Bihar Politics: बिहार की सियासत में एक बार फिर नीतीश कुमार, JDU और बीजेपी के रिश्ते को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। मामला JDU के नाम बदलने के प्रस्ताव से शुरू हुआ लेकिन अब इस पर प्रशांत किशोर के बयान ने सियासी पारा और चढ़ा दिया है।
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दरअसल, JDU के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने पार्टी का नाम बदलकर ‘जनता दल नीतीश’ या ‘JD-नीतीश’ करने का प्रस्ताव रखा है। संजय झा का कहना है कि नीतीश कुमार ने अपनी पूरी जिंदगी बिहार के विकास और JDU को मजबूत करने में लगा दी। ऐसे में पार्टी के नाम में नीतीश का नाम जोड़ना उनके योगदान को सम्मान देने जैसा होगा। लेकिन विपक्ष ने इस प्रस्ताव को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं और अब प्रशांत किशोर ने सीधे JDU की सियासी कमान पर ही निशाना साध दिया है।
PK यानि प्रशांत किशोर ने कहा है कि ‘JDU का नाम जनता दल यूनाइटेड रहे या जनता दल नीतीश कर दिया जाए कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि आज की JDU को अमित शाह चलाते हैं।’ प्रशांत किशोर ने यहां तक दावा किया कि नीतीश कुमार अब JDU नहीं चला रहे हैं। उनके मुताबिक बीजेपी नेतृत्व जो तय करता है, वही JDU में होता है। यानी प्रशांत किशोर का हमला सीधे-सीधे नीतीश कुमार की राजनीतिक पकड़ और JDU की स्वतंत्रता पर सवाल खड़ा कर रहा है।
जेडीयू का नाम बदलकर 'जनता दल (नीतीश)' करने के संजय झा के प्रस्ताव से बिहार की राजनीति गरमा गई है। जहां पार्टी इसे नीतीश कुमार के सुशासन का सम्मान बता रही है, वहीं PK ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि नाम बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जेडीयू को अब अमित शाह चला रहे हैं। pic.twitter.com/4V5aeObk5K
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— NBT Bihar (@NBTBihar) September 13, 2026
अब सवाल ये है कि आखिर JDU के नाम में ‘नीतीश’ जोड़ने की जरूरत क्यों महसूस हुई। क्या ये नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को मजबूत करने की कोशिश है, क्या JDU अपने सबसे बड़े चेहरे के नाम को पार्टी की पहचान से जोड़कर आने वाले चुनावों में एक नया सियासी संदेश देना चाहती है, या फिर विपक्ष की नजर में ये सिर्फ ‘ब्रांड नीतीश’ को बचाने की कवायद है? क्योंकि बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार कोई छोटा नाम नहीं हैं। लंबे वक्त तक बिहार की सत्ता संभालने वाले नीतीश कुमार ने JDU को अपनी राजनीति का सबसे बड़ा आधार बनाया। लेकिन पिछले कुछ सालों में बीजेपी के साथ उनकी राजनीतिक नजदीकी और गठबंधन की बदलती तस्वीर ने लगातार सवाल खड़े किए हैं। और अब प्रशांत किशोर का बयान उसी बहस को फिर सामने ले आया है।
एक तरफ JDU कह रही है कि नीतीश के योगदान को सम्मान मिलना चाहिए। दूसरी तरफ PK कह रहे हैं कि नाम नीतीश का लगा देने से क्या होगा, जब फैसले किसी और के हिसाब से लिए जा रहे हैं। यानी बिहार की सियासत में लड़ाई अब सिर्फ JDU के नाम की नहीं है लड़ाई इस बात की है किJDU की असली कमान किसके हाथ में है- नीतीश कुमार के,JDU के नेताओं के,या फिर बीजेपी नेतृत्व के? फिलहाल प्रशांत किशोर के इस बयान ने बिहार की सियासत में नई बहस जरूर छेड़ दी है।