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क्या PDA के साथ ब्राह्मणों को भी साध रहे अखिलेश यादव? 2027 की तैयारी में सपा का नया सियासी दांव

By santosh singh 
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी रणनीतियां बनानी शुरू कर दी हैं। समाजवादी पार्टी भी अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। इसी कड़ी में लखनऊ में आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन को सपा की बड़ी चुनावी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी अब PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण के साथ ब्राह्मण समाज को भी जोड़ने की कोशिश कर रही है।

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यह सम्मेलन समाजवादी आंदोलन के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जनेश्वर मिश्र की जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया। जनेश्वर मिश्र की ब्राह्मण समाज में भी मजबूत पहचान रही है। ऐसे में माना जा रहा है कि सपा उनके राजनीतिक और सामाजिक योगदान के जरिए यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है और सभी समुदायों को साथ लेकर चलना चाहती है।

2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला सपा के लिए काफी प्रभावी रहा था। पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 37 सीटों पर जीत दर्ज की थी। हालांकि विधानसभा चुनाव का गणित अलग होता है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा को करीब 32 प्रतिशत वोट मिले थे और पार्टी 111 सीटों पर जीत हासिल कर सकी थी, जबकि बीजेपी ने लगभग 41 प्रतिशत वोट के साथ 255 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी।

इसी वजह से सपा के सामने केवल अपने मौजूदा वोट बैंक को बचाए रखने की नहीं, बल्कि नए सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाने की भी चुनौती है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका कई क्षेत्रों में अहम मानी जाती है। खासकर पूर्वांचल और अवध की कई विधानसभा सीटों पर उनका प्रभाव चुनावी समीकरण बदल सकता है।

हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सिर्फ सम्मेलन या सामाजिक संपर्क अभियान से चुनावी नतीजे तय नहीं होते। उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय मुद्दे, संगठन की मजबूती और जनता के बीच पार्टी की स्वीकार्यता भी अहम भूमिका निभाती है।

फिलहाल, सपा के इस कदम ने साफ कर दिया है कि 2027 की लड़ाई में पार्टी अपने सामाजिक गठजोड़ का दायरा बढ़ाने की तैयारी कर रही है। अब देखना होगा कि ब्राह्मणों तक पहुंच बनाने की यह कोशिश सपा को कितना राजनीतिक फायदा दिलाती है और बीजेपी अपने पारंपरिक समर्थन को किस तरह मजबूत बनाए रखती है।

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रिपोर्ट: कल्पना पांडेय

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