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शादी मत करना…सुसाइड नोट लिखकर बीजेपी के पूर्व विधायक के बेटे खाया जहर,बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान पर उठाया सवाल

By संतोष सिंह 
Updated Date

Marital Harassment Cases: मध्य प्रदेश के  सोनकच्छ के पूर्व भाजपा विधायक सुरेंद्र वर्मा के बेटे प्रमोद ने पत्नी द्वारा प्रताड़ित होने का आरोप लगाकर जहर खाकर सुसाइड की कोशिश की। उसे इंदौर रेफर किया गया। चार पेज के सुसाइड नोट (Suicide Note) में पत्नी, सास, व सालों पर प्रताड़ित करने का आरोप है। प्रमोद ने लिखा कि शादी मत करना, इससे जीवन में मानसिक कष्ट आता है।

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घटना शुक्रवार रात की है जब प्रमोद वर्मा ने कीटनाशक खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की। पहले उन्हें देवास के एक निजी अस्पताल में भर्ती किया गया और बाद में गंभीर हालत में इंदौर रेफर किया गया। 15 साल पहले हुए विवाह के बाद से ही दोनों के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई थी।

4 पेज के सुसाइड नोट में मानसिक प्रताड़ना का जिक्र

प्रमोद के सुसाइड नोट (Suicide Note) में रिश्तों की कड़वाहट और मानसिक तनाव की झलक साफ नजर आती है। उन्होंने लिखा कि मैं अपना जीवन समाप्त कर रहा हूं। मेरी मौत की जिम्मेदार मेरी पत्नी, सास और साले हैं, जिन्होंने मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ पर सवाल

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सुसाइड नोट में उन्होंने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान (Beti Bachao, Beti Padhao Campaign) पर भी सवाल उठाए हैं, जो यह दर्शाता है कि वे अपने पक्ष को समाज के समक्ष रखना चाहते थे। यह टिप्पणी उनकी पीड़ा और एकपक्षीय सामाजिक नजरिए की ओर इशारा करती है, जहां पुरुषों की पीड़ा अक्सर अनसुनी रह जाती है।

प्रमोद के पिता, पूर्व विधायक सुरेंद्र वर्मा, ने बेटे और बहू के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद की पुष्टि की है। उन्होंने झगड़ों को सुलझाने के लिए एक नया मकान तक खरीदकर दिया था, लेकिन रिश्तों की उलझनें खत्म नहीं हो सकीं। शुक्रवार रात को भी पति-पत्नी में विवाद हुआ और इसी के बाद प्रमोद ने यह आत्मघाती कदम उठाया। सुसाइड नोट में उन्होंने अपने माता-पिता से माफी मांगते हुए लिखा कि ‘मुझे माफ कर देना। मैं एक अच्छा बेटा, भाई और पिता नहीं बन पाया। शादी जरूरी नहीं है, कभी मत करना।’

 अनगिनत पुरुष वैवाहिक समस्याओं के कारण मानसिक अवसाद में चले जाते हैं, लेकिन उनकी आवाज शायद ही कहीं सुनी जाती है

यह घटना केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं है। बल्कि समाज में बढ़ते वैवाहिक तनावों, कानूनी प्रावधानों के दुरुपयोग और मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी का भी परिणाम है। प्रमोद की पीड़ा उन अनगिनत पुरुषों की स्थिति को उजागर करती है, जो वैवाहिक समस्याओं के कारण मानसिक अवसाद में चले जाते हैं, लेकिन उनकी आवाज शायद ही कहीं सुनी जाती है।

क्या कहता है कानून?
भारत में घरेलू हिंसा और महिला सुरक्षा को लेकर कई कड़े कानून हैं, लेकिन कहीं-कहीं इनका दुरुपयोग भी होता है। कई पुरुष ऐसे मामलों में न्याय की उम्मीद में भटकते रहते हैं। यह घटना पुनर्विचार करने का मौका देती है कि क्या हमें पारिवारिक विवादों को सुलझाने के लिए अधिक समावेशी और निष्पक्ष तरीकों की आवश्यकता है?

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क्या समाज इस घटना से कुछ सीखेगा? या फिर यह भी सिर्फ एक और खबर बनकर रह जाएगी?

प्रमोद वर्मा इस समय जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन क्या समाज इस घटना से कुछ सीखेगा? क्या वैवाहिक जीवन में संतुलन और परस्पर सम्मान को लेकर कोई सार्थक संवाद होगा? या फिर यह भी सिर्फ एक और खबर बनकर रह जाएगी?

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