नई दिल्ली। क्या आपके परिवार में कोई बुजुर्ग बार-बार कोई बात भूल जाते हैं? कभी चाबी रखकर भूल जाना, कभी परिचित रास्ते पर भटक जाना और कभी अपने ही काम करने में परेशानी होना। यदि ऐसा बार-बार हो रहा है, तो इसे सिर्फ बढ़ती उम्र का असर मत समझिए। भारत में 60 साल से ज्यादा उम्र के करीब 88 लाख लोगों के डिमेंशिया से प्रभावित होने का अनुमान है। आइए जानते है इस बिमारी और इससे जुड़ी संकेतों के बारे में।
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डिमेंशिया को लेकर भारत में प्रकाशित एक राष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक, 60 साल या उससे अधिक उम्र के लोगों में इसकी अनुमानित दर 7.4 प्रतिशत थी। इसका मतलब है कि करीब 88 लाख बुजुर्ग इस स्थिति से प्रभावित हो सकते थे। आपको बता दें कि यह आंकड़ा 2017 से 2020 के बीच जुटाए गए शोध डेटा पर आधारित अनुमान है। इसी अध्ययन के मुताबिक, यदि डिमेंशिया की दर इसी तरह समान रहती है, तो बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के कारण 2036 तक प्रभावित लोगों की संख्या करीब एक करोड़ 69 लाख तक पहुंच सकती है।
क्या है डिमेंशिया?
डिमेंशिया एक ऐसी स्थितियों का समूह है जो इंसान की याददाश्त, सोचने-समझने, बातचीत करने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता को प्रभावित करता है। डिमेंशिया का सबसे आम कारण अल्जाइमर रोग है। लेकिन याददाश्त कमजोर होने का हर मामला डिमेंशिया नहीं होता।
शुरुआती लक्षणों पर ध्यान दें
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हाल में हुई घटनाएं बार-बार भूलना या एक ही सवाल बार-बार पूछना।
परिचित जगह पर रास्ता भूल जाना या समय और जगह को लेकर भ्रम होना।
बातचीत के दौरान सही शब्द खोजने में परेशानी होना।
पैसों का हिसाब रखने, बिल भरने या रोज के परिचित काम करने में लगातार मुश्किल होना।
व्यवहार, मनोदशा या व्यक्तित्व में ऐसा बदलाव आना जो पहले नहीं था।
यदि ये बदलाव लगातार बढ़ रहे हैं और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित कर रहे हैं, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। आपको बता दें कि इस बिमारी का समय पर जांच से इसका कारण समझने, लक्षणों को संभालने और मरीज की देखभाल की बेहतर योजना बनाने में मदद मिल सकती है। कई बार विटामिन B12 की कमी, थायरॉइड की समस्या, डिप्रेशन या कुछ दवाओं के कारण भी याददाश्त प्रभावित हो सकती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित खानपान, सामाजिक रूप से सक्रिय रहना और ब्लड प्रेशर व डायबिटीज को नियंत्रित रखना डिमेंशिया के जोखिम को कम करने में काफी हद तक मदद कर सकता है।