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गुरु रविदास (1377–1527 ई.) भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतों में से एक थे। उन्हें रैदास, रोहिदास और रुहिदास के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने अपने भजनों और शिक्षाओं के माध्यम से समानता, भक्ति और आत्मशुद्धि का संदेश दिया और जाति-भेद का विरोध किया। उनके कई पद सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं।
पूरी दुनिया को प्रेम और सौहार्द का पाठ पढ़ाने वाले सिद्ध संत गुरु रविदास जी ने अपना संपूर्ण जीवन समाज कल्याण कार्यों में समर्पित कर दिया था। उनका पूरा जीवन भक्ति और ज्ञान के लिए समर्पित रहा। संत मीराबाई भी रविदास जी को ही अपना गुरु मानती थीं। कबीर ने ‘संतन में रविदास’ कहकर इन्हें मान्यता दी है। मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे दिखावों में रविदास जी का बिल्कुल भी विश्वास न था। वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे। रैदास ने अपनी काव्य-रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है।
इतिहासकारों के अनुसार गुरु रविदास का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित मंडुआडीह में हुआ था। कुछ विद्वान उनका जन्म वर्ष 1377 ई. मानते हैं, जबकि कुछ 1399 ई. बताते हैं। हालांकि मान्यता है कि उनका जन्म माघ पूर्णिमा को हुआ, इसलिए हर साल इसी दिन रविदास जयंती मनाई जाती है।
यह दिन गुरु रविदास की शिक्षाओं (भक्ति, समानता, विनम्रता और सामाजिक सद्भाव) को याद करने के लिए समर्पित है। इस अवसर पर विशेष प्रार्थनाएं, कीर्तन और सत्संग आयोजित होते हैं। उनका जन्मस्थल श्री गुरु रविदास जन्म स्थान आज एक प्रमुख तीर्थ है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि सच्ची भक्ति सभी भेदभाव से ऊपर होती है।