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पैरेंट्स सावधान : मोबाइल फोन की मानसिक गुलामी छीन रही मासूमों की जिंदगी, लापरवाह अभिभावक भी जिम्मेदार

By Abhimanyu 
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Smartphone Addiction : किसी भी मां-बाप के लिए अपनी संतान से बढ़कर कुछ नहीं होता और वह अपने बच्चों को हर वो खुशी देना चाहते हैं, जो उनके लिए संभव है। लेकिन, बच्चों की ख़्वाहिशों को पूरा करते-करते कई बार अभिभावक सबसे जरूरी चीज भूल जाते हैं- अपने बच्चों को सही रास्तों चलने के लिए प्रेरित करना और सही गलत में फर्क सिखाना। यहां सही गलत से मतलब है- बच्चों को उन सभी आदतों से बचाना जो आगे चलकर उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ पर बुरा असर डालती हो। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है- मोबाइल फोन।

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दरअसल, वर्तमान समय में अभिभावक बच्चों के साथ दोस्त बनकर रहने की कोशिशों में उन बातों को नजर अंदाज कर रहे हैं, जो उनके बच्चे के लिए ही एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। आमतौर पर बच्चा जब मां-बाप से मोबाइल फोन की डिमांड करता है तो उसकी जरूरतों को समझे बिना ही फोन दिला दिया जाता है। लेकिन, बच्चों को मोबाइल की लत डालने की शुरुआत तो तब से शुरू हो जाती है जब छोटा बच्चा अभी बोलना और चलना सीख रहा होता है। घर पर मांएं बच्चे को फोन और टीवी के सामने बैठा देती हैं और घर के बाकी कामों को निपटाने लगती हैं। जिसके बाद बच्चा जब धीरे-धीरे बड़ा होता है तो उसे बाहर जाकर खेलने की जगह फोन में गेम्स खेलना और टीवी देखना सबसे बढ़िया चीज लगने लगती हैं, क्योंकि तब तक मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया ही उसे असली लगने लगती हैं।

इसके बाद बच्चा वयस्क होने से पहले ही अपने पर्सनल मोबाइल फोन की जिद करने लगता है। यहीं से खतरे की घंटी बजनी शुरु हो जाती है। लेकिन, इसमें बच्चे की कोई गलती नहीं क्योंकि इस उम्र तक आते-आते वे स्मार्टफोन और टीवी पर पूरी तरह निर्भर हो चुके होते हैं। हालांकि, अभिभावकों को लगता है कि बच्चे को स्मार्टफोन दिलाने से क्या ही नुकसान हो जाएगा। लेकिन, वह मोबाइल दिलाने के बाद अपने कामों में इस तरह व्यस्त हो जाते हैं कि एक बार भी ये जानने की कोशिश नहीं करते हैं कि बच्चा पूरे दिन अपने मोबाइल फोन में क्या करता है? कहीं वो डिप्रेशन का शिकार तो नहीं हो रहा? जिसका नतीजा यह होता है कि बच्चे वास्तविक दुनिया से खुद अलग करके एक अलग ही दुनिया में जीना शुरू कर देते हैं। गाजियाबाद की घटना इसका ताजा उदाहरण है, जहां तीन लड़कियों ने एक साथ नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। पीड़ित परिवार ने इस घटना के लिए एक कोरियन गेम की लत को वजह बता रहा है। फिर भी ये बात बड़ी चौंकाने वाली बात है कि माता-पिता को बच्चों की गतिविधियों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

जांच में सामने आया है कि तीनों नाबालिग बहनों की मौत सिर्फ ऑनलाइन गेम के कारण नहीं हुई है, बल्कि यह घटना मोबाइल बंद किए जाने, डिजिटल दुनिया से कटने और कोरियन कल्चर की गहरी लत से पैदा हुए मानसिक दबाव का नतीजा हो सकती है। पुलिस सूत्रों की मानें तो अब तक की जांच में किसी भी तरह के कोरियन लव गेम या ऑनलाइन सुसाइड चैलेंज के कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं। न तो मोबाइल की फॉरेंसिक जांच में और न ही डायरी के पन्नों में किसी ऐसे गेम या टास्क के बारे में जिक्र है, जो सीधे तौर पर आत्महत्या के लिए उकसाते हो।

घटनास्थल से पुलिस को 8 पन्नों की एक डायरी बरामद हुई है। जिसमें साफ लिखा है कि तीनों बच्चियां कोरियन कल्चर से बेहद प्रभावित थीं और उससे अलग रहना उनके लिए असहनीय हो गया था। डायरी में कोरियन कल्चर, K-POP, कोरियन म्यूजिक, कोरियन मूवीज, कोरियन शॉर्ट फिल्म्स, कोरियन शोज और कोरियन सीरीज का बार-बार जिक्र है। एक जगह अंग्रेजी में लिखा गया- WE LOVE KOREAN CULTURE…। ये चीजें एक या दो दिन में बच्चों की लत में शामिल नहीं हो सकती हैं। स्पष्ट है कि अभिभावकों ने अपने बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन, गाजियाबाद की घटना पहली नहीं है।

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बीते कई सालों में ब्लू वेल, पबजी, मोमो चैलेंज समेत कई ऑनलाइन गेम्स ने कई हंसते-खेलते परिवार उजाड़े हैं। लेकिन, पीड़ितों ने हर बार यही कहा कि उन्हें अपने बच्चे की इन आदतों के बारे में जानकारी नहीं थी। सच्चाई तो ये है कि शायद इन परिवारों ने कभी अपने बच्चों के दिनचर्या के बारे जानने की कोशिश ही नहीं की और न ही ये जानना चाहा कि उनका बच्चा मोबाइल फोन का कैसे इस्तेमाल कर रहा है।

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