लखनऊ। आज अगर किसी घर में कोई बीमार पड़ जाए, तो सबसे पहले किसे बुलाया जाता है डॉक्टर को ? लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत में पहली महिला डॉक्टर बनने का सपना किसने देखा होगा और उस दौर में, जब लड़कियों को स्कूल भेजना भी गुनाह माना जाता था। तब एक लड़की ने डॉक्टर बनने की हिम्मत कैसे की होगी? यह सिर्फ एक डॉक्टर की कहानी नहीं यह उस साहस की कहानी है जिसने भारत की लाखों बेटियों के लिए नए रास्ते खोल दिए।
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आज सुनिए भारत की पहली महिला डॉक्टर (India’s First Female Doctor) , आनंदीबाई जोशी (Anandibai Joshi) की प्रेरणादायक कहानी। साल था 1865। महाराष्ट्र के पुणे में एक साधारण लेकिन प्रतिष्ठित परिवार में एक बच्ची का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया यमुना। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही बच्ची एक दिन भारत के इतिहास में अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज करा देगी। लेकिन उस दौर का भारत आज जैसा नहीं था। लड़कियों की पढ़ाई लगभग न के बराबर थी। कम उम्र में शादी कर देना समाज की परंपरा थी। शादी के बाद लड़की का नाम तक बदल दिया जाता था। यमुना के साथ भी यही हुआ। महज 9 साल की उम्र में उनकी शादी उनसे करीब 20 साल बड़े गोपालराव जोशी से कर दी गई। शादी के बाद उनका नया नाम पड़ा-आनंदीबाई जोशी। फिर महज 14 साल की उम्र में आनंदीबाई ने एक बेटे को जन्म दिया। लेकिन ये खुशियां ज्यादा दिन टिक नहीं सकीं।
जानकारी के मुताबिक ,जन्म के केवल 10 दिन बाद उनके नवजात बेटे की मौत हो गई। उस समय गांव में न महिला डॉक्टर थीं, न ही ऐसी चिकित्सा व्यवस्था जिससे मां और बच्चे की सही देखभाल हो सके। अपने बच्चे को खोने का दर्द आनंदीबाई के दिल में हमेशा के लिए बस गया। उनके मन में एक सवाल उठा कि अगर सही इलाज मिल जाता तो क्या मेरा बच्चा बच सकता था यही सवाल उनकी जिंदगी की सफलता का बड़ा मोड़ बन गया। उसी दिन उन्होंने तय कर लिया मैं डॉक्टर बनूंगी ताकि किसी और मां को यह दर्द न सहना पड़े। यही से शुरू हुआ समाज के खिलाफ एक जंग।
उस समय डॉक्टर बनना इतना आसान नहीं था। उस वक्त के लोगों की मानसिकता होती थी कि लड़कियों को पढ़ने की जरूरत ही नहीं होती। जब आनंदीबाई ने पढ़ाई शुरू की तो लोगों ने उनका मजाक उड़ाया, रास्ते में ताने दिए गए और कई बार अपमान सहना पड़ा। लेकिन इस कठिन सफर में उनके पति गोपालराव जोशी ने उनका साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने समाज की परवाह किए बिना अपनी पत्नी को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। यह फैसला उस दौर के लिए किसी क्रांति से कम नहीं था। विदेश जाकर मेडिकल की पढ़ाई करना आसान नहीं था। घर की आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी। कहा जाता है कि पढ़ाई का खर्च जुटाने के लिए आनंदीबाई ने अपने गहने तक बेच दिए। लेकिन उन्होंने अपने सपने को टूटने नहीं दिया।
हजारों किलोमीटर दूर अमेरिका के वुमेन्स मेडिकल कॉलेज ऑफ पेंसिलवेनिया में उन्होंने दाखिला लिया। नई भाषा, नया देश, नई संस्कृति, और खराब स्वास्थ्य, इन सबके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और सिर्फ 19 साल की उम्र में आनंदीबाई ने डॉक्टर ऑफ मेडिसिन यानि MD की डिग्री हासिल की। इसके साथ ही वे भारत की पहली महिला डॉक्टर बन गईं। यह सिर्फ उनकी जीत नहीं थी यह भारत की हर उस लड़की की जीत थी जिसे समाज ने कभी कमजोर समझा था। भारत लौटने के बाद उन्होंने कोल्हापुर के अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल में महिलाओं के इलाज की जिम्मेदारी संभाली। लेकिन कड़ी मेहनत और लगातार खराब स्वास्थ्य की वजह से आनंदीबाई ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह सकीं। सिर्फ 21 वर्ष की उम्र में ही उनका निधन हो गया। लेकिन इतने छोटे जीवन में उन्होंने जो कर दिखाया वह सदियों तक याद रखा जाएगा।
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आज भारत में लाखों महिला डॉक्टर मरीजों की सेवा कर रही हैं। लेकिन इस सफर की पहली ईंट एक ऐसी लड़की ने रखी थी जिसने समाज की बंदिशों से लड़कर इतिहास लिख दिया। क्योंकि हर पहली कहानी सिर्फ एक उपलब्धि नहीं होती, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता बन जाती है।
रिपोर्ट: कल्पना पांडेय