अनोखा रूप देखने को मिलता है। यहां दिवाली की रात में मां काली की पूजा का एक विशेष महत्व है। इसी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा एक पारंपरिक नृत्य ‘बामा काली नृत्य’ भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

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इस दौरान कई स्थानों पर कलाकार पारंपरिक वेशभूषा में मां काली के उग्र स्वरूप को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। हाथों में जलती हुई मशालों और आसपास मौजूद ढाक-ढोल की आवाज के बीच होने वाला यह प्रदर्शन बेहद प्रभावशाली नजर आता है। इसके साथ ही अंधेरी रात में मशालों की रोशनी, तेज संगीत और कलाकारों की ऊर्जावान गतिविधियां इस नृत्य को रहस्यमयी और रोमांचक माहौल प्रदान करती हैं।

क्या है बामा काली नृत्य?

‘बामा काली’ को मां काली के एक स्वरूप से जोड़कर देखा जाता है। इस तरह के लोक और धार्मिक प्रदर्शनों में कलाकार देवी के उग्र रूप, शक्ति और बुराई पर अच्छाई की जीत को नृत्य के माध्यम से दर्शाते हैं। कई जगहों पर यह प्रस्तुति स्थानीय परंपराओं और पूजा-पद्धतियों के मुताबिक भिन्न रूप में दिखाई देती है।

मशालों की रोशनी में क्यों होता है प्रदर्शन?

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इस तरह के पारंपरिक प्रदर्शन का एक खास आकर्षण मशालें हैं। रात के अंधेरे में जलती मशालों के बीच नृत्य करने वाले कलाकारों की गतिविधियां बेहद नाटकीय दिखाई देती हैं। साथ ही ऐसे आयोजनों में आग और मशालों के इस्तेमाल के कारण सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना जरूरी होता है।

बंगाल की काली पूजा की खास पहचान

आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल में दिवाली की रात काली पूजा प्रमुख धार्मिक आयोजनों में शामिल है। मंदिरों और पूजा पंडालों में मां काली की प्रतिमाओं की स्थापना की जाती है और रातभर पूजा-अर्चना, सांस्कृतिक कार्यक्रम और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। ‘बामा काली नृत्य’ जैसी स्थानीय परंपराएं इस त्योहार को बंगाल की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का रूप देती हैं।

बंगाल में इसी कारण दिवाली की रात रोशनी के साथ-साथ शक्ति, भक्ति और लोक संस्कृति का अनोखा संगम देखने को मिलता है।

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