नई दिल्ली। देश की निचली अदालतों में न्यायिक अधिकारियों की भारी कमी देखने को मिली है। भारत सरकार की ओर से संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, जिला और अधीनस्थ अदालतों में 30,868 स्वीकृत पदों में से 7,310 पद खाली हैं। करीब 23.7 फीसदी न्यायिक पद खाली हैं।
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कर्नाटक में सबसे ज्यादा 1,640 पद खाली
इस मामले में राज्यवार आंकड़ों में कर्नाटक सबसे ऊपर है। यहां जिला और अधीनस्थ अदालतों में 1,640 न्यायिक पद रिक्त हैं। इसके बाद उत्तर प्रदेश में 1,082 और महाराष्ट्र में 897 पद खाली बताए गए हैं। इसके अलावा कर्नाटक में स्वीकृत पदों की तुलना में रिक्तियों की दर भी 50 फीसदी से ज्यादा बताई गई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में जिला अदालतों के न्यायिक पदों में 58 फीसदी से अधिक रिक्ति दर है।
देशभर में क्या है स्थिति?
केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 17 जुलाई 2026 तक जिला और अधीनस्थ अदालतों में 30,868 पद स्वीकृत थे, लेकिन इनमें से सिर्फ 23,558 न्यायिक अधिकारी कार्यरत थे। इस तरह 7,310 पद खाली रह गए। यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है जब देश की अदालतों में लंबित मुकदमों का बोझ पहले से ही बड़ा है। निचली अदालतें आम नागरिकों के अधिकांश मुकदमों के लिए न्यायिक व्यवस्था का पहला प्रमुख स्तर हैं। ऐसे में न्यायिक अधिकारियों की कमी का असर मामलों की सुनवाई की क्षमता और लंबित मामलों को निपटाने की गति पर पड़ सकता है।
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पहले भी सामने आई थी बड़ी रिक्तियों की संख्या
मार्च 2026 में राज्यसभा में दिए गए एक जवाब में केंद्र सरकार ने बताया था कि 13 मार्च 2026 तक जिला और अधीनस्थ अदालतों में 4,887 न्यायिक पद खाली थे। बाद के जुलाई के आंकड़ों में यह संख्या बढ़कर 7,310 हो गई। अलग-अलग तारीखों के आंकड़े होने के कारण दोनों संख्याओं की सीधी तुलना सावधानी से की जानी चाहिए।
न्यायिक नियुक्तियां लगातार चलने वाली प्रक्रिया
केंद्र सरकार के मुताबिक, न्यायिक पदों को भरना लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों में न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों की भूमिका होती है। वहीं निचली अदालतों में नियुक्तियों की प्रक्रिया संबंधित राज्यों और उच्च न्यायालय की व्यवस्था के तहत होती है। सरकार ने अदालतों में लंबित मामलों को कम करने के लिए ई-कोर्ट, वर्चुअल सुनवाई, फास्ट-ट्रैक कोर्ट और वैकल्पिक विवाद समाधान जैसे उपायों का भी उल्लेख किया है।
बड़ी चुनौती—खाली पद और लंबित मुकदमे
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निचली अदालतों में हजारों पदों का खाली होना न्याय व्यवस्था के सामने बड़ी प्रशासनिक चुनौती को दिखाता है। हालांकि केवल न्यायिक पदों की रिक्ति को ही लंबित मामलों का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। इसके अलावा मामलों की संख्या, प्रक्रिया की लंबाई, बुनियादी ढांचा और अन्य प्रशासनिक कारण भी न्यायिक लंबित मामलों को प्रभावित करते हैं।
फिलहाल, उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश की जिला और अधीनस्थ अदालतों में 7,310 न्यायिक पद रिक्त हैं। इनमें सबसे ज्यादा रिक्तियां कर्नाटक में हैं।