लखनऊ। रक्षाबंधन का पावन पर्व भाई-बहन के प्रेम, स्नेह और विश्वास का प्रतीक है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और खुशहाल जीवन की कामना करते हुए उनकी कलाई पर राखी बांधती हैं। वहीं, भाई अपनी बहनों की रक्षा और हर सुख-दुख में उनका साथ देने का संकल्प लेते हैं। राखी का यह धागा केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि भाई-बहन के बीच मजबूत रिश्ते और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है।
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आज हम इस अवसर पर यूपी के बागपत जिले में भाई-बहन के मजबूत रिश्ते और त्याग की चर्चा करने जा रहे हैं। जब बहन भाई की जान बचाने के लिए खुद आगे आकर अपनी किडनी दान करने का फैसला किया। दोघट की सुशीला ने भाई मुकेश शर्मा (Brother Mukesh Sharma) की जिंदगी बचाने के लिए अपनी एक किडनी दे दी। आठ साल पहले सिरदर्द और ब्लड प्रेशर बढ़ने की समस्या के बाद मुकेश की दोनों किडनियां खराब (Both kidneys had failed) हो गई थीं। करीब एक साल तक डायलिसिस के बाद जब किडनी ट्रांसप्लांट (Kidney Transplant) की जरूरत पड़ी तो पत्नी की किडनी उपयुक्त नहीं मिली, ऐसे में बहन ने आगे बढ़कर भाई के लिए किडनी दी।
दोघट निवासी मुकेश शर्मा सरधना ब्लॉक के एक पूर्व माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक हैं। उनकी शादी वर्ष 2004 में मोनिका से हुई थी। उनके दो बच्चे पार्थ और दिव्यांशु हैं। उनको वर्ष 2011 से लगातार सिरदर्द और ब्लड प्रेशर बढ़ने की शिकायत रहने लगी। निजी चिकित्सक से उपचार के बाद भी उनकी हालत बिगड़ती गई। धीरे-धीरे दोनों किडनियां खराब हो गईं। इसके बाद उन्हें नियमित डायलिसिस करानी पड़ी। बीमारी के गंभीर दौर में करीब एक साल तक उनकी डायलिसिस हुई। 40 से अधिक बार डायलिसिस होने के कारण उनकी शारीरिक स्थिति कमजोर होती गई।
चिकित्सकों ने किडनी ट्रांसप्लांट ही स्थायी उपचार बताया। परिवार ने पहले पत्नी मोनिका की किडनी ट्रांसप्लांट कराने के लिए जांच कराई लेकिन उनका ब्लड ग्रुप मिलान नहीं हुआ और वह मुकेश के लिए उपयुक्त नहीं पाई गई। भाई की बिगड़ती हालत देखकर बड़ी बहन सुशीला ने किडनी देने का निर्णय लिया। जरूरी चिकित्सकीय जांच में उनकी किडनी मुकेश के लिए उपयुक्त पाई गई। इसके बाद वर्ष 2018 में मुकेश की किडनी ट्रांसप्लांट की गई। बहन की किडनी मिलने के बाद उनकी जिंदगी फिर पटरी पर लौटने लगी और परिवार को भी बड़ी राहत मिली।
मुकेश शर्मा कहते हैं कि माता-पिता के बाद भाई-बहन का ऐसा रिश्ता है, जो मुश्किल समय में सबसे मजबूत रहता है। सुशीला ने मेरे लिए जो किया, उसका अहसान जीवनभर नहीं भूल सकता। वहीं सुशीला कहती हैं कि भाई जैसा संसार में कोई दूसरा रिश्ता नहीं है। माता-पिता के बाद दुख की घड़ी में भाई-बहन को एक-दूसरे का साथ देना चाहिए। भाई की जिंदगी बचाने का अवसर मिला तो इससे बड़ा सौभाग्य मेरे लिए कुछ नहीं हो सकता। परिवार के लिए रक्षाबंधन अब सिर्फ राखी बांधने का पर्व नहीं बल्कि उस रिश्ते के त्याग और समर्पण को याद करने का अवसर है, जिसने मुश्किल समय में भाई को जीवन की नई उम्मीद दी।