नई दिल्ली। फिलीपींस के मेट्रो मनीला के शहर के सबसे व्यस्त इलाकों से रोज़ाना टैक्सी चला कर 52 वर्षीय आर्टुरो मोडेला को आमतौर पर होने वाली 600 फिलीपींस पेसों लगभग दस डॉलर कमाती है। इस कमाई का वह एक-तिहाई हिस्सा ही घर ले जा पाती है। क्योंकि फिलीपींस में ईंधन की कीमतें बहुत ज़्यादा बढ़ गई हैं और इसके चलते उनका मुनाफ़ा कम हो गया है। उन्होंने बताया कि मैं अपने बच्चे के लंच के पैसे भी नहीं दे पा रही हूं। मोडेला ने बताया कि सरकार को अपनी बात कहने के लिए उन्होंने गुरुवार और शुक्रवार को दो दिन की ट्रांसपोर्ट हड़ताल किया गया है।
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बता दे कि दूसरे विश्व युद्ध के आखिर में फिलीपींस के लोगों ने अमेरिका की पुरानी मिलिट्री जीपों को मिनीबस के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू किया था। फिलीपींस में यात्रियों के लिए सबसे सस्ता और सबसे आम ट्रांसपोर्ट का ज़रिया है, जिसको फिलीपींस की भाषा में जीपनी कहा जाता है। फिलीपींस की राजधानी में ईंधन की बढ़ती कीमतों के विरोध प्रदर्शनों के बीच मनीला में एक ड्राइवर अपनी जीपनी के बोनट पर बैठा है। पिछले हफ़्ते जीपनी मालिकों ने हड़ताल की थी, जिसके बाद इस हफ़्ते और भी बड़े प्रदर्शन हुए। बस, टैक्सी और मिनीबस ड्राइवरों से लेकर मोटरसाइकिल टैक्सी चलाने वालों तक करीब एक दर्जन राष्ट्रीय ट्रांसपोर्ट ग्रुपों के मज़दूरों ने ईंधन की बढ़ती कीमतों के विरोध में इस हड़ताल में हिस्सा लिया। उन्हें लगता है कि सरकार इस मामले में कोई कदम नहीं उठा रही है।
शुक्रवार को हज़ारों लोग राष्ट्रपति भवन तक मार्च करते हुए गए। उन्होंने पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों पर रोक लगाने, ईंधन पर लगने वाले टैक्स खत्म करने और ईंधन उद्योग पर सरकार का और ज़्यादा सख़्त नियंत्रण रखने की मांग की। गुरुवार और शुक्रवार को नो टू ऑयल प्राइस हाइक कोएलिशन (ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का विरोध करने वाला गठबंधन) के बैनर तले इकट्ठा हुए इन मज़दूरों का मानना है कि सरकार ने कार्रवाई करने में बहुत ज़्यादा देरी की और हफ़्तों तक कीमतों पर रोक लगाने की उनकी मांगों को नज़रअंदाज़ किया। नो टू ऑयल प्राइस हाइक कोएलिशन ने ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी आक्रामकता को भी फिलीपींस में महसूस की जा रही आर्थिक मुश्किलों की वजह बताया। राष्ट्रीय मज़दूर संगठन किलुसांग मायो उनो के अध्यक्ष जेरोम एडोनिस, जो इस हड़ताल में शामिल हुए थे ने कहा कि फिलीपींस के लोगों ने यह युद्ध शुरू नहीं किया है, वे इसका हिस्सा भी नहीं बनना चाहते, लेकिन उन्हें इसकी वजह से तकलीफ़ उठानी पड़ रही है।