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धार्मिक परंपरा की आड़ में अपराध की छूट नहीं:’हलाला’ के नाम पर गैंगरेप के आरोपियों को हाईकोर्ट से झटका

By Harsh Gautam 
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प्रयागराज। उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के थाना सैदनगली में दर्ज एक बहुचर्चित मुकदमे को रद्द करने से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ इनकार कर दिया है। जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने मामले के मुख्य आरोपी तैयब समेत पांच आरोपियों की चारों याचिकाओं को खारिज करते हुए उनकी गिरफ्तारी पर लगी अंतरिम रोक भी हटा दी है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश के आपराधिक कानून में पर्सनल लॉ या किसी कथित धार्मिक परंपरा की आड़ लेकर गंभीर अपराधों से नहीं बचा जा सकता। यह पूरा मामला निकाह, तीन तलाक और फिर हलाला के नाम पर एक महिला के अंतहीन मानसिक और शारीरिक शोषण की दर्दनाक दास्तान है। इस उलझे हुए मामले को अदालत ने दो हिस्सों पहले और दूसरे हलाला की टाइमलाइन के जरिए समझा और सख्त टिप्पणियां कीं।

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पहले हलाला के वक्त नाबालिग थी पीड़िता

मामले की शुरुआत 25 अप्रैल 2015 को हुई, जब महज 15 साल की उम्र में पीड़िता का निकाह जबरन अजहर नवाज नाम के शख्स से करा दिया गया। शादी के बाद से ही उसके साथ मारपीट की जाने लगी और जनवरी 2016 में पति ने उसे तीन तलाक दे दिया। कुछ महीनों बाद पति दोबारा साथ रहने का प्रस्ताव लेकर आया, लेकिन इसके लिए शर्त रखी गई निकाह हलाला की।

साजिश के तहत नवंबर 2016 में बुलंदशहर के सियाना कस्बे में मौलाना कय्यूम के साथ महिला का पहला हलाला निकाह कराया गया, जहां उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पहले हलाला के समय पीड़िता की उम्र करीब 16 वर्ष थी। हाईकोर्ट ने इसे गंभीरता से लेते हुए कहा कि लड़की के नाबालिग होने के कारण यह मामला प्रथम दृष्टया पॉक्सो एक्ट के तहत एक गंभीर बाल अपराध है।

दूसरा हलाला बना सामूहिक बलात्कार

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पहले हलाला की प्रक्रिया के बाद अप्रैल 2017 में अजहर के साथ महिला का दोबारा निकाह हुआ और 2018 में उसने एक बेटी को जन्म दिया। हालांकि, पति का रवैया फिर बिगड़ गया और उसने जनवरी 2021 में दूसरी बार तीन तलाक दे दिया और इद्दत के दौरान ही दूसरी शादी कर ली।

बाद में बेटी की कस्टडी और खर्च के बहाने अजहर ने दोबारा महिला को अपने जाल में फंसाया। उसने झांसा दिया कि चूंकि दो बार तलाक हो चुका है, इसलिए दोबारा साथ रहने के लिए दो बार हलाला करना होगा। आरोप है कि इसी साजिश के तहत 19 फरवरी 2025 को दूसरे हलाला के नाम पर सह-अभियुक्त शाहनवाज चौधरी और हकीम निशात ने पीड़िता के साथ सामूहिक बलात्कार किया। उसी शाम महिला को गुमराह करने के लिए फर्जी निकाह का नाटक भी रचा गया। हाईकोर्ट ने इस पूरी दूसरी घटना को साफ तौर पर गैंगरेप का मामला माना है। जांच के बाद पुलिस ने केस में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो एक्ट की धाराएं लगाते हुए कुल नौ लोगों को नामजद किया है।

अदालत की तीखी टिप्पणी और आदेश

सुनवाई के दौरान आरोपियों के वकील ने दलील दी कि साल 2016 में ट्रिपल तलाक मान्य था और हलाला एक वैध इस्लामी परंपरा है, इसलिए यह एफआईआर केवल कस्टडी विवाद में दबाव बनाने के लिए दर्ज कराई गई है। इसके उलट सरकारी वकील और पीड़िता के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक इंडिपेंडेंट थॉट फैसले का हवाला देकर साबित किया कि नाबालिग के साथ किसी भी कानून के तहत बनाया गया शारीरिक संबंध बलात्कार ही है।

हाईकोर्ट ने मामले पर अंतिम मुहर लगाते हुए कहा कि कोर्ट यहां हलाला प्रथा की संवैधानिकता पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही, लेकिन जिस तरह की परिस्थितियों में महिला को प्रताड़ित किया गया, वह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (गरिमा से जीने का अधिकार) के बुनियादी मूल्यों के बिल्कुल खिलाफ है। आरोपियों की अग्रिम जमानत पहले ही खारिज हो चुकी है और पीड़िता को धमकी देने का एक और मामला दर्ज हुआ है, इसलिए इस संवेदनशील केस की गहराई से विस्तृत जांच होना बेहद जरूरी है।

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