लखनऊ। सावन के व्रत और सोमवार का हिंदू धर्म (Hinduism) में विशेष महत्व है। सावन (Sawan) का महीना भगवान शिव (Lord Shiva) को समर्पित हैं। पौराणिक तथ्य बतातें हैं,कि क्यों सावन सबसे खास है?
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पौराणिक मान्यंताओं के अनुसार भगवान शिव सावन के महीने में पृथ्वी पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए थे। वहां उनका स्वागत अर्ध्य और जलाभिषेक से किया गया था। सावन माह (Month of Sawan) आते ही प्रकृति मानों स्यंव उत्सव मनाने लगती है। वन-उपवन चारों तरफ हरियाली छा जाता है,जंगल के सभी प्राणी हरियाली उत्सव मनाने लगते हैं। वर्षा ऋतु के आने से और चारों तरफ हरियाली होती है। जिसे देखकर मन शांत और आनंदित रहता है।
सावन के महीने का संबंध भगवान शिव (Lord Shiva) और पार्वती के पुनर्मिलन से जुड़ा है। प्राचीन कथाओं के अनुसार माता सती ने अपने दुसरे जन्म मे पार्वती के रूप मे लिया था। उन्होंने सावन के महीने मे महादेव को पुन: अपने पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी इस काठोर साधना से प्रसन्न होकर माता पार्वती को अर्धागिनी के रूप मे स्वीकार किया। यही कारण है, कि सावन के महीना प्रेम,सर्मपन,मनोकामना पूर्ति का पवित्र माह है।
पौराणिक मान्ताओं के अनुसार इसी पावन मास मे समुद्र मथंन हुआ था। देव से देवो के देव महादेव बनने की सुरवात समुद्र मथंन से हुई थी। धार्मिक कथाओ और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार जब देवताओं और दैत्यों ने अमृत की कामना से क्षीर सागर का मंथन शुरू किया, तो मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकी को नेती (रस्सी) बनाया गया। इस मंथन के दौरान सबसे पहले अत्यंत भयंकर ‘हलाहल’ (कालकूट) विष प्रकट हुआ। इस विष की तीव्र ज्वाला और गर्मी से पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया।
यह पूरी घटना सावन मास के दौरान ही घटित हुई थी। जब ब्रह्मांड को बचाने का कोई और उपाय नहीं सूझा, तब भगवान शिव ने लोक-कल्याण के लिए उस भयंकर विष का पान कर लिया। माता पार्वती ने विष के प्रभाव को रोकने के लिए शिव जी के कंठ को स्पर्श कर उसे वहीं रोक दिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए।
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यही कारण है कि विष की तीव्र ऊष्मा (गर्मी) से महादेव के शरीर को शीतलता प्रदान करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन पर निरंतर जल अर्पित किया। इसी ऐतिहासिक घटना के बाद से सावन के महीने में महादेव के जलाभिषेक की अटूट परंपरा की शुरुआत हुई। समुद्र मंथन का व्यावहारिक और आध्यात्मिक संदेश धार्मिक विद्वानों और शिव पुराण के आध्यात्मिक दृष्टिकोण के अनुसार, समुद्र मंथन की यह कथा केवल एक पौराणिक घटना मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन और मन के भीतर चलने वाले द्वंद्व को भी दर्शाती है।
सावन और जलाभिषेक की परंपरा का रहस्य
यह पूरी घटना सावन मास (Month of Sawan) के दौरान घटित हुई थी। विष की तीव्र ज्वाला को शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर निरंतर जल की वर्षा की। प्रकृति ने भी सावन की रिमझिम फुहारों से महादेव को शीतलता प्रदान की। यही कारण है कि सावन के महीने में शिव जी को जल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। सावन में जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करने का मूल उद्देश्य महादेव के कंठ की उसी तपन को शांत करना है। गंगाजल की शीतलता से शिवजी को विष की जलन से राहत मिली। तभी से भगवान शिव (Lord Shiva) को प्रसन्न करने और उनके प्रति आभार प्रकट करने के लिए गंगाजल से जलाभिषेक करने और कांवड़ में जल लाकर अर्पित करने की परंपरा शुरू हो गई। कांवड़ यात्रा का मुख्य उद्देश्य भगवान शिव का आभार व्यक्त करना, उनकी कृपा प्राप्त करना और मनोकामना पूर्ति के लिए गंगाजल से जलाभिषेक करना है।
रिपोर्ट : दीपांजली मिश्रा